यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 04, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
शियाओं पर सियासी नजर, इस दांव से विरोधियों का खेल बिगाड़ेगी भाजपा
केंद्रीय मंत्रिमंडल में मुख्तार अब्बास नकवी के ओहदे को बढ़ा दिया गया है। लेकिन जानकार इसे सियासी कदम बता रहे हैं।
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नई दिल्ली [स्पेशल डेस्क] । लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती ये है कि मतदाता अपने रहनुमाओं का चुनाव करते हैं। राजनीतिक दल मतदाताओं को अपने पाले में लाने के लिए तमाम तरह के वादे करते हैं। ये बात अलग है कि नेताओं के वादे और दावे नदी के किनारों की तरह होते हैं, जो आपस में मिलते नहीं हैं। देश की चुनावी प्रक्रिया में धर्म के आधार पर मतदाताओं को लुभाने की कोशिश से बचने को कहा गया है। लेकिन हकीकत कुछ और ही है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में रविवार को हुआ विस्तार कई मायनों में खास था। कैबिनेट में एक मात्र मुस्लिम चेहरा मुख्तार अब्बास नकवी का ओहदा बढ़ा। इसी तरह यूपी में अगर योगी कैबिनेट की तस्वीर को देखें तो मोहसिन के रजा के रूप में एक मात्र मुस्लिम मंत्री शामिल हैं। दोनों मुस्लिम चेहरों की खास बात ये है कि वो शिया समुदाय से आते हैं। केंद्र और यूपी सरकार में शिया समुदाय के दोनों मंत्रियों का होना सिर्फ एक प्रशासकीय फैसला है या शियाओं पर सियासी नजर। इसे समझने से पहले ये जानने की कोशिश करते हैं कि पूरे देश और यूपी में शिया समुदाय का कितना असर है।
- भारत में मुस्लिम मतदाताओं का प्रतिशत करीब 17 फीसद है, जिनमें करीब पांच से 6 फीसद शिया हैं।
- देश में 335 लोकसभा सीटों को शिया मतदाता प्रभावित करते हैं। दिल्ली में मुस्लिम मतदाताओं में 10 प्रतिशत शिया हैं।
- यूपी में 19 फीसद मुस्लिम मतदाता हैं, जिनमें तीन करोड़ पुरुष और 80 लाख महिला मतदाता हैं।
- यूपी में 143 सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं का असर है।
- 70 सीटों पर 20 से 30 फीसद के करीब मुस्लिम मतदाता हैं।
- 73 सीटों पर मुस्लिम मतदाता 30 फीसद से ज्यादा हैं।
- उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में दस लोकसभा सीटें हैं जो शिया मतदाताओं की सहायता से जीती जा सकती हैं। लखनऊ, अमरोहा, जौनपुर, संभल, फैजाबाद और सुल्तानपुर सीट शुद्ध रूप से शिया बहुल सीटें हैं।

Jagran.Com से खास बातचीत में भाजपा नेता सैय्यद जफर इस्लाम ने कहा कि मुख्तार अब्बास नकवी को कैबिनेट मंत्री बनाए जाने के पीछे कोई राजनीतिक वजह नहीं है। नकवी जी का बेहतरीन रिकॉर्ड रहा है, और वो अपनी काबिलियत के दम पर उस ओहदे तक पहुंचे हैं। अल्पसंख्यक समाज के सभी तबकों में मुख्तार अब्बास नकवी को समान रूप से सम्मान हासिल है। शिया और सुन्नी दोनों समुदायों की बेहतरी के लिए वो काम करते रहे हैं। आप किसी भी फैसले को सिर्फ राजनीतिक चश्मे से नहीं देख सकते हैं।
18वीं- 19वीं सदी में शियाओं का था दबदबा
अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के भीतर शिया खुद अल्पसंख्यक हैं। 18वीं से 19वीं सदी में अवध क्षेत्र (लखनऊ) में नवाबों का शासन था और शिया समुदाय का काफी प्रभाव था। लेकिन जैसे जैसे समय बदला शिया समुदाय की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रुतबे में गिरावट आई। शिया समुदाय से ताल्लुक रखने वाली बड़ी तादाद गरीबी में जी रही है। इसके अलावा अगर कुछ लोग नौकरी करते हैं तो भी उनके परिवारों के हालात अच्छे नहीं हैं।
जानकार की राय
Jagran.Com से खास बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह ने बताया कि शिया लंबे समय से जनसंघ के समर्थक रहे हैं। समय गुजरने के साथ अटल बिहारी वाजपेयी के शासन के दौरान शिया समुदाय की भाजपा से करीबी बढ़ी। शिया समुदाय को लगने लगा कि भाजपा उनकी जरुरतों को समझती हैं और उनका हित भाजपा के हाथों सुरक्षित है। लेकिन 2004 में यूपीए सरकार के आने के बाद शियाओं के लिये शून्यता की स्थिति पैदा हो गई। मोदी सरकार के आने के बाद एक बार फिर शियाओं की बेहतरी के कुछ कदम उठाए गए। नजमा हेपतुल्ला को अल्पसंख्यक विभाग देकर ये संदेश देने की कोशिश की गई भाजपा शियाओं के विकास के लिए फिक्रमंद है। इससे पहले 2014 के आम चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी चुनावी सभाओं में मुस्लिम महिलाओं की हितों पर जोरदार ढंग से अपील करते थे।
शिया और सुन्नी विवाद
शिया और सुन्नी समुदायों के बीच आपसी विवाद जगजाहिर है। सुन्नी सममुदाय आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक तौर पर संपन्न है। लेकिन शियाओं के लिए विकास के दरवाजे एक तरह से बंद ही रहे हैं। कहा जाता है कि योगी सरकार में मोहसिन रजा को शामिल कर उन ऐतिहासिक भूलों को सुधारने की कोशिश की गई । शिया समुदाय की बेहतरी के लिये कल्याण सिंह सरकार के समय से कुछ काम शुरु किए गए। उदाहरण के तौर पर मुहर्रम के दौरान निकाली जाने वाली झांकियों पर 21 साल से लगे प्रतिबंध को हटाया गया।
2014 से कुछ शिया धर्मगुरुओं को भाजपा और आरएसएस नेताओं के साथ मंच साझा करते हुए देखा गया है। उदाहरण के तौर योगा दिवस पर गृहमंत्री राजनाथ सिंह के साथ मौलाना यसूब अब्बास और आरएसएस के नेता इंद्रेश कुमार के साथ मौलाना हमीदुल हसन ने मंच साझा किया था।
- बिहार की पांच लोकसभा सीटें केवल शिया मतदान से ही जीती जा सकती है। वहां लगभग एक करोड़ शिया हैं। पटना और मुजफ्फरपुर अपनी शिया आबादी के लिए जाने जाते हैं।
- बंगाल में 35 सीटों पर शिया मतदाता हावी हैं। इनमें हुबली, 24 परगना, मुर्शिदाबाद और कोलकाता की गिनती होती है।
- जम्मू-कश्मीर की आठ सीटों में लद्दाख, कारगिल, जम्मू और श्रीनगर मुख्य हैं। वहां की कुल आबादी में 35 प्रतिशत शिया हैं।
- मध्य प्रदेश में भोपाल, जबलपुर, रतलाम और इन्दौर सीट शिया बहुल है। राजस्थान की दस सीटों को शिया मतदाता प्रभावित करते हैं। इनमें अजमेर, जयपुर, उदयपुर और बांसवाड़ा प्रमुख हैं।

- गुजरात की 20 लोकसभा सीटों के मतदाता शिया मुस्लिम हैं। इनमें भावनगर, अमदाबाद, सूरत, राजकोट और मांडवी प्रमुख हैं।
- महाराष्ट्र की 20 लोकसभा सीटों में शिया मतदाता हैं। इनमें मालेगांव, मुम्बई, नागपुर और पुणे प्रमुख हैं।
- कर्नाटक की 10 शिया बहुल सीटों में बेंगलुरु, अलीपुर, मैसूरु, एलेनरसिंहपुर और करीमपुर का समावेश होता है।
- तमिलनाडु में कुल 39 में से शिया बहुल सीटों में बाकेराबाद, चेन्नई और बंगम्बदूर शामिल हैं।
- हरियाणा में 1.5 लाख शिया हैं। इनमें फरीदाबाद, चंडीगढ़ शामिल हैं।
- पंजाब में मलेरकोटला, चंडीगढ़, लुधियाना आदि में शिया वोट हैं।
- असम में दो प्रतिशत शिया हैं।
- झारखंड के रांची में शिया मतदाताओं की अच्छी खासी तादाद है।
- उत्तराखंड में देहरादून, रूड़की और मसूरी।
- छत्तीसगढ़ में रायपुर, शहडोल और बिलासपुर अपनी शिया आबादी के लिए जाने जाते हैं।
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह ने कहा कि यूपी विधानसभा चुनाव से पहले पीएम मोदी बार बार कहा करते थे कि तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं के विकास में बाधा बन रही है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मुस्लिम समुदाय खासतौर से महिलाओं को लगता है कि मौजूदा सरकार उनके भविष्य को संवारने के लिए फिक्रमंद है। केंद्र सरकार की कोशिश है कि अल्पसंख्यक समुदाय में अल्पसंख्यक बने हुये शियाओं के जरिए मुस्लिम समुदाय में जगह बनाई जाए। इसके अलावा नजमा हेपतुल्ला को गवर्नर बनाए जाने के बाद विरोधी दल निशाना साधते थे कि एक तरफ भाजपा अल्पसंख्यकों की भलाई के दावे करती है। लेकिन दूसरी तरफ अल्पसंख्यक समाज का एक भी मंत्री कैबिनेट दर्जे का नहीं है। मुख्तार अब्बास नकवी के ओहदे को बढ़ा कर विपक्षी धार को पीएम मोदी ने कुंद करने की कोशिश की है। लेकिन मुख्तार अब्बास नकवी के प्रमोशन को शिया वोटबैंक से देखने की जरुरत नहीं है बल्कि उन्होंने राज्य मंत्री के तौर पर बेहतरीन प्रदर्शन भी किया था।
