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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 31, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

प्राइवेट सेक्टर द्वारा तैयार पहले सैटेलाइट IRNSS-1H की इसरो द्वारा लांचिंग फेल

By Rajesh KumarEdited By:
Published: Thu, 31 Aug 2017 03:18 PM (IST)Updated: Thu, 31 Aug 2017 08:06 PM (IST)

इसरो के मुताबिक, यह पहला मौका है जब किसी सैटलाइट को बनाने में प्राइवेट कंपनियां सीधे तौर पर शामिल हुई हैं।

प्राइवेट सेक्टर द्वारा तैयार पहले सैटेलाइट IRNSS-1H की इसरो द्वारा लांचिंग फेल
प्राइवेट सेक्टर द्वारा तैयार पहले सैटेलाइट IRNSS-1H की इसरो द्वारा लांचिंग फेल

नई दिल्ली, [स्पेशल डेस्क]। पहली बार प्राइवेट कंपनियों की मदद से अंतरिक्ष की दुनिया में एक और छलांग लगाने की इसरो की कोशिश असफल रही। श्रीहरिकोटा से गुरुवार की शाम सात बजे जिस स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली इंडियन रीजनल नेविगेशनल सैटेलेइट सिस्टम (आईआरएनएसएस यानि नाविक) श्रृंखला का आठवां उपग्रह आईआरएनएसएस-1एच को पीएसएलवी-सी39 से लांच किया गया वो सफल नहीं हो पाया। ये जानकारी इसरो के चेयरमैन एएस किरण कुमार ने दी। आइये बताते है कि ये किसलिए अंतरिक्ष की दुनिया में भारत के लिए एक लंबी छलांग मानी जा रही थी। 

असफल रहा आईआरएनएसएस-1एच मिशन

इसरो के चेयरमैन एएस किरण कुमार ने बताया कि ये मिशन असफल रहा। उन्होंने कहा कि इसकी हम विस्तृत जांच कर रहे हैं कि ऐसा क्यों हुआ है। हालांकि, उन्होंने बताया कि किसी स्तर पर कोई समस्या नहीं आयी है। लेकिन, उन्होंने बताया कि सैटेलाइट आंतरिक तौर पर सेपरेटेड है लेकिन उसकी हीट को उससे अलग नहीं किया जा सका है। एक बार जैसे ही उसे अलग किया जाएगा उस सैटेलाइट को ऑर्बिट में छोड़ दिया जाएगा।  

स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली का आठवां उपग्रह है IRNSS-1H

1425 किलोग्राम भार वाले आईआरएनएसएस-1एच इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम का आठवां सैटेलाइट था जो आईएरएनएसएस-1ए की जगह लेता, जिसकी तीन रूबीडियम परमाणु घड़ियों (एटॉमिक क्लॉक) ने काम करना बंद कर दिया था। आईआरएनएसएस-1ए ‘नाविक’ श्रृंखला के सात उपग्रहों में शामिल हैं। भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (आईआरएनएसएस) एक स्वतंत्र क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली है, जिसे भारत ने अमेरिका के जीपीएस की तर्ज पर विकसित किया है।

पहली बार प्राइवेट कंपनियां सैटेलाइट प्रोजेक्ट में शामिल

इसरो ने इसको लांच करने से पहले बताया था कि यह पहला मौका है जब किसी सैटलाइट को बनाने में प्राइवेट कंपनियां सीधे तौर पर शामिल हुई। आईआरएनएसएस-1 एच को बनाने में प्राइवेट कंपनियों का 25% योगदान रहा है। ऐसा माना जा रहा था कि एक बार लॉन्च हो जाने के बाद अपनी लोकेशन बेस्ड सर्विस के जरिए आईआरएनएसएस रेलवे, सर्वे और दूसरी कई चीजों में काफी महत्वपूर्ण साबित होता। 

बीते तीन दशकों में इसरो के लिए यह पहला मौका है जब उसने नेविगशन सैटेलाइट बनाने का मौका निजी क्षेत्र को दिया है। इसरो प्रमुख एएस किरण कुमार ने बताया कि हमने सैटेलाइट जोड़ने में निजी संस्थानों की मदद ली है। इसके लिए रक्षा उपकरणों की आपूर्ति करने वाले बेंगलुरु के अल्फा डिजाइन टेक्नोलॉजी को पहला मौका मिला है। 70 इंजीनियरों ने कड़ी मेहनत के बाद इस सैटेलाइट को तैयार किया है।

काफी फायदेमंद साबित हो सकता था आईआरएनएसएस-1एच

इसरो की तरफ से कहा गया था कि 'नाविक' मछुआरों को मछली पकड़ने के लिए संभावित क्षेत्र में पहुंचने में मददगार साबित होगा। वह मछुआरों को खराब मौसम, ऊंची लहरों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा के पास पहुंचने से पहले सतर्क होने का संदेश देगा। यह सेवा स्मार्टफोन पर एक सॉफ्टवेयर एप्लीकेशन के द्वारा उपलब्ध होगी।

अप्रैल 2018 में होगा दूसरा हिस्सा लांच

इसरो ने बताया था कि न्यूक्लियर वॉचेज का बंद पड़ जाना बहुत समस्या वाली बात नहीं है। इससे पहले रूस और यूरोपियन स्पेस एजेंसी के प्रोग्राम में भी इस तरह की दिक्कत आ चुकी है। इसके मुताबिक, मिशन रीडनेस रिव्यू (एमआरआर) और लॉन्च अथॉराइजेशन बोर्ड (एलएबी) ने गुरुवार को इसके काउंटडाउन की इजाजत दी है। आईआरएनएसएस का पहला हिस्सा 1 जुलाई 2013 को लॉन्च किया गया था। इसका दूसरा हिस्सा अप्रैल 2018 में लॉन्च किया जाना है।

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