यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Feb 26, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
इशरत मुठभेड़ की जांच से रची थी मोदी को फंसाने की साजिश
इशरत जहां मुठभेड़ मामले में पूर्व केंद्रीय सचिव जीके पिल्लई के ताजा खुलासे के बाद कांग्रेस एक बार फिर भाजपा के निशाने पर है।

जागरण न्यूज नेटवर्क, नई दिल्ली । इशरत जहां मुठभेड़ मामले में पूर्व केंद्रीय सचिव जीके पिल्लई के ताजा खुलासे के बाद कांग्रेस एक बार फिर भाजपा के निशाने पर है। इसके पहले इसी मसले पर वह तब भाजपा के निशाने पर आई थी जब एनआइए के अफसरों ने डेविड हेडली से अमेरिका जाकर पूछताछ की थी। उस वक्त संप्रग का शासन था। उसी समय भाजपा नेता अरुण जेटली ने इशरत जहां मुठभेड़ की जांच के नाम पर नरेंद्र मोदी (तब गुजरात के मुख्यमंत्री) को फंसाने की साजिश के बारे में विस्तार से अपने ब्लॉग में लिखा था।
इस ब्लॅाग के अनुसार, 'जब इशरत और उसके साथियों का एनकाउंटर हुआ तो केंद्र की सत्ता में संप्रग-1 सरकार थी। इशरत की मां ने जब गुजरात हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की तो संप्रग सरकार ने कोर्ट में हलफनामा दिया। इस हलफनामे में सरकार ने कहा कि इशरत लश्कर आतंकी थी और 15 जून 2004 को हुआ उसका एनकाउंटर असली था। उस समय शिवराज पाटिल केंद्र में गृह मंत्री थे, लेकिन जैसे ही चिदंबरम गृह मंत्री बने, केंद्र सरकार के रवैये में बदलाव आ गया। केंद्र ने 2009 में हाईकोर्ट में पिछले हलफनामे के उलट एक नया हलफनामा दिया।
गृह मंत्रालय ने मुठभेड़ से अपना पल्ला झाड़ते हुए याचिकाकर्ता के साथ मिलकर मामले की नई सिरे से जांच का जाल बिछाया। उसकी ओर से यह कहा गया कि गुजरात सरकार के नेताओं ने मासूम लोगों को फर्जी मुठभेड़ में मारा है। कोर्ट के मामले की जांच के लिए एसआइटी का गठन करने के बाद पूरा मामला सीबीआइ के सुपुर्द कर दिया गया। इसी के साथ सरकार ने आइबी और सीबीआइ को आमने-सामने ला खड़ा किया और इस तरह जांच एजेंसियों को विघटन की कगार पर पहुंचाकर देश में खुफिया अभियानों की गुंजाइश को अपूर्णनीय क्षति पहुंचाई।'
जेटली ने गुप्त खुफिया अभियानों को कानूनी कवच देने की जरूरत जताते हुए लिखा था, 'जेहादी आतंकवाद से लेकर माओवादी उग्रवाद तक की चुनौैतियों का मुकाबला करने के लिए खुफिया अभियान ही कारगर तरीका हैं। भारतीय खुफिया एजेंसियां ऐसे अभियानों को बहुत गुप्त तरीके से अंजाम देती हैं। अमूमन ऐसे अभियानों में देश के कानूनों का पालन नहीं होता। चूंकि भारत में खुफिया एजेंसियां सरकार की आंतरिक प्रक्रियाओं के तहत ही काम करती हैं। यह मामला बड़े संदर्भो में जनता और राष्ट्र के हित में है। अब हम एक परिपक्व लोकतंत्र हैं इसलिए इसे कानून के दायरे में लाना होगा।'
जेटली के मुताबिक, 'इशरत जहां के आतंकी होने की सच्चाई जमात उद दावा के हवाले से खुद गजवा टाइम्स ने दी थी। जमात का कहना था कि उसके लोग मारे गए हैं। उसके बाद डेविड हेडली ने भी एफबीआइ और एनआइए को बताया था कि आतंकियों को मारने का यह खुफिया अभियान था। भारत में अमेरिकी दूतावास में कानूनी सहायक ने इस मामले के और सुबूत जुटाने के लिए संबंधित दस्तावेज आइबी के सुपुर्द किए थे।'
