नीति-नियंताओं का नया छल
पिछले दो सालों के अंदर केंद्र सरकार द्वारा भारतीय भाषाओं के मुंह पर जड़ा गया यह दूसरा बड़ा तमाचा है, जिसके जरिये उसने देश की राजभाषा हिंदी के साथ-साथ अन्य क्षेत्रीय भाषाओं से साफ-साफ कह दिया है कि तुम्हारी हैसियत ऐसी नहीं है कि तुम देश के ऊंचे पदों पर काम कर सको। यदि भारत के प्रशासकीय एवं अन्य पदों पर भारत की ही भाषा
पिछले दो सालों के अंदर केंद्र सरकार द्वारा भारतीय भाषाओं के मुंह पर जड़ा गया यह दूसरा बड़ा तमाचा है, जिसके जरिये उसने देश की राजभाषा हिंदी के साथ-साथ अन्य क्षेत्रीय भाषाओं से साफ-साफ कह दिया है कि तुम्हारी हैसियत ऐसी नहीं है कि तुम देश के ऊंचे पदों पर काम कर सको। यदि भारत के प्रशासकीय एवं अन्य पदों पर भारत की ही भाषा जानने वाला काम करने के लायक नहीं है तो फिर कौन इस लायक है? जाहिर है कि वह भाषा है अंग्रेजी, जिसे हिंदुस्तान में आए हुए अभी दो सौ साल भी नहीं हुए हैं और जिसे इस देश के महज दो प्रतिशत लोग ही जानते हैं। दो साल पहले केंद्र सरकार ने सर्वोच्च सिविल सेवा परीक्षा की प्रारंभिक परीक्षा में कुछ प्रश्न अंग्रेजी के रखकर समस्त भारतीय भाषाओं का मुंह चिढ़ाया था। इस फैसले के कारण कृषि प्रधान देश के गांवों में रहने वाले युवा इस परीक्षा से बाहर हो गए। जो थोड़ी-बहुत कसर बची थी वह मुख्य परीक्षा में अंग्रेजी को सौ नंबर की वरीयता देकर पूरी कर दी गई है। जब प्रारंभिक परीक्षा के द्वितीय प्रश्नपत्र में लगभग 12 प्रतिशत प्रश्न अंग्रेजी ज्ञान से संबंधित रखे गए थे तब छात्रों व अन्य संगठनों ने इसका विरोध किया था। सरकार के इस निर्णय के विरोध में एक याचिका दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्वीकार की थी, किंतु सरकार ने अब तक अदालत में अपना पक्ष न रखकर मामले को लटका दिया। सरकार के फैसले का संसद में जोरदार विरोध हुआ। विपक्षी दलों ने इसे जनविरोधी फैसला बताया। शिवसेना ने तो एक कदम बढ़कर यह कहते हुए आंदोलन छेड़ने की धमकी तक दे दी है कि वह महाराष्ट्र में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा ही नहीं होने देगी। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अपना विरोध दर्ज कराया है। पिछले लगभग 32 सालों तक अंग्रेजी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं के भी सम्मान के साथ चलने वाली व्यवस्था में अचानक ऐसी क्या कमी दिखाई देने लगी कि सरकार को इतना विचित्र एवं अलोकतांत्रिक निर्णय लेने के लिए बाध्य होना पड़ा? क्या सरकार ने इस दौरान की प्रशासनिक व्यवस्था की गुणवत्ता के अध्ययन के लिए कोई समिति बनाई थी, जिसकी सिफारिश पर उसे यह घोर प्रतिक्रियावादी, पश्चगामी एवं उच्चवर्ग के समर्थन वाला कदम उठाना पड़ा। उच्च न्यायालय को सरकार आखिर क्या जवाब देगी? यही कि अंग्रेजी के ज्ञान से रहित लोग उतने योग्य नहीं होते। यही कि अंग्रेजी के बिना दक्षिण भारत के राज्यों के साथ काम करने में केंद्र को दिक्कत होती है। यही कि उदारीकरण के दौर में अंग्रेजी के बिना काम नहीं चल सकता आदि-आदि। यदि सरकार की समस्त प्रशासकीय कार्य प्रणाली, भाषायी आवश्यकता एवं संवैधानिक प्रावधानों के संदर्भ में उसके इन अनुमानित तर्को को जांचा-परखा जाए, तो वे निहायत ही थोथे, बचकाने एवं यहां तक कि हास्यास्पद नजर आएंगे। आइए, कुछ ऐसा करते हैं। इससे पहले की पद्धति में भी अंग्रेजी का एक पूरा पेपर था, लेकिन उसे केवल पास करना अनिवार्य था। अन्यथा उस विद्यार्थी के अन्य विषयों की काॉपियां जांची ही नहीं जाती थीं। मूल अंतर इतना ही था कि अंग्रेजी एवं अन्य किसी एक भारतीय भाषा के पेपर के प्राप्तांक अंक सूची में जुड़ते नहीं थे। अब 1800 अंकों में 100 अंक अंग्रेजी के जुड़ेंगे। यहां छल यह कहकर किया गया है कि इसका स्तर दसवीं कक्षा का होगा। तो इस स्तर की अंग्रेजी की जांच तो पहले भी की जाती थी। फिर यह नया प्रावधान क्यों? यह इसलिए, ताकि अच्छी अंग्रेजी जानने वाला ही अंत में सफल हो सके। वैसे भी इससे पहले वाली परीक्षा में अंग्रेजी वालों के लिए तो सब कुछ खुला ही था। अब ऐसा करके उस खुलेपन को रिजर्वेशन में बदलने की घृणित चाल चली गई है। आइएएस तथा आइपीएस में भर्ती राज्यों के लिए होती है, केंद्र के लिए नहीं। इन अधिकारियों का अधिकांश जीवन अपने कैडर के राज्यों में बीतता है और वहां उनका कोई वास्ता अंग्रेजी जानने वाली तथाकथित आम जनता से नहीं पड़ता। इनमें से लगभग एक-चौथाई अधिकारियों को ही केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर काम करने का मौका मिलता है। तभी वैश्वीकरण की तथाकथित भाषा अंग्रजी की थोड़ी-बहुत जरूरत पड़ती है। यदि बिहार के एक आइएएस को तमिलनाडु कैडर मिलने पर तमिल सिखाई जा सकती है तो क्या अंग्रेजी का पर्चा पास किए हुए युवा विद्यार्थी की अंग्रेजी को थोड़ा सुधारा नहीं जा सकता? आखिर भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों को विदेशों की भाषा सिखाई ही तो जाती है। यह बात एकदम झूठ है कि बिना अंग्रेजी के आज के वैश्वीकरण में काम नहीं चल सकता। मैंने पूरे पांच साल राष्ट्रपति भवन में काम किया है, जहां सप्ताह में दो-तीन बार कोई न कोई विदेशी राजनयिक आता ही रहता है। मैं सोचता हूं कि क्या राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह का काम नहीं चला? चौधरी देवीलाल को उपप्रधानमंत्री बनाने से इस बात को आधार बनाकर इन्कार क्यों नहीं कर दिया गया कि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती। इस तरह के बहुत से प्रश्न इस अदूरदर्शी सरकार से पूछे जा सकते हैं। इस देश के ऊर्जावान युवाओं को वर्तमान सरकार के युवा आइकॉन तथा गांव की झोपड़ियों में जाकर भोजन करने वाले अपने युवा नेता से यह प्रश्न पूछना ही चाहिए कि आप भविष्य में किस तरह के लोकतंत्र का नेतृत्व करने वाले हैं, जिसमें आपके अधिकारियों के पास उनकी अपनी जबान ही नहीं होगी।
(डॉ. विजय अग्रवाल: लेखक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी हैं)
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