सोलना [स्वीडन], एजेंसियां। दो साल पहले कोरोना महामारी के दौरान विश्व के अधिकतर देशों ने संक्रमण के खिलाफ लॉकडाउन का सहारा लिया। लोग अपने घरों में बंद थे। स्कूल, कॉलेज, रेस्तरां सभी बंद थे। मगर इस दौरान यूरोप का एक देश ऐसा रहा जिसने बिना लॉकडाउन लागू किए कोरोना की तीनों लहर को पार कर लिया। हम बार कर रहे हैं यूरोप स्थित स्वीडन की, जिसे लॉकडाउन नहीं लगाने की नीति के कारण आलोचनाएं झेलनी पड़ी थी। बावजूद इसके स्वीडन ने नागरिकों की स्वतंत्रता और अधिकारों की बात करते हुए 'नो लॉकडाउन' की रणनीति को अपनाया।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के ताजा आंकड़ों बताते हैं कि यूरोपीय देशों में कोरोना से मौतों के मामले में स्वीडन काफी नीचले स्थान पर है। यानि यहां कोरोना से कम मौतें हुईं। जबकि कोरोना की पहली लहर में स्वीडन में मरने वालों की संख्या सबसे अधिक थी। यही कारण है कि स्वीडन के नो लॉकडाउन के फैसले की चर्चा एक बार फिर हो रही है।

बिना लॉकडाउन के कोरोना के खिलाफ रणनीति 

वरिष्ठ शोध विशेषज्ञ एम्मा फ्रैंस के मुताबिक, करीब ढाई साल पहले जब कोरोना वैश्विक स्तर पर अपने पैर पसार रहा था, तब उससे निपटने के लिए स्वीडन सरकार ने इन्फ्लूएंजा महामारी के तर्ज पर कोरोना के खिलाफ लड़ाई की रणनीति तैयार की और उसपर ही अब तक डटा है। स्वीडन का तर्क था कि उनका यह फैसला भविष्य को ध्यान में रखकर लिया जा रहा है। लॉकडाउन लगाकर लोगों के घर में कैद करने के बजाय स्वीडन ने सामाजिक दूरी के तरीके को अपनाया। बच्चों के स्कूल खुले रहे और लोगों से वर्क फ्रॉम होम काम करवाया गया। अंतर्राष्ट्रीय यात्रा पर पाबंदी लगाकर घरेलू यात्राएं कम से कम करने की अपील की गई।

विश्व स्तर पर हुई आलोचना

साल 2020 में कोरोना की पहली लहर के दौरान स्वीडन में फेस मास्क लगाना भी अनिवार्य नहीं था। विशेष परिस्थितियों में ही चेहरा ढकने की सलाह दी जा रही थी। मगर 2020 के मार्च-अप्रैल महीने में नॉर्वे और डेनमार्क जैसे पड़ोसी देशों में कोरोना के मामलों में एक तरफ सुधार था, तो वहीं स्वीडन में कोविड मृत्यु दर दुनिया में सबसे अधिक थी। कोरोना के खिलाफ ढीले रुख अपनाने को लेकर स्वीडन को आलोचना को शिकार होना पड़ा था।

हालांकि इसके बाद कोरोना की संख्या बढ़ने के बाद स्वीडन में कुछ प्रतिबंध लगाए गए। मार्च 2020 में सार्वजनिक कार्यक्रमों में अधिकतम 50 लोगों और नवंबर 2020 में आठ लोगों के एकत्रित होने की इजाजत थी। नर्सिंग होम में जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया और उच्च माध्यमिक स्कूल भी बंद कर दिए गए।

कोरोना की सभी लहरों में स्कूल खुले रहे

मगर, कोरोना महामारी के दौरान स्वीडन में प्राइमरी स्कूल सामान्य रुप से संचालित हुई। प्राथमिक स्कूलों को खुला रखने का निर्णय रंग भी लाया। आंकड़ें बताते हैं कि कोरोना के कारण बच्चे सबसे कम प्रभावित हुए। हाल के एक अध्ययन से पता चला कि अन्य देशों के बच्चों को लॉकडाउन के कारण पढ़ाई में नुकसान हुआ। बच्चों में सीखने की क्षमता कम हुई। तो वहीं स्वीडिश बच्चों की पढ़ाई पहले की तरह ही जारी रही। 

बुजुर्गों को हुआ नुकसान

हालांकि, स्वीडन का लॉकडाउन न लगाने का फैसला हर मोर्चे पर सफल नहीं रहा। इसका खामियाजा देश के बुजुर्गों को उठाना पड़ा। स्वीडन के ही सरकार द्वारा नियुक्त कोरोना आयोग के आंकड़ें बताते हैं कि सरकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसी बुजुर्गों की रक्षा करने में काफी हद तक विफल रही है।

कोरोना की पहली लहर के दौरान जब स्वीडन में कोविड मृत्यु दर चरम पर थी, जब देश में कोविड से मरने वालों में से लगभग 90% लोग 70 या उससे अधिक उम्र के थे। इनमें से आधे लोगों का इलाज केयर होम में चल रहा था और करीब 30% मरीज होम हेल्प सर्विस पर निर्भर थे। महामारी के दौरान स्वीडन में बुजुर्गों की देखभाल में भी कई समस्याएं सामने आईं। अपर्याप्त स्टाफिंग स्तर जैसी संरचनात्मक कमियों के कारण नर्सिंग होम गंभीर स्थिति को संभालने में विफल रहे।

मगर मौजूदा वक्त में जब कोरोना का अंत असंभव लगता है, ऐसे में स्वीडन की जिस नो लॉकडाउन रणनीति की आलोचना हो रही थी, आज अधिकतर देश उसी नीति को अपना रहे हैं। ढ़ाई साल पहले स्वीडन पर नागरिकों को खतरे में रखकर बेतुका प्रयोग करने का आरोप लगाया जा रहा था। मगर ताजा आंकड़ें कोरोना के खिलाफ स्वीडन की सफलता को दर्शाते हैं।

Edited By: Aditi Choudhary