'पूर्व अनुमति जरूरी हुई तो बंद हो जाएंगे न्यूजरूम', डाटा संरक्षण कानून को सुप्रीम कोर्ट में दी गई चुनौती; केंद्र को मिला नोटिस
डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) एक्ट के तहत पत्रकारों ...और पढ़ें

डाटा संरक्षण कानून को चुनौती
HighLights
पत्रकारों को अनुमति बाध्यता से न्यूज रूम बंद हो जाएंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया।
खोजी पत्रकारिता, सूत्रों की गोपनीयता पर गंभीर असर।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) एक्ट और डीपीडीपी नियमों के तहत अगर पत्रकारों को सूचना प्रकाशित करने से पहले अनुमति लेने के लिए बाध्य किया गया तो न्यूज रूम बंद हो जाएंगे।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने डीएनपीए की दलीलों और याचिका पर संज्ञान लिया। डीएनपीए में 21 डिजिटल समाचार प्रकाशक शामिल हैं, जिनमें अंबानी व अदाणी समूह की कंपनियां भी हैं। पीठ ने केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय और इलेक्ट्रानिक्स व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को नोटिस जारी किए।
मामले पर अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी। सुनवाई की शुरुआत में डीएनपीए की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने पीठ से स्थगन की अर्जी पर विचार करने का भी आग्रह किया। लेकिन पीठ ने सरकार को सुने बिना कानून पर अंतरिम रोक लगाने से इन्कार कर दिया। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, 'दूसरे पक्ष को सुने बिना रोक नहीं लगाई जा सकती। हालांकि, रोक लगाने की अर्जी पर नोटिस जारी किया गया है।'
माधवी दीवान ने कहा कि पत्रकारिता गतिविधियों को छूट नहीं मिलने से समाचारों की कवरेज और रिपोर्ट करने के तरीके में बुनियादी बदलाव आ सकता है। दीवान ने कहा, 'यह शायद उस मीडिया की पहली व्यापक याचिका है जिसे हम पारंपरिक मीडिया कहते हैं।
सिटीजन जर्नलिस्ट को लेकर कुछ बहस हुई है। हम पारंपरिक और मुख्यधारा का मीडिया हैं।' वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि पत्रकारों को किसी व्यक्ति के बारे में सूचना प्रकाशित करने से पहले उससे अनुमति लेने की बाध्यता न्यूज रूम के कामकाज को कमजोर कर सकती है।
उन्होंने सूचना का अधिकार (आरटीआइ) अधिनियम की धारा 8(1)(जे) में संशोधन पर भी चिंता जताई। यह धारा सरकारी अधिकारियों के पास मौजूद व्यक्तिगत जानकारी उजागर करने से संबंधित है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता को छूट न देना प्रेस की पूर्व-सेंसरशिप के समान है और इससे समाचार कवरेज पर गंभीर असर पड़ सकता है।
दीवान ने कहा कि पहले के कानूनों में पत्रकारिता को छूट दी गई थी और सवाल किया कि यह छूट बरकरार क्यों नहीं रखी गई। याचिका में डाटा संरक्षण कानून और उससे जुड़े नियमों के कई प्रविधानों को असंवैधानिक घोषित कर रद करने की मांग की गई है। इसमें कहा गया है कि पत्रकारिता को छूट नहीं मिलने से खोजी पत्रकारिता कमजोर पड़ सकती है और सूत्रों की गोपनीयता से समझौता हो सकता है। (समाचार एजेंसी PTI के इनपुट के साथ)
