यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 07, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
क्यों आर्मी चीफ बिपिन रावत ने कहा- दो मोर्चे पर तैयार रहे भारतीय सेना
थल सेनाध्यक्ष बिपिन रावत ने कहा कि उत्तरी सीमा (चीन सीमा) पर टकराव का पश्चिमी सीमा (पाकिस्तान सीमा) पर स्थित विरोधी देश लाभ उठाएगा, ऐसी संभावना है।

नई दिल्ली, [स्पेशल डेस्क]। डोकलाम पर भारत और चीन के बीच गतिरोध भले ही फिलहाल समाप्त हो चुका हो लेकिन विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और न ही डोकलाम की समस्या का स्थायी हल हुआ है। बल्कि, चीन ने डोकलाम पर भारत के साथ जो नरमी दिखाई है, उसकी वजह सितंबर के पहले हफ्ते में चीन के शियामेन शहर में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन को सफल बनाने की कोशिश थी। इसके अलावा, चीन में अक्टूबर के महीने में होने जा रही 19वीं पीपुल्स कांग्रेस की बैठक भी है। इस बैठक में मौजूदा राष्ट्रपति शी चिनफिंग को पांच वर्षों के लिए दूसरा कार्यकाल दिया जा सकता है। ये कहना है रिटायर्ड मेजर जनरल जीडी बख्शी का।
दो मोर्चे पर तैयार रहे सेना- बिपिन रावत
Jagran.com से खास बातचीत में रिटायर्ड मेजर जनरल जीडी बख्शी ने सेना प्रमुख बिपिन रावत के उस बयान का पुरजोर समर्थन किया है, जिसमें सेनाध्यक्ष ने भारतीय सेना को दो मोर्चों पर तैयार रहने के लिए सतर्क किया है। रावत ने कहा कि उत्तरी सीमा (चीन सीमा) पर टकराव का पश्चिमी सीमा (पाकिस्तान सीमा) पर स्थित विरोधी देश लाभ उठाएगा, ऐसी संभावना है। राजधानी दिल्ली में 'भविष्य की जंग' विषय पर एक सेमिनार के दौरान सेना प्रमुख ने बुधवार को कहा कि भारत दो विरोधी देशों से घिरा है।
पाकिस्तान के साथ समझौते की नहीं है संभावना
बिपिन रावत ने आगे कहा कि जहां तक हमारी पश्चिमी सीमा (पाकिस्तान) के विरोधी का सवाल है तो हम उसके साथ किसी समझौते की संभावना नहीं देखते हैं, क्योंकि वहां की राजनीति, जनता और सेना को यह समझा दिया गया है कि भारत उसके टुकड़े करना चाहता है। उसने भारत के खिलाफ लंबे समय से छद्म युद्ध छेड़ा हुआ है। सेनाध्यक्ष ने कहा कि हमारा देश कब तक इस छद्म युद्ध को सहता रहेगा, कब फैसला करेगा कि बर्दाश्त की सीमा पार हो गई है और कब जंग शुरू हो जाएगी, इसके बारे में पहले से कुछ कहना मुश्किल है। करीब तीन महीने पहले भी सेना प्रमुख ने ठीक इसी तरह का बयान देते हुए देश के जवानों से ढाई मोर्चे पर जंग के लिए तैयार रहने को कहा था। उस वक्त उनका ढाई मोर्चे का आशय था- पाक, चीन और नक्सलवाद। ऐसे में सेनाध्यक्ष रावत के इस बयान को बेहद गंभीरता से लेने की जरूरत है, जिसकी तरफ वो लगातार ध्यान दिलाने का प्रयास कर रहे हैं।

क्यों सेना प्रमुख बार-बार करते हैं आगाह
दरअसल, इस बारे में रिटायर्ड मेजर जनरल जीडी बख्शी ने बताया कि चीन जिस तरह का सलूक दोस्ती के नाम पर भारत के साथ करता आ रहा है उससे हम सभी वाकिफ हैं। वहीं दूसरी तरफ, पाकिस्तान का भारत से रिश्ता जगजाहिर है। ऐसे में आर्मी चीफ के बयान की पुरजोर वकालत करते हुए बख्शी ने बताया कि हमें अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने की दिशा में तैयार करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर दमदार तरीके से सैन्य क्षमता के साथ ताकतवर रहेंगे तभी युद्ध नहीं होगा और अगर इसमें किसी तरह की कोई कोताही बरती गई तो हमारे पड़ोसी दुश्मन कब हमारे ऊपर मौका देख हमला कर दें कुछ नहीं कहा जा सकता है।
क्या ढकोसला है चीनी राष्ट्रपति का बयान?
चीन के शियामेन शहर में ब्रिक्स सम्मेलन से इतर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच द्विपक्षीय मुलाकात हुई। करीब एक घंटे तक चली इस बैठक के बाद जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ब्रिक्स के आयोजन को सफल करार दिया तो वहीं दूसरी तरफ चीन ने कहा कि वह भारत के साथ पंचशील के पांच सिद्धांतों के साथ शांतिपूर्ण तरीके से चलने को तैयार है और दोनों देशों को उसी अनुरूप आगे चलना चाहिए। लेकिन, जीडी बख्शी चीनी राष्ट्रपति के बयान को सिर्फ ढकोसला करार दे रहे हैं। उनका कहना है कि हमेशा से चीन के दिखाने के दांत कुछ और जबकि खाने के दांत कुछ और रहे हैं। ये बात 1962 में भारत पर चीन के आक्रमण को लेकर देखी जा सकती है। ऐसे में जो गलतियां उस वक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने की थीं, वैसी गलतियां अब दोहराना भारत के लिए बड़ी भूल होगी। इसलिए, चीन के किसी भी बहकाव में भारत को नहीं आना चाहिए।
73 दिनों तक भारत-चीन की सेना रही आमने-सामने
गौरतलब है कि भूटान की सीमा के पास डोकलाम में चीन की ओर से जून महीने में सड़क बनाई जा रही थी उस वक्त भारतीय सेना के जवानों के उसका कड़ा विरोध किया। जिसके बाद एशिया की दो बड़ी शक्तियां युद्ध के मुहाने पर आ गयी थीं। 73 दिनों तक दोनों ही देश के जवान नॉन कंबेटिव मोड में एक-दूसरे के सामने रहे और इस दौरान चीन की सरकारी मीडिया की तरफ से लगातार भारत के खिलाफ जहर उगला गया। तो वहीं, चीन के रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय की ओर से भारत को धमकाने की कोशिशें भी कई गई। साथ ही, 1962 में मिली हार से भारत को सबक लेने की बातें कही गईं।
ऐसी स्थिति में अतीत को देखते हुए बीजिंग से मिले लाख आश्वासनों के बावजूद रक्षा मामलों के जानकार मानते हैं कि चीन कभी भी भारत के लिए भरोसे लायक नहीं रहा है और न ही रहेगा। ऐसे में भारत को अपने दो पड़ोसी चीन और पाकिस्तान से खास सतर्क रहने की जरूरत है।
