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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 16, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

अब गाय का भी बनेगा आधार कार्ड

By Babita KashyapEdited By:
Published: Fri, 16 Jun 2017 11:31 AM (IST)Updated: Sat, 17 Jun 2017 08:49 AM (IST)

प्रदेश में जुलाई से इसे शुरू किया जा रहा है और पांच वर्ष बाद होने वाली पशुओं की गणना का कार्य भी एक साथ होगा।

अब गाय का भी बनेगा आधार कार्ड
अब गाय का भी बनेगा आधार कार्ड

 मंडी, काकू चौहान। व्यक्तियों की पहचान कराने वाला आधार कार्ड अब गायों की भी पहचान करेगा। गाय और अन्य पालतु पशुओं का भी आधार कार्ड बनेगा, जिसमें नस्ल, नाम, आयु और दूध सहित अन्य जानकारी दर्ज होगी। पशुपालन विभाग के निदेशकयुनूस अंसारी ने दैनिक जागरण से विशेष बातचीत में बताया कि प्रदेश में जुलाई से इसे शुरू किया जा रहा है और पांच वर्ष बाद होने वाली पशुओं की गणना का कार्य भी एक साथ होगा। आधार कार्ड लावारिस पशुओं की समस्या को समाप्त करने में मददगार होगा और सड़कों पर लावारिस पशुओं को छोडऩे वालों पर नकेल कसेगा। इसका सारा रिकॉर्ड नेशनल डेयरी डेवेल्पमेंट बोर्ड आंनद गुजरात में एकत्रित होगा, जिसे कोई भी कहीं भी अपने मोबाइल एप व कंप्यूटर पर देख सकेगा। प्रस्तुत है पशुपालन विभाग के निदेशक से बातचीत के महत्वपूर्ण अंश। 

विभाग ने कई योजनाएं चलाई फिर भी लावारिस पशुओं की संख्या बढ़ी है, क्यों?

लावारिस पशुओं की संख्या बढऩे के कई कारण हैं, लोगों की मानसिकता, पोषक तत्व युक्त चारे की कमी और गाय के दूध न देने पर उसे सड़कों पर छोड़ दिया जाता है, जबकि बेलों और बछड़ों को खेती का काम कम करने के बाद ऐसे ही छोड़ा जा रहा है।

लावारिस पशुओं के बढऩे का कारण क्या कृत्रिम गर्भाधान की असफलता भी है?

वर्ष 2012 की पशु गणना के अनुसार प्रदेश में 32160 लावारिस पशु हैं। कृत्रिम गर्भाधान की सफलता का प्रतिशत अन्य राज्यों की अपेक्षा हिमाचल में बेहतर है और यह 45 फीसद तक है। कृत्रिम गर्भाधान के असफल होने के कई कारण हैं, जिसमें मुख्य रुप से समय पर टीका न लगना और उचित देखभाल की कमी है। प्रदेश में वर्तमान में 3046 कृत्रिम गर्भाधान केंद्र हैं।

गाय की नस्ल का पता कैसे लगेगा, जबकि उसका रिकॉर्ड ही नहीं है?

अब पशुपालन विभाग के फार्मासिस्टों व सहायकों को टैब दिए जा रहे हैं। टीका लगाने से पहले उसमें सारी जानकारी दर्ज होगी कि किस नस्ल का टीका लगा और क्या परिणाम आया, सब दर्ज होगा। जल्द ही पशुओं के बीमा की योजना को सात जिलों में आरंभ किया जा रहा है। यह भी दर्ज रहेगा।

विभाग ने टैगिंग भी की और टैटू भी बनवाए, फिर भी पशुओं को लावारिस छोडऩे पर कार्रवाई क्यों नहीं की जाती?

पशुओं की गणना तो हर पांच वर्ष बाद की जाती है, लेकिन उनकी पहचान की कोई व्यवस्था नहीं है। अब गायों का भी आधार कार्ड बनेगा और जुलाई से टैगिंग की जाएगी। इस प्लास्टिक की टैगिंग में सारी जानकारी किस नस्ल की गाय, उम्र, कितना दूध देती है, मालिक का नाम आदि होगा और मोबाइल व कंप्यूटर पर आधा नंबर डालते ही सारी जानकारी सामने होगी।

 अब लावारिस पशु पाए जाने पर तुरंत पता चल जाएगा कि आखिर किसका पशु है। पहले जो टैग लगाई थी वह भारी थी और अपने आप खुल जाती थी और जानकारी भी कोई नहीं होती थी। अब जो टैगिंग की जाएगी, उसका वजन केवल आठ ग्राम होगा और कान के बीच में लगाया जाएगा। 

गौ संवर्धन बोर्ड का गठन किया गया है, वह क्या काम कर रहा है?

यह बोर्ड नई गौशालाएं नहीं खोलेगा, बल्कि गोशालाओं का संवर्धन करेगा और तकनीकी सहायता प्रदान करेगा। इसके तहत उत्तम पशु पुरस्कार योजना में बेहतर गोसदन को प्रथम रहने पर 15 लाख, द्वितीय को 10 लाख और तृतीय को पांच लाख रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा। वर्तमान में 130 के करीब गोसदन चल रहे हैं और इसमें से अभी कोई भी पंजीकृत नहीं है। पंजीकरण के लिए सोसायटी पंजीकृत होने के साथ उसका पूरा आय-व्यय का ब्योरा चार्टड अकाउंटेंट से सत्यापित होना चाहिए व गोसदन की जमीन सोसायटी के नाम होनी चाहिए। गोसदन को आर्थिक मदद, जिसमें चारा आदि की सुविधा भी प्रदान की जाएगी।

प्रस्तुति: यादवेंद्र शर्मा, शिमला

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