लंदन, प्रेट्र। कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच बनी तनाव की स्थिति को खत्म करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बिरादरी शांति की भूमिका निभा सकती है। भारत और पाकिस्तान आपस में वार्ता करके भी तनाव को खत्म कर सकते हैं। यह बात गुरुवार को आयोजित महत्वपूर्ण सामूहिक चर्चा में वक्ताओं ने कही।

राजनीतिक हालात हमेशा एक जैसे नहीं रहते 

टेरीजा मे और डेविड कैमरन के प्रधानमंत्रित्व काल में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे सर मार्क लियाल ग्रांट ने कहा, 2001 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ समझौते के काफी करीब पहुंच गए थे। लेकिन कुछ अप्रत्याशित स्थितियों के चलते वह समझौता नहीं हो पाया था। उस समय महत्वपूर्ण अवसर गंवा दिया गया था। राजनीतिक हालात हमेशा एक जैसे नहीं रहते लेकिन समस्या का समाधान हमेशा समान स्थितियों में रहता है। कश्मीर में सीमा पर दोनों तरफ के लोगों को आवागमन की सुविधा देकर समस्या का शांतिपूर्ण समाधान निकाला जा सकता है।

कश्मीर समस्या सुलझाने में ब्रिटेन की भूमिका विषय पर आयोजित सामूहिक चर्चा में भारतीय, पाकिस्तानी और ब्रिटिश विशेषज्ञों ने अपनी-अपनी राय रखी। इस दौरान जम्मू-कश्मीर से भारत सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 हटाए जाने पर भी गर्मागर्म चर्चा हुई।

किसी तीसरे पक्ष के दखल की जरूरत नहीं 

संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की स्थायी प्रतिनिधि रहीं मलीहा लोधी ने कहा, कोई भी नहीं चाहता कि क्षेत्र में फिर से तनाव बढ़े और युद्ध के हालात पैदा हों। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को चाहिए कि वह आगे आए और दोनों देशों को टकराव से बचाने के लिए भूमिका अदा करे। लेकिन भारत ने साफ कर दिया कि कश्मीर मसला भारत और पाकिस्तान के बीच का द्विपक्षीय मामला है। इसमें किसी तीसरे पक्ष के दखल की जरूरत नहीं है। भारत पाकिस्तान के साथ किसी भी मसले पर बात कर सकता है लेकिन उससे पहले पाकिस्तान को सीमा पार से आतंकी भेजने बंद करने होंगे, जो जम्मू-कश्मीर में आकर हमले करते हैं और निर्दोषों की जान लेते हैं।

अनुच्छेद 370 को हटाने के कदम को भारत ने अपने क्षेत्र में लिए गए निर्णय के तौर पर प्रस्तुत किया। कहा, संविधान के अस्थायी प्रावधान को खत्म करने का उसे पूरा अधिकार था।

 

Posted By: Arun Kumar Singh

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