मकर संक्रांति (14-15 जनवरी) के बाद से मौसम में कम, लेकिन राजनीति में गर्माहट तेजी से बढ़ी है। अब लगने लगा है कि आम चुनाव करीब आ रहे हैं। वार्म-अप एक्सरसाइज यह कि राज्य के सत्तारूढ़ और प्रमुख विपक्षी दल ने राज्यसभा चुनाव के लिए अपने-अपने प्रत्याशी 26 जनवरी से पहले घोषित कर दिए। नाम का चयन करने में दोनों संगठनों के भीतर जो माथापच्ची, यानी अंतर्सघर्षण हुआ, उससे काफी राजनीतिक ऊष्मा पैदा हुई। राज्यसभा के लिए बिहार के सभी पांच प्रत्याशियों के नामों की घोषणा हो गई है और इन लोगों ने नामांकन भी कर दिया है। जदयू ने एक पत्रकार, एक पूर्व मंत्री और राज्य महिला आयोग की वर्तमान अध्यक्ष को उम्मीदवार बनाने का फैसला किया। सार्वजनिक रूप से इसकी घोषणा कर कई संदेश भी दिए। पहला संदेश आम मतदाताओं के लिए है, जो कुछ महीने बाद लोकसभा चुनाव के लिए वोट डालने वाले हैं। जदयू ने ऊंचे स्वर में यह कहना चाहा है कि वह समर्थक बुद्धिजीवी, महिला, अल्पसंख्यक और अतिपिछड़ा वर्ग की राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए परोक्ष मतदान की प्रक्रिया में भी काफी संजीदा है। पार्टी यह भी बताना चाहती है कि उसके यहां राज्यसभा के टिकट पार्टी के आंतरिक पावर-ग्रुप के दबाव या किसी समझौते से तय नहीं हुए हैं। इसके समानान्तर भाजपा ने एक सक्रिय राजनेता और नामचीन चिकित्सक को दूसरा टर्म देने का फैसला किया है। वे पूर्व मंत्री भी हैं। पार्टी ने दूसरा टिकट जिन्हें दिया है, उनका संगठन में बड़ा योगदान है। कई बार से वे प्रतीक्षा सूची में डाले जा रहे थे, इसलिए और इंतजार कराना मुनासिब नहीं समझा गया। भाजपा के दोनों प्रत्याशी उच्च सामाजिक-आर्थिक वर्ग से आते हैं, इसलिए सादगी और समावेशी राजनीति के इस दौर में इनसे आम मतदाताओं के बीच कोई बड़ा संदेश दिए जाने की उम्मीद नहीं की गई है।

राज्यसभा चुनाव में टिकट तय करना दलों का आंतरिक मामला है, लेकिन इसके साथ ही इस बात पर बहस गरम हो गई है कि उच्च सदन में लोगों को भेजने के संवैधानिक प्रावधान का उपयोग वस्तुत: किस प्रकार होना चाहिए और इस गणतंत्र में कौन इस व्यवस्था का कितना सही उपयोग कर रहा है। आम शिकायत यह है कि सक्रिय नेताओं के पुनर्वास या सुरक्षित वास बन रहा है उच्च सदन, जबकि जीवन के दूसरे क्षेत्रों में सक्रिय लोग बड़ी मुश्किल से वहां पहुंच पाते हैं। इस चर्चा से इतर परिदृश्य यह है कि आम चुनाव के लिए दलों के बीच सीट को लेकर तालमेल-गठबंधन और नये दल से जुड़ने की प्रक्रिया को गति मिल रही है। इसके जरिए भी मतदाता-समूहों के लिए इशारेबाजी शुरू हो गई है। पिछले लोकसभा चुनाव में अपने निराशाजनक प्रदर्शन से उबरने की छटपटाहट राजद में दिख रही है। गठबंधन के लिए पार्टी अधीर है, लेकिन कांग्रेस की ओर से हो रही सीटों की मांग का दबाव गर्मी पैदा कर रहा है। मौसम तेजी से बदलने लगा है।

[स्थानीय संपादकीय: बिहार]

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