भारतीय जनता पार्टी शुरू में दावा करती थी कि वह अलग किस्म की पार्टी है। मुख्य रूप से उसका दावा था कि उसके अंदर भ्रष्ट लोग नहीं हैं और वह अपराधियों को सदस्य नहीं बनाती, किंतु धीरे-धीरे उसने यह दावा करना बंद कर दिया और उसकी राजनीति भी भ्रष्टाचार और अपराधीकरण का शिकार हो गई। अब आम आदमी पार्टी आई है, जो एक अलग किस्म का राजनीतिक दल होने का दावा कर रही है। अभी उसको अस्तित्व में आए डेढ़ साल भी नहीं हुए हैं और जिन चीजों को चुनौती देने के लिए यह पार्टी बनाई गई थी वह उसी राह पर चल पड़ी है।

धीरे-धीरे आम आदमी पार्टी भी बाकी राजनीतिक दलों जैसी ही बनती जा रही है। स्थिति यह है कि आप कार्यकर्ताओं में काफी असंतोष दिखाई पड़ने लगा है। आप से जुड़े काफी लोगों को अब लग रहा है कि उनके साथ धोखा हुआ है। इधर पार्टी में कई लोगों को बाहर से लिया गया और उन्हें उम्मीदवार भी बना दिया गया। इसमें तमाम बुद्धिजीवी, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम कर चुके लोग शामिल हैं। आम आदमी पार्टी में अथवा अन्ना आंदोलन से शुरुआत से ही जुड़े लोगों को लग रहा है कि पार्टी में बाहर से बाद में आए लोगों को उनसे ज्यादा महत्व दिया जा रहा है, किंतु कुमार विश्वास और शाजिया इल्मी जैसे लोगों को विचार करना चाहिए कि भले ही वे पार्टी में पहले से हों, लेकिन इस पार्टी को अस्तित्व में आए बहुत दिन नहीं हुए हैं। यहां तक कि मेधा पाटकर, राजमोहन गांधी, आशीष खेतान जैसे लोगों का अनुभव उनसे बहुत ज्यादा है। इसलिए बहुत स्वाभाविक है कि अनुभवी लोगों को महत्व दिया जाएगा।

इन घटनाक्रमों के मद्देनजर जमीनी कार्यकर्ता कहीं न कहीं इस बात से आहत हैं कि उम्मीदवार स्थानीय होने चाहिए थे, न कि बाहर से थोपे गए। वे सवाल खड़ा कर रहे हैं कि यदि बाहर का ही उम्मीदवार लाना था तो साक्षात्कार आदि का दिखावा अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने क्यों किया? केजरीवाल के स्वराज दर्शन के अनुसार तो चुनाव में खड़े होने वाले उम्मीदवारों के नाम स्थानीय लोगों को ही तय करने चाहिए थे, लेकिन निर्णय तो सारे दिल्ली में ही बैठ कर लिए गए। सबसे आपत्तिजनक बात आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं को यह लग रही है कि पार्टी ने नियम तोड़ कर उन लोगों को उम्मीदवार घोषित किया है जिन्होंने न तो फॉर्म भरा और न ही जिनका कभी साक्षात्कार हुआ। यह भी कहा जा रहा है कि साक्षात्कार के बहाने पार्टी को साक्षात्कार देने वाले लोगों की ओर से पांच-पांच सौ लोगों का विवरण मिल गया, जिन तक पार्टी की पहुंच हो गई। आम आदमी पार्टी ने चूंकि एसएमएस भेजकर अपने समर्थकों को कई अवसरों पर गोलबंद किया है, इसलिए चुनाव के समय ऐसे लोगों की जानकारी पार्टी के लिए काफी उपयोगी सिद्ध होगी। कुल मिलाकर बिना मेहनत के पार्टी के पास एक आधार तैयार हो गया है।

उम्मीदवारों के चयन में यह नहीं देखा जा रहा है कि कौन कितना ईमानदार है, बल्कि जो ज्यादा पैसा खर्च कर सकता है और जो भीड़ इकट्ठी कर सकता है उन्हें ही वरीयता दी जा रही है। आम आदमी पार्टी चाहती है कि उम्मीदवार इस लायक हों जो अपने चुनाव पर खुद पैसा खर्च कर सकें और उनसे पार्टी को भी लाभ हो। वैसे यह अन्ना आंदोलन के समय से ही शुरू हो गया था। इंडिया अगेंस्ट करप्शन में भी स्थानीय स्तर पर पैसे वालों और भीड़ इकट्ठा कर सकने वाले लोगों को महत्व दिया गया था।

अरविंद केजरीवाल चाहे लोकतंत्र की जितनी दुहाई दें, किंतु उनकी पार्टी में भी अंदरूनी लोकतंत्र नदारद है। कौन कब निर्णय की प्रक्रिया में शामिल कर लिया जाता है और कौन बाहर कर दिया जाता है, इसका पता ही नहीं चलता। यहां तक कि पार्टी में निर्णय कौन ले रहा है, यह भी बाकी लोगों के लिए रहस्य ही है। यानी जो समितियां बनी हैं वे भी नाममात्र की हैं। बाकी पार्टियों की तरह निर्णय पहले ले लिए जाते हैं और फिर समितियों से उन्हें पारित करवाया जाता है। पार्टी के संविधान में संशोधन कर कह दिया गया है कि पार्टी की केंद्रीय राजनीतिक मामलों की समिति जिला या राज्यस्तरीय पदाधिकारियों अथवा समितियों को बदलने का अधिकार रखती है। यानी पार्टी स्वराज के सिद्धांत के विपरीत जा रही है। जो सबसे गंभीर बात सामने आई है वह यह कि कुछ लोग जो जिम्मेदार पदों पर बैठे हैं उन्होंने मनमानी करनी शुरू कर दी है। उम्मीदवारों के चयन में पैसे लिए जाने तक के आरोप हैं। जो जिम्मेदार पदों पर बैठें हैं, पार्टी बनने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति में खासा सुधार दिखाई पड़ रहा है। लखनऊ में पार्टी से जुड़ने के बाद पार्टी के एक कार्यकर्ता के पास गाड़ी आने और महंगा फ्लैट लेने की जानकारी है। यदि आप के शीर्ष नेतृत्व ने भी अन्य पार्टियों की तरह इस तरह की चीजों से मुंह मोड़े रखने का फैसला लिया तो भ्रष्टाचार का घुन लगने में देर नहीं लगेगी, जो पार्टी को खोखला बना देगी।

अरविंद केजरीवाल का ताजा आरोप मीडिया पर है। उनका कहना है कि मीडिया पैसे लेकर मोदी को ज्यादा दिखा रहा है। उन्हें यह याद रखना चाहिए कि उनका आंदोलन भी मीडिया की ही देन है। देश भर में न जाने कितने मुद्दों पर आंदोलन होते हैं। इंफाल में इरोम शर्मिला को अनशन पर बैठे 13 वर्ष से ऊपर हो गए, किंतु देश के लोग ठीक से न तो इरोम को जानते हैं और न ही उसके मुद्दे को समझते हैं। अप्रैल 2011 में अन्ना हजारे जब अनशन पर बैठे तो टीवी चैनलों ने 24 घंटों का प्रसारण क्यों शुरू कर दिया, यह अभी भी लोगों के लिए एक रहस्य है। संघर्ष और विचारधारा की दृष्टि से मेधा पाटकर का दर्जा देश के सामाजिक कार्यकर्ताओं में सबसे ऊंचा है, किंतु उनके किसी अनशन को इस तरह मीडिया ने तवज्जो नहीं दी जैसी कि अन्ना हजारे के आंदोलन या केजरीवाल की पार्टी को दी। इसलिए अरविंद केजरीवाल को मीडिया से शिकायत करने का तो कोई अधिकार ही नहीं।

[लेखक संदीप पांडे, मैग्सेसे पुरस्कार विजेता सामाजिक कार्यकर्ता हैं]