बढ़े मतदान का मतलब
यह उत्साहजनक है कि अन्य राज्यों की तरह दिल्ली में भी अपेक्षा के अनुरूप मतदान हुआ और यहां भी मतदान प्रतिशत का रिकार्ड कायम हुआ। दिल्ली में 65 प्रतिशत से अधिक मतदान यह बताता है कि यहां के मतदाताओं ने इस बार इस तमगे को उतार फेंकने का मन बना लिया था कि देश की राजधानी के बाशिंदे मतदान करने में रुचि नहीं रखते। यह एक शुभ संकेत है कि छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, मिजोरम और राजस्थान में भी मतदान प्रतिशत के रिकार्ड टूटे। इन पांचों राज्यों में बढ़-चढ़कर हुआ मतदान प्रतिशत लोकतंत्र के प्रति आम जनता की आस्था को बयान करता है। बढ़े हुए मतदान प्रतिशत के लिए जितना श्रेय आम जनता को जाता है उतना ही निर्वाचन आयोग को भी। निर्वाचन आयोग को इसके लिए बधाई दी ही जानी चाहिए कि वह राजनीतिक दलों के असहयोग के बावजूद चुनाव प्रक्रिया के प्रति आम लोगों का भरोसा बढ़ाने में कामयाब है। पांचों राज्यों में रिकार्ड तोड़ मतदान प्रतिशत इसलिए और अधिक उल्लेखनीय है कि इसके पीछे युवा मतदाताओं की भी भागीदारी नजर आती है। चुनावी प्रक्रिया में युवाओं की बढ़-चढ़कर भागीदारी लोकतंत्र की जड़ों को मजबूती प्रदान करने वाली है। वैसे मतदाताओं को उत्साहित करने के तमाम अभिनव प्रयासों के साथ मतदाता सूचियों से फर्जी मतदाताओं को निकाल बाहर कर मतदान प्रतिशत बढ़ाने में सफल रहेनिर्वाचन आयोग के लिए अभी बहुत कुछ करना शेष है। यह जितना स्वागतयोग्य है कि इस बार फर्जी मतदाताओं की दाल नहीं गली वहीं यह चिंता का विषय भी है कि बहुत से लोग मतदाता पहचान पत्र होने के बावजूद इसलिए अपने वोट का इस्तेमाल नहीं कर सके, क्योंकि मतदाता सूची में उनका नाम था ही नहीं।
बढ़े हुए मतदान प्रतिशत के पीछे इस कारण को रेखांकित किया जाना स्वाभाविक ही है कि ऐसा बदलाव की चाहत की वजह से हुआ, लेकिन बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में इस पुरानी धारणा को पूरी तरह सही नहीं कहा जा सकता। इसकी पुष्टि मतदान बाद होने वाले सर्वेक्षण अर्थात एक्जिट पोल भी कर रहे हैं। हालांकि एक्जिट पोल पूरी तस्वीर नहीं दिखाते और विगत में उनके नतीजे वास्तविक नतीजों से भिन्न भी रहे हैं, लेकिन वे मतदाताओं के रुझान के बारे में काफी कुछ संकेत भी देते हैं। यह समय ही बताएगा कि एक्जिट पोल के नतीजे वास्तविक नतीजों के कितना करीब पहुंचते हैं, लेकिन उन्हें सिरे से खारिज भी नहीं किया जा सकता। इस बार विधानसभा चुनावों की एक खास बात यह भी रही कि मतदाताओं को नोटा अर्थात सभी प्रत्याशियों को नकारने के रूप में एक नया अधिकार मिला। कई स्थानों पर इसका इस्तेमाल भी हुआ, लेकिन अभी यह अधिकार कुल मिलाकर निष्प्रभावी ही अधिक है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इस अधिकार के इस्तेमाल से चुनाव नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ने जा रहा। सुप्रीम कोर्ट ने मतदाताओं को मिले इस अधिकार को प्रभावी बनाने की जिम्मेदारी संसद अर्थात राजनीतिक दलों पर डाली है। देखना है कि वे अपनी इस जिम्मेदारी को किस तरह पूरा करते हैं। राजनीतिक दलों से यह भी अपेक्षित है कि वे लंबित चुनाव सुधारों के प्रति भी दिलचस्पी दिखाएं ताकि चुनाव प्रक्रिया वास्तव में लोकतंत्र के ऐसे पर्व के रूप में निखर सके जिसमें आम जनता वैसे ही उत्साह से भाग ले जैसे इस बार भाग लिया।
[मुख्य संपादकीय]
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