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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 04, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र की बदरंग तस्वीर पेश करता है यह वाकया

By Digpal SinghEdited By:
Published: Mon, 04 Sep 2017 11:36 AM (IST)Updated: Mon, 04 Sep 2017 12:51 PM (IST)

दूर दराज के क्षेत्रों में स्थित अस्पतालों में दवा का अभाव भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र की बदरंग तस्वीर पेश करता है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र की बदरंग तस्वीर पेश करता है यह वाकया
सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र की बदरंग तस्वीर पेश करता है यह वाकया

हरे राम मिश्र

झारखंड में सरकारी स्वास्थ्य और चिकित्सा सेवाओं की बदहाल स्थिति पर कुछ कहने से पहले मैं अपने साथ हुई एक घटना का जिक्र करना जरूरी समझता हूं। अभी हाल-फिलहाल की बात है। झारखंड के पलामू जिला मुख्यालय में अपने प्रवास के दौरान मुझे अचानक वायरल बुखार हो गया। तेज बुखार और बदन दर्द के कारण जब बेचैनी बहुत बढ़ गई तब इलाज के लिए मुझे पलामू स्थित सदर अस्पताल में जाना पड़ा। जब मैं वहां पहुंचा तो सुबह के साढ़े नौ बजे थे और डॉक्टर बस अभी-अभी पहुंचे थे। मैंने उनसे दवा लिखवाई और अस्पताल के दवा वितरण काउंटर पर दवा लेने पहुंचा। पर्चा देखने के बाद, वहां मौजूद फार्मासिस्ट ने मुझसे कहा कि अस्पताल में दवाएं नहीं हैं। आप बाहर से या फिर अस्पताल के अंदर बने बिक्री काउंटर से खरीद लीजिए। इसके बाद मुझे उन दवाओं को सदर अस्पताल के अंदर बने दवा काउंटर से बाजार रेट पर खरीदना पड़ा।

 

इसके बाद, जब मैं वापस लौटकर अपने होटल आया तो उस दिन के स्थानीय अखबारों में गुमला जिला स्थित सदर अस्पताल में सामान्य जीवन रक्षक दवाइयों के अभाव के कारण आठ साल के एक आदिवासी बच्चे की अस्पताल परिसर में ही तड़प-तड़प कर दर्दनाक मौत की सचित्र खबर प्रकाशित हुई थी। यही नहीं उस मृत बच्चे का पिता बेबस होकर बच्चे के पार्थिव शरीर को अपनी पीठ पर बांध कर वापस अपने घर ले गया था।

 

कुल मिलाकर 'सबका साथ सबका विकास' के लुभावने नारे के बीच राज्य सरकार चाहे जिस प्रगति का दावा करे, लेकिन असलियत में यह एक क्रूर मजाक से ज्यादा कुछ नहीं है। राज्य सरकार अपने लुभावने विज्ञापनों में चाहे कितनी भी समृद्धि का दावा करे, लेकिन मौसमी बुखार जैसी बेहद सामान्य बीमारी की दवा का जिला अस्पताल में मौजूद नहीं होना, यह बताता है कि उपरोक्त दावे केवल आम जनता को भरमाने और उसका मजाक उड़ाने के लिए ही हैं। सरकार की आत्म मुग्धता से इतर यह क्रूर सच है कि राज्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा चरमरा चुकी है। गौरतलब है कि आदिवासी बहुल यह राज्य अपने अथाह प्राकृतिक और कीमती खनिज संपदाओं के बावजूद बेहद गरीब माना जाता है। इस राज्य के किसी भी गांव का रुख कर लीजिए कुपोषित बच्चों की भरमार आपको दिखाई पड़ जाएगी।

 

यही नहीं, राज्य की एक बड़ी आबादी सरकार से मिलने वाले रियायती राशन पर पूरी तरह से निर्भर है। इस राज्य में छह लाख परिवार ऐसे हैं, जिनके पास अपना खुद का एक कमरे का पक्का मकान तक नहीं है। राज्य की पूरी अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा मजदूरों के पलायन से होने वाली आय पर निर्भर होता है। जाहिर है इस व्यवस्था में हाशिये पर खड़े ऐसे ही लोग सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेते हैं, क्योंकि उनके पास मेडिकल का कोई बजट नहीं होता है। वे मंहगे अस्पतालों में अपना इलाज नहीं करवा सकते, लेकिन जब सरकारी अस्पतालों में बुखार की मामूली दवाएं नहीं हैं तब गंभीर बीमारियों का इलाज कैसे संभव हो पाएगा? इसकी कल्पना ही की जा सकती है।

 

हालांकि इस साल के बजट में राज्य सरकार द्वारा स्वास्थ्य पर कुल बजट का चार फीसद खर्च करने की बात कही गई थी, लेकिन सच यह है कि इस मद की एक बड़ी धनराशि को आधारभूत संसाधन जैसे भवन, बिस्तर आदि पर खर्च कर दिया गया। इस पैसे का उपयोग अगर दवाइयों और उपलब्ध सेवाओं को ही और बेहतर करने में किया जाता तो ज्यादा बेहतर होता। मगर सरकार पूरी तरह से यह प्रयास कर रही है कि सार्वजनिक अस्पतालों को सार्वजनिक-निजी साझेदारी के जरिए चलाया जाए। रांची के एकमात्र सरकारी सदर अस्पताल को भी रघुवर दास सरकार द्वारा निजीकरण करने का लगातार प्रयास किया जा रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि राज्य में स्वास्थ्य सेवाएं महंगी और आम-गरीब आदमी से दूर हो जाएंगी। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि देश की अस्सी फीसद जनसंख्या के पास मेडिकल का कोई बजट नहीं है।

 

खैर, हमें अपने गिरेबान में यह झांकने की जरूरत है कि आखिर यह कैसी आजादी और विकास का हमारा मॉडल है जहां हम अपने नागरिकों को सामान्य बीमारियों से बचाने की दवाएं तक उपलब्ध नहीं करवा पा रहे हैं? सवाल यह है कि सरकारें आखिर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की अनदेखी जानबूझ कर क्यों कर रही हैं? क्या यह सब महज इसलिए किया जा रहा है ताकि भारत के विशाल सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र को कॉरपोरेट्स और निजी हाथों में सौंप दिया जाए?

 

दरअसल आज हमने विकास की जिस अवधारणा को स्वीकार कर लिया है वह राज्य के कल्याणकारी चेहरे को कब का दफन कर चुका है। उदारीकरण के इस दौर में जब राज्य का काम केवल कार्पोरेट का ‘फैसिलिटेटर’ होना भर रह गया है, उस समय उससे यह आशा करना कि वह सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा पर अपने खर्च को बढ़ाएगा और बेहतर बनाएगा-एक नामसझी है। मौजूदा केंद्र सरकार आज जब केवल विदेशी पूंजी निवेश को विकास का एकमात्र रास्ता समझ रही है, ऐसे दौर में उन्हें भारत के विशाल सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र को भी निजी क्षेत्र के लिए खोलना पड़ रहा है। ऐसे दौर में जब तक सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा चौपट नहीं की जाएगी तब तक निजी क्षेत्र को फलने-फूलने का अवसर नहीं मिलेगा। यही वजह है कि एक नीति के तहत भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को बंद और लचर करने का कुचक्र रच दिया गया है। यह कुचक्र पहले से ही हाशिये पर खड़े बहुसंख्यक समाज को मुनाफा कमाने वाली मल्टीनेशनल के रहमों करम पर छोड़ देगा।

 

बाजार की केवल मुनाफा कमाने की नैतिकता का दुष्परिणाम आने वाली नस्लें उठाएंगी। मगर निराशा तब और अधिक होती है जब इस कुचक्र के खिलाफ विपक्ष कोई चुनौती पेश नहीं कर पाता। इससे साफ है कि देश के किसी भी सियासी दल के पास जनता के लिए कोई लोक कल्याणकारी मॉडल नहीं है।

 

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)