यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 15, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
टूट के बाद शरद यादव को होगी ज्यादा मुश्किल
नई दिल्ली [आशुतोष झा]। भाजपा से वर्षो पुरानी दोस्ती तोड़ना जदयू के लिए राजनीतिक मजबूरी भले ही हो, अगला दोस्त ...और पढ़ें

नई दिल्ली [आशुतोष झा]। भाजपा से वर्षो पुरानी दोस्ती तोड़ना जदयू के लिए राजनीतिक मजबूरी भले ही हो, अगला दोस्त चुनना या न चुनना उसका भविष्य तय करेगा। गैर कांग्रेसवाद पर उपजे जदयू ने अगर कांग्रेस का दामन थामा तो केंद्र में पार्टी अपने इतिहास को अपने ही हाथों मिटा देगी। महंगाई व अन्य मुद्दों पर गैर राजग दलों को भी साथ खड़ा करने में सफल रहे जदयू अध्यक्ष शरद यादव के लिए भी यह बड़ी चुनौती होगी।
कांग्रेस और नीतीश कुमार के बीच पिछले कुछ महीनों में काफी कुछ बदला है। नए साथी तलाश रही कांग्रेस ने ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ा जिससे नीतीश को साधा जा सके। बिहार में नीतीश सरकार को समर्थन देने के मुद्दे पर भी कांग्रेस में उत्साह है। यह बिहार की राजनीति के साथ केंद्र की राजनीति में भी परिवर्तन ला सकता है।
जदयू अध्यक्ष शरद यादव विपक्ष में फिलहाल अकेले ऐसे नेता हैं जो गैर राजग और गैर संप्रग दलों को इकट्ठा करते रहे हैं। शरद शायद ही इसके लिए तैयार हों कि संप्रग का हाथ थामकर जदयू केंद्र में अपनी आवाज खो दे।
यह भी सच्चाई है कि केंद्रीय स्तर पर जदयू की ताकत का कारण राजग गठबंधन का बड़ा संख्या बल है। शरद राजग के संयोजक हैं। राजग के साथ संप्रग से भी दूरी जदयू को 20 सदस्यों वाली उन पार्टियों के खेमे में खड़ा कर देगा जो समय-समय पर अलग-थलग दिखती रही हैं।
मोबाइल पर ताजा खबरें, फोटो, वीडियो व लाइव स्कोर देखने के लिए जाएं m.jagran.com पर
