वर्तमान लोकसभा चुनावों का कोई भी परिणाम निकले, लेकिन इसे मोदी केंद्रित चुनाव मानने में कोई संदेह नहीं। इसमें भी कोई शक नहीं कि मोदी ने अथक परिश्रम कर इस चुनाव को यह स्वरूप दिया। एक अजीब बात यह है कि भाजपा ने चुनाव प्रचार की वह शैली अपनाई जो कांग्रेस की विरासत रही है, जिसमें नेहरू, इंदिरा, राजीव आदि के नाम पर कांग्रेस के लिए वोट मांगे जाते थे। ठीक उसी शैली में इस बार मोदी के नाम पर भाजपा के लिए वोट मांगे जा रहे हैं। कहीं-कहीं तो मतदाता को यह भी पता नहीं कि स्थानीय प्रत्याशी कौन है। वह तो ईवीएम में मोदी के लिए कमल का निशान ढूंढ़ रहा है। जहां पर भाजपा ने किसी अन्य दल से गठबंधन कर उसे सीट दी है वहां मतदाता को निराशा हो रही है कि उसे कमल का निशान नहीं मिला। भाजपा ने इस चुनाव को पूर्णत: मोदीमय बना दिया है।

इससे मोदी ने एक तीर से कई निशान किए। उन्होंने न केवल अपने को चुनावी दौड़ में काफी पहले से लाकर बढ़त हासिल कर ली, बल्कि राहुल गांधी में अपना प्रतिस्पर्धी भी तैयार किया और उसे न केवल जनता के सामने एक्सपोज किया, बल्कि वाद-विवाद में परास्त भी किया। दूसरे, मोदी ने सभी प्रमुख दलों को जहां अपने विरुद्ध लामबंद होने दिया वहीं उनमें परस्पर वैचारिक और राजनीतिक विरोधाभास उभरने दिया, जिससे मतदाता के मन में उनकी एकता और राष्ट्रीय नेतृत्व को लेकर संशय पैदा हो जाए। तीसरे, मोदी ने सामूहिकता में वैयक्तिकता का कमल खिलाया और पूर्व जनसंघ से लेकर वर्तमान भाजपा तक के सफर में पहली बार पार्टी का राष्ट्रीय चुनाव प्रचार इतना एक-व्यक्तिमूलक रहा। आश्चर्य यह कि इस प्रयास को संघ का समर्थन रहा और संघ के स्वयंसेवकों ने जमकर प्रचार किया।

परिणाम स्वरूप मोदी-लहर की चर्चा शुरू हो गई। जाहिर है सभी प्रमुख विरोधी दलों, यहां तक कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी मोदी-लहर को नकारने की जरूरत समझी। बहुतों ने मीडिया पर आरोप लगाए कि मोदी-लहर केवल मीडिया की करामात है और केवल मीडिया में ही है। लेकिन क्या वास्तव में यह सच है? संभवत: मीडिया लहर को उत्पन्न नहीं कर सकता, वह तो उसे प्रदर्शित कर सकता है। ऐसी लहरें लोकतंत्र में आया-जाया करती हैं। चुनाव में लहर का अर्थ क्या है और उसका स्वरूप क्या होता है? इसे उत्तार प्रदेश के उदाहरण से बखूबी समझा जा सकता है। विगत 50 वषरें में प्रदेश में तीन लोकसभा चुनावों में हमने चुनावी लहर देखी है। पहली लहर हमें 1971 में दिखी, जो बांग्लादेश युद्ध में विजय को लेकर इंदिरा गांधी के पक्ष में थी और जिसमें कांग्रेस को 78 में से 73 सीटों पर विजय मिली। दूसरी लहर हमें 1977 में दिखाई देती है, जो आपातकाल के दौरान कांग्रेस के अत्याचारों के दंड स्वरूप इंदिरा गांधी के विरुद्ध थी और जिसमें कांग्रेस को प्रदेश में 85 में एक सीट भी नहीं मिली। और तीसरी सहानुभूति-लहर 1984 के चुनावों में इंदिरा गांधी की हत्या के कारण कांग्रेस के पक्ष में दिखी, जिसमें पार्टी को 85 में 83 सीटें मिलीं।

यदि हम इन चुनावी लहरों का विश्लेषण करें तो दो बातें साफ दिखाई देती हैं। एक, चुनावी-लहर के लिए एक करिश्माई नेता अवश्य होना चाहिए जो उपरोक्त उदाहरणों में इंदिरा गांधी थीं। दो, चुनावी-लहर में विजेता को लगभग सभी सीटें मिलती हैं और पराजित दल को कुछ भी नहीं। इस दृष्टिकोण से यदि मोदी-लहर का विश्लेषण करें तो दो निष्कर्ष सामने आते हैं। प्रथम, इस लहर में लोगों में मोदी के प्रति विभाजित उत्साह है जो 1971 में इंदिरा गांधी के प्रति अविभाजित उत्साह से कम है। द्वितीय, इसमें कांग्रेस के प्रति उतना रोष नहीं जितना 1977 में आपातकाल के कारण कांग्रेस के प्रति था। इसलिए यह तो संभव नहीं कि मोदी-लहर के चलते भाजपा को सभी सीटें मिलें, लेकिन यह जरूर है कि परिवर्तन और विकास के मुद्दों के चलते भाजपा उत्तार प्रदेश में 1990 के दशक का अपना प्रदर्शन दोहरा सकती है, जिसमें उसे 1991 और 1996 में 52-52 और 1998 में 57 सीटें मिली थी, लेकिन मोदी लहर की उपस्थिति न तो पूरे देश में एक सी है, न ही उसकी तीव्रता सभी जगह समान है। यदि हम 1977 में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में जनता पार्टी की लहर को याद करें तो उसमें भी जहां उत्तार-भारत में लहर का स्वरूप प्रचंड था और हिमाचल, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, मध्य-प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल से उसे सभी सीटें मिलीं वहीं पश्चिम-भारत में हल्की लहर दिखी, लेकिन दक्षिण-भारत में उसका कोई प्रभाव नहीं दिखा। मोदी-लहर में ऐसा नहीं लगता कि दक्षिण भारत में ऐसी कोई सफलता भाजपा को मिलने वाली है। वहां कुछ राज्यों में पार्टी अच्छा प्रदर्शन कर सकती है, लेकिन इतना जरूर है कि भाजपा को कुछ ऐसे राज्यों में भी सीटें मिल सकती हैं जहां पिछले कई चुनावों में उसे निराशा हाथ लगी थी। लेकिन सबसे अहम बात यह है कि राजनीतिक रूप से अस्पृश्य भाजपा ने मोदी के नेतृत्व में न केवल दक्षिण के राज्यों में अपनी उपस्थिति दर्ज की है, वरन उसने राजग का काफी विस्तार किया और चाहे छोटे और महत्वहीन लगने वाले दल ही सही, लेकिन राजग को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया है।

मोदी लहर की दो और विशेषताएं हैं। एक, इसने जाति-धर्म के सरोकारों से हटकर समावेशी राजनीति को तरजीह दी और चाहे विरोधियों ने उसे सांप्रदायिकता बनाम पंथनिरपेक्षता बहस में कितना भी उलझाने की कोशिश की हो, वह विकास और सुशासन के मुद्दे पर केंद्रित रही। दो, उसने एक अज्ञात जनाकांक्षा के सैलाब को भी जन्म दे दिया है और अगर मोदी प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच पाए तो वही मोदी की सबसे बड़ी चुनौती होने वाली है। संकेत तो हैं कि मोदी की ताजपोशी को पक्का मानकर टीम मोदी उस चुनौती पर भी काम कर रही है। हो सकता है कि 16 मई को तमाम लोगों को एक शांत और हल्की मोदी लहर होने का अहसास हो।

[लेखक डॉ. एके वर्मा, राजनीतिक विश्लेषक हैं]