डायना के बाद की डायना... मौत के दशकों बाद भी क्यों बदलती रही इस राजकुमारी की कहानी?
प्रिंसेस डायना की मौत के दशकों बाद भी उनकी कहानी लगातार बदलती और नई पहचान पाती रही है। उनकी जिंदगी ...और पढ़ें

राजकुमारी डायना(फाइल फोटो)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
डिजिटल डेस्क, लंदन। कुछ शख्सियतें ऐसी होती हैं जो दुनिया से चले जाने के बाद भी कभी विदा नहीं होतीं। प्रिंसेस डायना एक ऐसा ही नाम हैं, जिनकी जिंदगी जितनी चर्चा में रही, उससे कहीं ज्यादा रहस्य और कहानियां उनकी मौत के बाद गढ़ी गईं।
31 अगस्त 1997 को पेरिस की एक सड़क पर पैपराजी से बचते हुए एक औरत ने दम तोड़ दिया था, लेकिन उसके बाद भी दुनिया ने उन्हें कभी शांत नहीं रहने दिया। हर कुछ सालों बाद किताबों, फिल्मों और वेब सीरीज के जरिए उनकी जिंदगी को फिर से कुरेदा जाता है, और हम सब डायना का एक नया रूप गढ़ लेते हैं। वैसा रूप, जैसा हम उन्हें देखना चाहते हैं।
एक महिला, अनगिनत किरदार
डायना फ्रांसेस स्पेंसर ने असल में दो जिंदगियां जीं, लेकिन उन्हें मरने का हक केवल एक में मिला। एक डायना वह थीं जो जीती-जागती थीं और एक हादसे में दुनिया छोड़ गईं। दूसरी डायना वह हैं जिसे हमने अपनी यादों में जिंदा रखा है, जिसे हम लगातार नया रंग देते रहते हैं।
आज वह सिर्फ एक इंसान नहीं, बल्कि कई रूपों का मिक्स हैं। एक राजकुमारी, एक पत्नी, एक मां, एक फैशन आइकन, एक टूटी हुई प्रेमिका, एक संवेदनशील समाजसेवी और एक पीड़िता। पर सवाल यह उठता है कि क्या ये सारे रूप वाकई उनके थे, या फिर हम अपने हिसाब से उनकी एक नई पहचान बनाते चले गए?
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क्या है कभी न खत्म होने वाला विवाद?
हाल ही में डायना के छोटे भाई चार्ल्स स्पेंसर की किताब 'स्वान सॉन्ग: डायना, माय सिस्टर' सामने आई, जिसने इस चर्चा को फिर से हवा दे दी। किताब में उन्होंने दावा किया कि डायना की मौत के बाद प्रिंस चार्ल्स अब किंग चार्ल्स और उनके बीच इस बात पर बहस हुई थी कि विलियम और हैरी को मां के ताबूत के पीछे चलना चाहिए या नहीं।
स्पेंसर के मुताबिक, चार्ल्स ने बहस खत्म करते हुए कहा था कि तसल्ली रखिए, हम जल्द ही उन्हें भूल जाएंगे। हालांकि बकिंघम पैलेस ने इस दावे को खारिज कर दिया, लेकिन यह सवाल हवा में तैरता रहा। क्या वाकई हम असली डायना को भूल चुके हैं और सिर्फ उनकी बनाई गई छवि को याद रखे हुए हैं?

मौत से बहुत पहले ही शुरू हो गई थी डायना की कहानी
सच तो यह है कि डायना की छवि बदलने का सिलसिला उनकी मौत के बाद नहीं, बल्कि उनके जीते-जी ही शुरू हो गया था। जब वह जिंदा थीं, तब भी दुनिया उनके हर कदम का अपने मन मुताबिक मतलब निकालती थी।
बचपन की एक तस्वीर उनके बच्चों के प्रति प्रेम का सबूत मान ली जाती, उनके आंसू उनकी संवेदनशीलता का पैमाना बन जाते और उनकी उदासी को राजमहल की बंदिशों की कहानी बना दिया जाता।
उनके फैशन डिजाइनर्स सिर्फ कपड़े तैयार नहीं कर रहे थे, बल्कि एक ऐसी राजकुमारी की छवि गढ़ रहे थे जो लोगों के सपनों में समा सके। उनकी कहानी परीकथा जैसी शुरू तो हुई, लेकिन उसका अंत वैसा नहीं था।
जब डायना बन गईं डायना जी
दिलचस्प बात यह है कि सरहदों के पार डायना का अक्स और बदल गया। दक्षिण एशियाई देश भारत और पाकिस्तान में कई महिलाओं ने डायना में अपनी छवि देखी। वह एक ऐसी बहू की तरह देखी जाने लगीं जिसने परिवार और परंपरा की सख्त पाबंदियों के सामने झुकने से इनकार कर दिया और अपनी पहचान के लिए आवाज उठाई।
ब्रिटेन में एक दक्षिण एशियाई अखबार के पाठक ने तो उन्हें मजाकिया अंदाज में साउथॉलपुर की राजकुमारी डायना जी तक कह दिया। यानी दुनिया के जिस कोने में वह गईं, वहां के लोगों ने अपनी जरूरतों और भावनाओं के हिसाब से उन्हें अपना बना लिया।
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नई पीढ़ी और डायना की अनसुलझी पहेली
हैरानी की बात यह है कि जो पीढ़ी उनके निधन के सालों बाद पैदा हुई, वह भी उनसे एक गहरा जुड़ाव महसूस करती है। पुणे की एक 20 वर्षीय युवती के लिए डायना आज भी पीपल्स प्रिंसेस यानी जनता की राजकुमारी हैं।
एक ऐसी महिला जिन्होंने एड्स जैसी बीमारी से जुड़े सामाजिक कलंक को मिटाया, महिलाओं के लिए एक रोल मॉडल बनीं और पितृसत्तात्मक ढांचे के सामने डटकर खड़ी रहीं। जिसने उन्हें कभी देखा नहीं, वह भी उनकी पूरी कहानी जानता है। मगर इस कहानी में हकीकत कितनी है और अफसाना कितना, यह कह पाना मुश्किल है।

हम खुद बन गए पैपराजी
डायना की परेशानी रही कि उन्हें कभी पूरी तरह खुद का होने नहीं दिया गया। जब तक वह जिंदा थीं, कैमरों और पैपराजी ने उनका पीछा किया और जब वह दुनिया से चली गईं, तो हम खुद पैपराजी बन गए।
उनकी जिंदगी के हर पहलू को कुरेदने और भुनाने के लिए। वह आज भी एक ऐसी पहेली हैं जिसके टुकड़े आपस में जुड़ते तो नजर आते हैं, लेकिन गौर से देखने पर समझ आता है कि तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।
