अमेरिका और मोदी
पिछले कुछ दिनों में मैं एक आश्चर्यजनक निष्कर्ष पर पहुंचा हूं। मैं इस बात को लेकर चकित हूं कि मेरे अपने विचारों के उलट तमाम लोग ऐसे हैं जिनका निश्चित मत है कि डब्ल्यूटीओ समझौते के मद्देनजर भारत एक बड़ी गलती कर रहा है। इस संदर्भ में मेरा अपना सहज आकलन यही था कि जेनेवा में अंतहीन तमाम वार्ताओं का नतीजा अंतत: मामले को रफा-दफा करने जैसा होगा। क्या वाणिज्य मंत्रालय द्वारा किए जा रहे तमाम प्रयास कुछ रंग दिखा पाने में कामयाब होंगे और वह भी तब जब अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी अपने साथ बड़ी संख्या में अमेरिकी प्रतिनिधियों का दल लेकर भारत आए ताकि समझौते की कोई राह निकल सके और आगामी सितंबर माह में राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात के लिए जमीन तैयार हो सके। हालांकि इन बातों को लेकर हमें बहुत अधिक जल्दबाजी में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। जो भी हो, हमें इस बात को समझना चाहिए कि आर्थिक कूटनीति का महत्व सदैव राष्ट्रीय जीवन के संदर्भ में होता है। भारत द्वारा डब्ल्यूटीओ में वीटो को लेकर अमेरिकी प्रत्युत्तार को समझा जा सकता है। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों के साथ बातचीत का आकलन करने से पता चलता है कि वाशिंगटन ने भारत में बदले हुए माहौल और मई 2014 में सत्ता परिवर्तन के बाद नई सरकार के मद्देनजर बिल्कुल भी तैयारी नहीं की थी।
अमेरिका न तो नए प्रधानमंत्री को समझ सका और न ही उनके मुख्य सहयोगियों को जो कि नए विधानों और तौर-तरीकों को निर्धारित कर रहे हैं। यह विफलता इस भ्रामक अथवा गलत विश्वास के कारण पैदा हुई कि मोदी के नेतृत्व वाली मौजूदा राजग सरकार अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग की ही कार्बन कॉपी है। ओबामा प्रशासन के नीति निर्माताओं ने कुछ अनाम भारतीय वार्ताकारों से मिली जानकारी के आधार पर मोदी सरकार से सार्थक लाभ हासिल करने की दिशा में जल्दबाजी में कुछ निष्कर्ष निकाल लिए। इनमें से पहला निष्कर्ष यही था कि मोदी सरकार व्यवसाय व व्यवसायियों के प्रति अधिक अनुकूल है और इसकी नीतियों को उस दिशा में मोड़ा जा सकता है जिससे सकारात्मक बिजनेस माहौल में इजाफा होता हो। निश्चित ही यह कोई गलत आकलन नहीं था। हालांकि अमेरिका इस बात को समझ पाने में विफल रहा कि भारत न्यूनतम समर्थन मूल्य ढांचे के तहत दी जा रही कृषि सब्सिडी पर अपने अधिकार को सीमित किए जाने अथवा प्रतिबंध को लेकर कोई समझौता नहीं करेगा। एक प्रतिस्पर्धी लोकतंत्र में मोदी सरकार वैसे किसी भी प्रस्ताव के लिए तैयार होगी जिससे इस संवेदनशील क्षेत्र में सुधार की कोई राह निकलती हो और क्षमता में सुधार होता हो। जॉन केरी के साथ हुई वार्ता में वित्तामंत्री अरुण जेटली ने इस बात को साफ किया कि व्यापार सरलीकरण के मुद्दे पर भारत समग्रता के आधार पर विचार किए जाने का पक्षधर है। अमेरिकी फॉर्म अथवा कृषि लॉबी और भारतीय किसानों के हितों के बीच जारी संघर्ष में मोदी सरकार स्पष्ट तौर पर भारतीय हितों के पक्ष में है। डब्ल्यूटीओ के वार्ताकारों और अमेरिकी प्रशासन को इस बात को अच्छी तरह समझना होगा।
इस क्त्रम में दूसरी बात यह कि व्हाइट हाउस आने के लिए ओबामा के आमंत्रण को लेकर मोदी की स्वीकृति और उनकी तत्परता के मद्देनजर अमेरिकी नीति निर्माताओं के एक वर्ग ने यह निष्कर्ष निकाल लिया कि भारतीय प्रधानमंत्री सितंबर में अमेरिकी यात्रा को अपनी स्थिति मजबूत करने का एक जरिया मान रहे हैं। यह धारणा पूरी तरह गलत थी कि वीजा प्रतिबंध के चलते मोदी वास्तव में अस्थिर अथवा परेशान हुए होंगे और अपनी इस यात्रा को एक सम्मानित राजनेता के तौर पर फिर से स्थापित होने के रूप में लेंगे। संक्षेप में कहें तो समझा यही गया था कि अमेरिका के कथित उदारवादी प्रतिष्ठान के साथ मेल-मिलाप की चाहत में मोदी भारत के किसानों के हितों का बलिदान कर देंगे।
दरअसल भारत में बैठे थिंक टैंक से मिली जानकारी के आधार पर मोदी की छवि को गलत रूप से समझा गया। इस संदर्भ में समझा यही गया कि मोदी उन बाबुओं द्वारा संचालित हैं जिनका एकमात्र उद्देश्य सेवानिवृत्ता होने के बाद बहुस्तरीय निकायों में जगह हासिल करना है। मोदी सरकार को झुका पाने में असफल होने के बाद सितंबर में उनकी अमेरिकी यात्रा के दौरान अमेरिका शायद नए सिरे से स्थितियों का आकलन करे। वाशिंगटन में वाणिज्य विभाग के जटिल सत्ता समीकरणों के मद्देनजर अमेरिकी अधिकारियों में रणनीतिक जोड़-तोड़ को लेकर अभी से फुसफुसाहट शुरू हो गई है। मोदी की आगामी यात्रा को लेकर तमाम गलतफहमियां अब दूर होंगी। इस संदर्भ में एक गलतफहमी रक्षा विभाग की भी है, जो भारत को अमेरिका निर्मित हथियारों के लिए एक बड़े बाजार के तौर पर लालच भरी निगाहों से देखता है। यह भारत को संभावित खरीदार मानता है, जो कम कीमतों के आधार पर ऐसे मिलिट्री साजो-सामान का कोई बड़ा समझौता कर सकता है जिन्हें अफगानिस्तान से वापस लाना कहीं अधिक महंगा होगा। ओबामा के राष्ट्रपति काल को लेकर विपक्षी रिपब्लिकनों के विरोध को कुछ हद तक दरकिनार किया जा सकता है, लेकिन उनके द्वारा उठाए गई इस एक बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि अमेरिका को आगे ले जाने के लिए उनके पास कोई वृहद वैश्रि्वक विजन नहीं है। क्या अमेरिका इसे समझता है? केरी से मिलने वाले तमाम भारतीयों ने महसूस किया कि वह बिना तैयारी के आए थे। सच्चाई जो भी हो, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत-अमेरिका द्विपक्षीय रिश्तों में मजबूती सुनिश्चित है। 2005 में वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच रणनीतिक सहभागिता ने एशिया में शक्ति समीकरणों को बदलने का काम किया है। अब नौ वर्ष बाद इसे फिर से स्थापित करने की आवश्यकता है।
[लेखक स्वप्न दासगुप्ता, वरिष्ठ स्तंभकार हैं]

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