यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 26, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
चंडी में मिला जापानी इनसेफलाइटिस का मरीज
नालंदा। जिला के चंडी प्रखंड अंतर्गत ढकनिया गांव में ब्रजेश पासवान की तीन साल की पुत्री सीमा कुम

नालंदा। जिला के चंडी प्रखंड अंतर्गत ढकनिया गांव में ब्रजेश पासवान की तीन साल की पुत्री सीमा कुमारी में जापानी इनसेफलाइटिस का लक्षण मिलने की बात सामने आई है। इस रोग की पुष्टि रेफरल अस्पताल के प्रभारी डा. रामानंद प्रसाद ने की है। जापानी इनसेफलाइटिस मरीज मिलने से प्रखंड, जिला से लेकर राज्य स्वास्थ्य समिति तक हड़़कम्प मच गया। यह सूचना पाकर राज्य स्वास्थ्य समिति पटना के कई पदाधिकारी ढकनिया गांव आकर जेई बीमारी होने का कारण पता किया और आनन-फानन में प्रखंड में छूटे हुए बच्चों को जेइ, मिजिल्स का वैक्सीन का टीकाकरण शुरू किया गया है। बच्ची को बेहतर इलाज के लिए पीएमसीएच रेफर कर दिया गया है।
क्या है जापानी इंसेफलाइटिसडा. रामानंद प्रसाद ने बताया कि बरसात के मौसम में संक्रमक रोग होने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसा ही संक्रामक रोग का नाम जापानी इनसेफलाइटिस है। जिसे दिमागी बुखार भी कहते हैं। इसका वायरल ब्रेन टिश्यू पर हमला कर उसमें सूजन पैदा करता है जो जानलेवा भी हो सकता है। इसका सबसे ज्यादा असर ग्रामीण इलाके में देखने को मिलता है। चूंकि इसकी जांच अत्याधुनिक लैब से ही संभव है और ग्रामीण इलाकों में इसकी सुविधा नहीं होने से इस बीमारी की समुचित इलाज नहीं हो पाता है और यह तेजी से फैलता है। उन्होंने कहा कि संक्रमण अचानक होता है और तीव्रता से बढ़ता है। खासकर बरसात के मौसम में इसका संक्रमण सबसे ज्यादा हावी होता है। इसकी चपेट में सबसे ज्यादा 15 साल तक के उम्र के बच्चे आते हैं। यह संक्रमण जून से दिसम्बर के बीच फैलता है।
-क्या है इस रोग का लक्षण
जापानी इनसेफलाइटिस होने से उन्हें तेज रोशनी से परेशानी होती है। तेज रोशनी के कारण मरीज के सिर में दर्द होता है। आंखों में पानी आना आदि लक्षण होते हैं। इसके लक्षण हर मरीज में अलग-अलग हो सकते हैं। जैसे तेज बुखार आना एवं लगातार बुखार बने रहना, शरीर में चमकी होना, दांत पर दांत बैठना, पूरे शरीर या किसी खास अंग में ऐंठन होना, बच्चे का सुस्त होना, ¨चटी काटने पर शरीर में कोई हरकत नहीं होना जैसी स्थिति बीमारी का प्रारंभिक लक्षण है। यह रोग तेजी से पीड़ित को अपने गिरफ्त में ले लेता है। इसलिए इसका इलाज भी तेजी से होना चाहिए अन्यथा परिणाम घातक भी सकते हैं। इधर सीएस डा. सुबोध कुमार ¨सह ने दूरभाष पर सम्पर्क साधा गया लेकिन कोई जवाब नहीं मिल पाया। इस कारण उनका वर्जन नहीं लिया जा सका।
