राहुल की परीक्षा
जब माना यह जा रहा थाकि राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित ही होने वाले हैं तब कांग्रेस ने उन्हें केवल चुनाव प्रचार की कमान सौंपने का फैसला किया। इस फैसले को लेकर तर्क यह दिया गया कि कांग्रेस में पीएम प्रत्याशी घोषित करने की कोई परंपरा नहीं है, लेकिन देश को अच्छी तरह स्मरण है कि कांग्रेस 2009 में मनमोहन सिंह को आगे करके ही चुनावी मैदान में उतरी थी। कहीं कांग्रेस ठिठक तो नहीं गई? क्या वह राहुल को नरेंद्र मोदी से सीधा मुकाबला करते हुए नहीं देखना चाह रही थी? इन सवालों के जवाब सामने आएं या नहीं, यह तय है कि उनका मुकाबला मोदी से ही होने जा रहा है और आम चुनाव उनकी नए सिरे से परीक्षा लेगा। यह हर लिहाज से एक कठिन परीक्षा होगी और इसमें उनका वह योगदान सहायक नहीं बनेगा जो उन्होंने पिछले आम चुनाव में अपनी मां के साथ दिया था और जिसके चलते कांग्रेस को अप्रत्याशित सफलता हासिल हुई थी। पिछले साढ़े चार सालों में हालात बहुत बदल चुके हैं। सबसे बड़ा बदलाव यह हुआ है कि कांग्रेस की हालत एक डूबती नैया सरीखी हो गई है। अब इस नैया का भविष्य राहुल के हाथों में है और उनके सामने लोकप्रियता की तमाम सीढि़यां चढ़ चुके नरेंद्र मोदी के साथ-साथ आम आदमी पार्टी के करिश्माई नेता अरविंद केजरीवाल भी हैं, जो ज्यादा से ज्यादा लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने के लिए कमर कस रहे हैं। इसके अतिरिक्त अपने-अपने राज्यों में असर रखने वाले तमाम क्षेत्रीय दल भी हैं। कांग्रेस की मुश्किल यह है कि इन दलों में से ज्यादातर उसे कमजोर होते हुए देखने के लिए तैयार हैं।
राहुल के सामने चुनौती केवल लस्त-पस्त कांग्रेस में नई ऊर्जा का संचार करने की ही नहीं, बल्कि पार्टी के प्रति आम लोगों की धारणा बदलने की भी है। इसमें संदेह है कि साढे़ चार सालों तक भ्रष्टाचार पर चुप्पी साधे रहे राहुल अब खुद को भ्रष्टाचार से लड़ने वाले विश्वसनीय योद्धा के रूप में सफलतापूर्वक पेश कर सकेंगे। उनका ऐसी छवि से लैस होना इसलिए और मुश्किल है, क्योंकि उन्हें इसके लिए ज्यादा जाना जाता रहा है कि देश को उद्वेलित करने वाले तमाम मसलों पर वह मुश्किल से ही कुछ बोले। यह सही है कि राहुल गांधी युवा हैं, उत्साही हैं और नए विचारों से लैस होने के साथ-साथ राजनीति में बुनियादी बदलाव के हामी भी हैं, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि वह अपने ही दल के तौर-तरीकों को बदलने के लक्ष्य को हासिल नहीं कर सके हैं। इसमें दो राय नहीं कि पूरी कांग्रेस उनके पीछे खड़ी है और उन्हें ही अपने उद्धारक के रूप में देख रही है, लेकिन इस पर अभी भी संदेह बरकरार है कि कांग्रेस की नई-पुरानी पीढ़ी के नेता उनके साथ कदमताल कर सकेंगे। इस पर भी गौर करें कि इन नेताओं की ज्यादातर ऊर्जा राहुल गांधी का बचाव करने और उनके राजनीतिक विरोधियों, खास तौर पर नरेंद्र मोदी को खारिज करने में खपती रही है। देखना है कि वे यही काम केजरीवाल के मामले में करते हैं या उनसे निपटने के लिए किसी अन्य रणनीति पर चलते हैं? जो भी हो, यह स्पष्ट है कि चुनौतियों से पार पाने के लिए राहुल के साथ-साथ कांग्रेस को अपनी रीति-नीति में व्यापक और जनता में भरोसा पैदा करने वाले बदलाव लाने होंगे।
[मुख्य संपादकीय]
मोबाइल पर ताजा खबरें, फोटो, वीडियो व लाइव स्कोर देखने के लिए जाएं m.jagran.com पर












