यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Dec 08, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
राजनीति के नए नायक बने केजरीवाल
राजधानी में झाड़ू चली तो कई दशकों से जमे राजनेता भी सत्ता से बुहार दिए गए। 55 साल से एक ...और पढ़ें

नई दिल्ली [मुकेश केजरीवाल]। राजधानी में झाड़ू चली तो कई दशकों से जमे राजनेता भी सत्ता से बुहार दिए गए। 55 साल से एक भी चुनाव नहीं हार कर दिल्ली की राजनीति के भीष्म पितामह बन गए चौधरी प्रेम सिंह आम आदमी टोपी पहन कर चुनाव में उतरे अशोक कुमार के हाथों हार गए। यह महज नमूना है और आगाज भी.. नई, बदली और आम आदमी की राजनीति का। आम आदमी पार्टी [आप] के जीतने वाले 28 विधायकों में 26 बरस की राखी बिरला और 25 वर्षीय प्रकाश जैसे चेहरे शामिल हैं जो सार्वजनिक जीवन में नौसिखिए हैं।
आप के इन उम्मीदवारों की जादुई जीत को समझना हो तो अंबेडकर नगर इलाके के 28 साल के रवि की बात सुनिए। चुनाव नतीजों के बाद रवि खुश तो है। मगर उसे सिर्फ इतना पता है कि उसने अरविंद केजरीवाल को जिताने के लिए झाड़ू पर वोट दिया था। दिल्ली में आप के चुनाव चिह्न झाड़ू पर चुनाव लड़ने वाले 69 में से एक भी उम्मीदवार ने इससे पहले विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा था। सिर्फ एक ने पहले लोकसभा का चुनाव लड़ा था। पांच ऐसे हैं जो पुराने फार्मूलों पर पहले एमसीडी के चुनाव लड़ चुके हैं।
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समर्थन की इस लहर को समझाते हुए एक विश्लेषक कहते हैं कि केजरीवाल को चुनाव आयोग भले ही नई दिल्ली सीट से जीतने का सर्टीफिकेट जारी करे, लेकिन वास्तव में दिल्ली में पार्टी को जितनी सीटें मिली हैं उन पर केजरीवाल ही विजयी रहे हैं। यह पहला मौका है, जब चुनाव में इतनी कामयाब पार्टी के उम्मीदवारों की जाति और धर्म का प्रोफाइल चुनाव पंडितों के पास भी उपलब्ध नहीं। इसके उम्मीदवारों ने ना सिर्फ जाति, धर्म और क्षेत्रीयता का नाम लिए बिना चुनाव लड़ा बल्कि चुनाव लड़ने के लिए पैसे भी लोगों से ही लिए।
केंद्र की सत्ता के इस सेमीफाइनल में मैन ऑफ द मैच का पुरस्कार जीतने के बाद केजरीवाल और उनकी पार्टी ने अब पूरा जोर फाइनल में लगा दिया है। पार्टी शुरू करते समय इसके विचारक योगेंद्र यादव ने जरूर कहा था कि पहला चुनाव हारने, दूसरा हराने और तीसरा जीतने के लिए लड़ा जाता है। लेकिन, अब बदले माहौल में आप की उम्मीदें सातवें आसमान पर हैं। दिल्ली को संभालने के बजाय अब उसका पूरा जोर देश पर होगा।
केजरीवाल के करिश्मे पर शुरुआत से यकीन करने वाले कार्यकर्ता ही उनकी असली ताकत बने। ये वे लोग हैं, जो मौजूदा नेताओं से ही नहीं राजनीति के मौजूदा चलन से भी पूरी तरह नाराज हैं। दूसरी पार्टियों ने जहां इन्हें अपने लिए बेमतलब मान लिया, केजरीवाल ने अपना दांव इन्हीं पर लगाया। पार्टी को दिल्ली में जीत की पहली खबर सुनाने वाली पटेल नगर की उम्मीदवार वीणा आनंद की प्रचार की कमान संभालने वाले 26 साल के छात्र दीपक कहते हैं, प्रचार शुरू किया, तब हम चार लोग थे। देखने वाले हंसी उड़ाते थे। कहते थे कि ये हराएंगे राजेश लिलोठिया को।
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