सूखे की चिंता
देश में विभिन्न हिस्सों में सूखे की गंभीर स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता सर्वथा उचित है। चूंकि देश के कुछ हिस्से ऐसे हैं जहां लगातार दूसरे वर्ष सूखे की स्थिति है इसलिए इससे निपटने के लिए राज्य एवं केंद्र सरकारों को अपेक्षा के अनुरूप सतर्कता का परिचय देने की
देश में विभिन्न हिस्सों में सूखे की गंभीर स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता सर्वथा उचित है। चूंकि देश के कुछ हिस्से ऐसे हैं जहां लगातार दूसरे वर्ष सूखे की स्थिति है इसलिए इससे निपटने के लिए राज्य एवं केंद्र सरकारों को अपेक्षा के अनुरूप सतर्कता का परिचय देने की जरूरत है। अच्छा होता कि सुप्रीम कोर्ट को केंद्र सरकार एवं संबंधित राज्य सरकारों को उनके दायित्व की याद नहीं दिलानी पड़ती। यह निराशाजनक है कि रह-रहकर ऐसे मामले सामने आते रहते हैं जिनमें सुप्रीम कोर्ट को कभी राज्य सरकार को उसके कर्तव्य का स्मरण कराना पड़ता है और कभी केंद्र सरकार को। जब ऐसा होता है तब ऐसे भी स्वर उभरते हैं कि न्यायपालिका आवश्यकता से अधिक सक्रियता का परिचय दे रही है, लेकिन प्रश्न यह है कि जब गंभीर मामलों में शासन अपने दायित्वों का निर्वहन करने के लिए तत्पर न हो तो न्यायपालिका के समक्ष दखल देने के अलावा उपाय ही क्या है? सूखे से निपटने के उपाय तो तभी सोच लिए जाने चाहिए थे जब यह आशंका सच साबित होती दिख रही थी कि देश के कुछ हिस्से पानी की जबरदस्त किल्लत का सामना कर सकते हैं। ऐसा लगता है कि जरूरी उपाय समय रहते नहीं किए गए।
जो भी हो, सूखे के संदर्भ में बांबे उच्च न्यायालय की इस टिप्पणी से सहमत नहीं हुआ जा सकता कि आइपीएल के मैच अहम हैं या लोग। आइपीएल एक अलग मसला है और महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में सूखे के चलते पानी की किल्लत अलग। इन दोनों मामलों को इसके बावजूद एक करके नहीं देखा जाना चाहिए कि जिन स्टेडियमों में आइपीएल के मैच होने हैं वहां पानी की खपत होनी है। ऐसा इसलिए, क्योंकि इस पानी का इस्तेमाल महाराष्ट्र के उन इलाकों में किया जाना संभव नहीं है जहां उसकी किल्लत है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि यदि महाराष्ट्र में आइपीएल के मैच न हों तो सूखे के संकट का मुकाबला करने में आसानी होगी। इसमें दो राय नहीं कि महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में सूखे ने गंभीर हालात उत्पन्न कर दिए हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि अन्य सारे कार्य रोक दिए जाएं। यह पहली बार नहीं है जब अलग-अलग क्षेत्र की समस्याओं को एक साथ नत्थी किया गया और इस तरह के तर्क दिए गए कि जब देश में इतनी गरीबी और अशिक्षा है तब अमुक-अमुक आयोजन क्यों किए जा रहे हैं? दुर्भाग्य से इस तरह के तर्क रह-रहकर दिए जाते हैं। कभी यह कहा जाता है कि जब देश के अनेक हिस्सों में आवागमन के पर्याप्त साधन नहीं हैं तो तेज गति की ट्रेन चलाने की कोशिश क्यों की जा रही है? खेल आयोजनों के मामले में तो इस तरह के तर्क कुछ ज्यादा ही दिए जाते हैं। यदि यह मान भी लिया जाए कि आइपीएल के मैच महज मनोरंजन का माध्यम हैं तो भी क्या इससे इन्कार किया जा सकता है कि मनोरंजन संबंधी आयोजनों की अपनी एक महत्ता है और इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि आइपीएल न केवल एक बड़ा ब्रांड बनकर उभरा है, बल्कि वह एक नए तरह के सफल उद्यम का परिचायक बन गया है। यह अच्छा हुआ कि बांबे उच्च न्यायालय ने अपना रुख नरम करते हुए आइपीएल के उद्घाटन मैच को मंजूरी दे दी है। यह आवश्यक ही नहीं, बल्कि अनिवार्य है कि महाराष्ट्र सरकार जितनी सक्रियता और तत्परता आइपीएल के मैच कराने के लिए दिखाए उतनी ही सूखे का सामना करने के लिए भी।
[ मुख्य संपादकीय ]







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