लिव-इन यानी सहजीवन संबंधों पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का विश्लेषण कर रहे हैं डॉ. विशेष गुप्ता

सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि लिव-इन संबंध न तो अपराध हैं और न ही पाप। फिर भी देश में ऐसे संबंध सामाजिक तौर पर अस्वीकार्य हैं। देश की शीर्ष अदालत ने लिव-इन संबंधों पर संसद से समुचित कानून बनाने को कहा है, जिसमें ऐसे रिश्तों में शामिल महिलाओं और बच्चों के हितों के संरक्षण का पर्याप्त प्रावधान हो। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दुर्भाग्य से सहजीवन को नियमित करने के लिए कोई प्रावधान नहीं है। सहजीवन खत्म होने के बाद इन संबंधों का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। सर्वोच्च न्यायालय ने अपना यह फैसला एक महिला की ओर से दायर अपील पर दिया है, जो बेंगलूर में एक शादीशुदा व्यक्ति के साथ लिव-इन संबंधों में रह रही थी। निचली अदालत और कोर्ट ने उसे इस मुद्दे पर कोई भी राहत देने से मना कर दिया था। अदालत ने साफ कह दिया है कि उसके संबंधों की प्रकृति वैवाहिक नहीं है। यह महिला भी इस सच्चाई से अच्छी तरह से अवगत थी कि जिसके साथ वह रह रही है वह विवाहित है। इस फैसले में जस्टिस केएस राधाकृष्णन और जस्टिस पीसी घोष ने यह साफ कर दिया है कि लिव-इन से जुडे़ सहसंबंधों को वैवाहिक संबंधों के दायरे में कतई नहीं रखा जा सकता। उन्होंने यह भी साफ किया कि ऐसे संबंधों के बढ़ते चलन के चलते कानून बनाने की भारी आवश्यकता है।

पीठ ने यहां तक कहा है कि पुरुष के विवाहित होने की पक्की जानकारी होने के बावजूद उससे लिव-इन रिलेशन बनाने वाली महिला को घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम-2005 के तहत गुजारा भत्ता नहीं दिया जा सकता। पीठ ने यह हकीकत स्वीकार की है कि मौजूदा समाज में इस तरह के संबंधों का चलन बढ़ रहा है। ऐसे रिश्तों से पैदा हुए बच्चों को तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। शीर्ष अदालत ने कुछ समय पहले भी दक्षिण भारतीय अभिनेत्री खुशबू के मामले में स्पष्ट कहा था कि ऐसा कोई कानून नहीं है जिसमें लिव-इन रिलेशनशिप और विवाह पूर्व यौन संबंध स्थापित करने पर प्रतिबंध लग सके। आपको ध्यान होगा कि 2005 में विभिन्न पत्रिकाओं में दिए अपने एक साक्षात्कार में खुशबू ने विवाह से पूर्व यौन संबंधों को जायज ठहराया था। खुशबू के ऐसे बयान के खिलाफ 22 आपराधिक मामले दर्ज हुए थे। उसी संदर्भ में खुशबू ने सुप्रीम कोर्ट में एक विशेष अनुमति याचिका दायर की थी। उसी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय बेंच ने अपना फैसले में साफ कर दिया था कि 'लिविंग टुगेदर' न तो अपराध है और न ही यह अपराध हो सकता है। कुछ लोगों का मत है कि विवाह पूर्व साथ-साथ रहना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन जीने की स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत आता है। इसलिए सहजीवन भी जीने का ही एक अधिकार है। दूसरी तरफ एक वर्ग का मानना है कि लिव-इन रिलेशनशिप को मान्यता मिलने पर आपराधिक दंड संहिता की धारा-125 के तहत दी गई पत्नी की परिभाषा ही बदल जाएगी। इस प्रकार के विवाह पूर्व सहजीवन संबंधों से कानूनी अड़चनें तो पैदा होंगी ही, वैधानिक विवाह से जुड़े यौन संबंधाें के ढांचे के भी रूपांतरित होने का भय मौजूद है। यही वजह है कि सामाजिक द्वंद्व के इस माहौल में इस प्रकार के च्वलंत मुद्दे पर देश में आज स्वस्थ बहस करने की जरूरत महसूस की जा रही है।

सवाल उठता है कि यदि समाज का एक उदार वर्ग सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं का बंधन स्वीकार किए बिना विवाह पूर्व 'लिविंग-टुगेदर' की संस्कृति का अनुकरण करना चाहता है तो क्या इस विकल्प को स्वीकार कर लेना चाहिए? उच्चतम न्यायालय ने फिलहाल लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी दायरे में लाने के पक्ष में अपनी राय व्यक्त कर दी है, परंतु वास्तविकता यह है कि भारतीय समाज का लोकमन अभी इतना प्रगतिवादी नहीं हो पाया है जो नैतिक मूल्य व्यवस्था के उल्लंघन को सीधे स्वीकार कर सके। दूसरी ओर यह भी सच्चाई है कि देश में सर्विस सेक्टर के तेजी से फैलने से लिविंग-टुगेदर की अवधारणा समाज की सतह पर तेजी से उभर रही है। इन घटनाओं से सीधे तौर पर मुंह भी नहीं मोड़ा जा सकता। सहजीवन की संस्कृति इतिहास में किसी न किसी रूप में विद्यमान रही है, परंतु इतना जरूर है कि ऐसे संबंध रखने वाले लोगों को समाज अच्छी नजर से नहीं देखता। समाज का जो वर्ग इस प्रकार के संबंधों की वकालत कर रहा है उसे यह समझ लेना चाहिए कि यह अवधारणा पश्चिम की देन है। भारत में यह दर मात्र 2 फीसदी से अधिक नहीं है। निश्चित ही 'लिविंग-टुगेदर' से जुड़े संबंधों के चलते अदालतों में ऐसे मामलों में कई गुना वृद्धि होने की संभावनाएं हैं। भविष्य में लिव-इन-रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता मिलने के बाद जहां एक ओर ऐसे लिव-इन संबंधों को सुरक्षाकवच मिलेगा वहीं दूसरी ओर युवा वर्ग में इस प्रकार की खुली लिव-इन संस्कृति का भी तीव्र विस्तार होगा। फिलहाल इस मुद्दे का कानून के पास भी कोई इलाज नहीं है।

सहजीवन संस्कृति पर बहस अच्छी बात है, परंतु विवाह पूर्व स्वच्छंद व्यवहार अभी भी समाज को कम ही स्वीकार्य है। सहजीवन से जुड़े संबंधों का समाजशास्त्र यह संकेत देता है कि जब माता-पिता और बच्चों के बीच प्रेम व वात्सल्य के प्रदर्शन के साथ परिवार के भावनात्मक लगाव में कमी आने लगती है तो बच्चे आपसी साझेदारी के लिए दूसरे विकल्पों की तलाश करने लगते हैं। लिविंग टुगेदर की संस्कृति भी कहीं न कहीं आपसी संवाद के माध्यम से रागात्मक प्रेम की अभिव्यक्ति है। समाज लोगों की आपसी सहमति से ही विकसित हुआ संबधों का एक ताना-बाना है। समाज द्वारा स्वीकृत विवाह व परिवार जैसी संस्थाएं यदि खुली संस्कृति में शामिल होतीं हैं तो इसके लिए निश्चित ही कहीं न कहीं हमारी ही शिथिलता है। सहजीवन के संबंधों को सुरक्षा प्रदान करने के संदर्भ में उच्चतम न्यायालय के आदेश की सराहना होनी चाहिए, परंतु इसके साथ ही हमें विवाह संस्था की शुचिता संरक्षित करने के भी प्रयास करने चाहिए। वह इसलिए, क्योंकि विवाह की सफलता में ही परिवार की खुशहाली के राज छिपे हैं।

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