क्या चीन की साम्राज्यवादी मानसिकता में बदलाव संभव है? मुंबई पर 26-11 को हुए आतंकी हमले के मास्टरमाइंड जकी उर रहमान लखवी की रिहाई के खिलाफ भारत ने संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध समिति से कार्रवाई की मांग की थी। लखवी की रिहाई के खिलाफ अमेरिका, रूस, फ्रांस, जर्मनी ने भी चिंता व्यक्त करते हुए पाकिस्तान से उसकी गिरफ्तारी की मांग की थी। पाकिस्तान के अड़ियल रुख को देखते हुए भारत ने पिछले महीने प्रतिबंध समिति के प्रमुख जिम मैकले को पत्र लिखकर पाकिस्तान द्वारा संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का उल्लंघन करने के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की अपील की थी, किंतु चीन के हस्तक्षेप के कारण संयुक्त राष्ट्र के हाथ बंध गए। पाकिस्तान शुरू से ही मुंबई हमलों में लखवी की संलिप्तता से इंकार करता आया है। वह भारत के द्वारा उपलब्ध कराए गए साक्ष्यों को अपर्याप्त बताते हुए लखवी को निर्दोष बताता है।

अब चीन ने पाकिस्तान के साथ सुर मिलाते हुए भारत के पास पर्याप्त जानकारी नहीं होने का दावा किया है। इस जुगलबंदी का क्या कारण है? अभी हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी के चीन दौरे के वक्त जारी साझा बयान में चीन ने भी सभी देशों से आतंकी संगठनों के ढांचे और उनके आर्थिक स्नोतों को खत्म करने के लिए गंभीरतापूर्वक प्रयास करने की अपील की थी। ऐसे में चीन की यह उलटबांसी क्यों? वस्तुत: चीन के ये दोहरे मापदंड ही उसका मूल चरित्र है। 1962 का कटु अनुभव भारत के सामने है। चीन मित्रता का कितना भी ढोंग करे, एशिया में अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए वह निरंतर भारत को अस्थिर करने में जुटा है। आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान की आंख मूंदकर मदद करने के पीछे चीन की यही मानसिकता काम कर रही है।

लश्करे तैयबा के संस्थापक और जमात उद दावा नामक आतंकी संगठन के प्रमुख हाफिज सईद का करीबी लखवी कश्मीर में पाक पोषित आतंकवाद का सुप्रीम कमांडर है। 26 नवंबर, 2008 को मुंबई पर आतंकी हमला करने वाले जिहादियों की कमान उसके ही हाथों में थी। वह पाकिस्तान से ही निरंतर आतंकियों को निर्देश दे रहा था। भारत द्वारा उसकेखिलाफ दिए गए सबूतों और अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण पाकिस्तान ने उसे गिरफ्तार तो किया, किंतु पाकिस्तानी सेना और आइएसआइ की निरंतर यह कोशिश रही है कि उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत अदालत में पेश नहीं हों। आइएसआइ उसे जल्द रिहा देखना चाहती थी, ताकि वह कश्मीर में आतंकी गतिविधियों को गति दे सके। जेल में उसे फोन प्रयोग करने और परिजनों से मिलने की छूट थी। जेल में रहते हुए ही वह पिता भी बना। दिसंबर, 2014 में पेशावर में बच्चों के सामूहिक नरसंहार की हृदयविदारक घटना के दूसरे दिन लखवी को जमानत मिल गई। भारत के कड़े विरोध के बाद पाकिस्तान ने उसे लोक व्यवस्था नियंत्रण कानून के तहत पुन: गिरफ्तार करने का दिखावा किया, जिसकी परिणति नौ अप्रैल, 2015 को हुई, जब उसे लाहौर उच्च न्यायालय ने रिहा कर दिया।
1962 के युद्ध के बाद भारत और चीन के बीच मैत्री कायम करने के कई प्रयास हुए। मैत्री की आड़ में चीन ने अपना चोला भले ही कई बार बदला हो, किंतु भारत को अस्थिर करने की उसकी मूल रणनीति में कोई बदलाव नहीं है। भारत की दो हजार मील अंतरराष्ट्रीय सीमा चीन के साथ लगती है। आजादी से लेकर अब तक इस सीमा पर विवाद बरकरार है। चीन ने अक्साई चीन के 38 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर जहां अवैध कब्जा कर रखा है, वहीं अरुणाचल प्रदेश को भारत का अंग नहीं मानता। 2007 में चीन ने अरुणाचल प्रदेश के एक प्रशासनिक अधिकारी को इसीलिए वीजा देने से मना कर दिया था। अरुणाचल प्रदेश के 2011 के विधानसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चुनावी सभाओं का उसने कड़ा विरोध किया था। कश्मीर को वह विवादग्रस्त क्षेत्र मानता है।


चीन लंबे समय से भारत की सामरिक और आर्थिक घेरेबंदी में जुटा है। चीन केवल हमारी सीमाओं को निगलने के लिए लालायित नहीं है। दक्षिण चीन सागर की सीमाओं के लिए वह वियतनाम तो पूर्वी चीन सागर के कुछ द्वीपों को लेकर निरंतर जापान के साथ टकराव की मुद्रा में है। म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका आदि के बंदरगाहों पर चीन ने अपने सामरिक ठिकाने विकसित किए हैं तो पाक अधिकृत कश्मीर और तिब्बत में रेल और सड़कों का जाल बिछाकर हमें चारों ओर से घेरने की जुगत में है। चीन निर्मित सस्ते उत्पादों के कारण जहां भारत का कुटीर उद्योग चौपट हो चुका है वहीं उसकी नकली दवाइयों के कारण भारतीय औषध व्यापार को भी चूना लगा रहा है। भारत को अस्थिर करने के लिए ही वह आतंकवाद की पौधशाला पाकिस्तान को गले लगाए बैठा है, जबकि आतंकवाद को लेकर वह अपने यहां शून्य सहनशीलता’ की नीति को कड़ाई से निभाता है। अभी रमजान का महीना चल रहा है।

चीन परस्त भारतीय कम्युनिस्ट भले ही मुस्लिम समुदाय के कट्टरपंथी वर्ग की हर उचित-अनुचित मांग के समर्थन में सड़कों पर उतर आते हैं, किंतु चीन के कम्युनिस्ट मजहबी कट्टरपंथ का कड़ाई से दमन करते हैं। चीन के उइगर प्रांत के मुसलमानों को रमजान में रोजा रखने की छूट नहीं है। खाने-पीने की दुकानें नियमित समय पर खुलती हैं और सरकारी कार्यालयों और विद्यालयों में मजहबी रस्म अदा करने पर सख्त पाबंदी है। रोजा रखने को लेकर मचाए गए उपद्रव को रोकने के लिए पिछले दिनों सरकार ने 15 कट्टरपंथियों को मार गिराया।


कश्मीर में अलगाववाद की जिस समस्या से भारत दो-चार हो रहा है, ठीक वैसी ही स्थिति से सन 1949 में चीन को भी त्रस्त होना पड़ा था। शिनजियांग में कभी तुर्क मुसलमान (उइगर) बहुमत में थे और यह थोड़े समय के लिए 1949 में पूर्वी तुर्किस्तान का अंग बना। किंतु चीन ने उस पर आक्रमण कर उक्त क्षेत्र को पुन: अपने नियंत्रण में कर लिया। चीन ने उइगर मसले को अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के हस्तक्षेप से दूर रखने की हरसंभव कोशिश की है। शिनजियांग के उइगर मुसलमान लंबे समय से आजादी की मांग कर रहे हैं। समय-समय पर उनका हान जाति के चीनी नागरिकों के साथ हिंसक संघर्ष भी होता रहा है। शिनजियांग की कुल आबादी करीब दो करोड़ है, जिसमें उइगर मुस्लिमों का अनुपात 45 फीसद और अन्य मुसलमानों की आबादी 12 प्रतिशत है।

यहां चीन की हान जाति का 41 प्रतिशत भाग भी निवास करता है। किंतु 1949 में यहां हान जाति का अनुपात महज छह प्रतिशत ही था। छह दशकों में उनकी आबादी में करीब सात गुना वृद्धि हुई है। यह वृद्धि सेना के बूते नहीं हुई है। चीनी नेतृत्व ने अपने मूल वाशिंदों को बसाकर उक्त क्षेत्र पर प्रभुत्व कायम किया। कम्युनिस्ट चीन कीसेंसरशिप के कारण दुनिया को शिनजियांग संकट की वास्तविक हालत का पता नहीं है, किंतु आतंकवाद को लेकर जो चीन अपने देश में लोगों की मजहबी स्वतंत्रता का भी क्रूरतापूर्वक दमन करता है, उसी चीन के द्वारा संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद का समर्थन करना उसके दोहरे चरित्र का ही खुलासा करता है।
(लेखक बलबीर पुंज राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं)