नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। 1956 के सितंबर महीने में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सऊदी अरब के दौरे पर गए थे। इस दौरे पर सऊदी की भीड़ ने नेहरू के स्वागत में ‘मरहबा रसूल अल सलाम’ मतलब शांति के दूत आपका स्वागत है के नारे लगाए थे। लेकिन 1980 में अफगानिस्तान में सोवियत संघ की सेना के खिलाफ पाकिस्तान ने मुजाहिदीनों को खड़ा करने में मदद की और सऊदी का झुकाव पाकिस्तान की तरफ बढ़ता गया। ऐसे में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस और रक्षा मंत्री मोहम्मद बिन सलमान के पाकिस्तान और भारत के ऐतिहासिक दौरे पर तीनों देशों के संबंधों पर पेश है एक नजर:

जरूरत है बड़ी
अस्तित्व में आने के बाद से पाकिस्तान वर्तमान में सबसे भयानक आर्थिक संकट से गुजर रहा है। हालत ये है कि उसका विदेशी मुद्रा भंडार 9 अरब डॉलर हो गया है जबकि बांग्लादेश का 33 अरब डॉलर है। पाकिस्तान को सलमान के दौरे से बेशुमार उम्मीदें हैं। इमरान खान ने प्रधानमंत्री बनने के बाद पहले विदेशी दौरे के लिए सऊदी को ही चुना था। खान ने इस दौरे में कहा था कि पाकिस्तान किसी बाहरी ताकत को सऊदी पर हमला नहीं करने देगा। अभी सऊदी में 25 लाख से ज्यादा पाकिस्तानी काम करते हैं। ये हर साल पाकिस्तान में अपने परिवारों के लिए 5 से 6 अरब डॉलर की रकम भेजते हैं जो पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था के लिए काफी अहम है।

ऐसे बढ़ी नजदीकियां
1960 से ही पाकिस्तानी सैनिक सऊदी के शाही शासन की सुरक्षा में लगे हैं। लेकिन दोनों देशों के बीच नजदीकियां तब बढ़ी जब 1980 में सऊदी ने अफगानिस्तान में सोवियत सेना के खिलाफ लड़ने के लिए पाकिस्तान के जरिए ही अफगान मुजाहिदीनों को तैयार किया था। इसी से तालिबान का जन्म हुआ और फिर अल-कायदा सामने आया। ईरान इराक युद्ध में भी पाकिस्तान ने अपनी सेना को सऊदी अरब भेजा। सऊदी अरब पाकिस्तानी हथियारों का सबसे बड़ा आयातक है। पाकिस्तान ने जब परमाणु परीक्षण किया था तो सऊदी ने इसका खुलकर समर्थन किया था। सऊदी ने 1998 से 1999 तक 50 हजार बैरल तेल मुफ्त में दिया था। सऊदी ने ऐसा तब किया जब उस पर कई तरह के प्रतिबंध लगे थे। इसके साथ ही कश्मीर मसले पर भी सऊदी अरब पाकिस्तान की लाइन के साथ रहा है।

बढ़ी इस्लामिक कट्टरता
पाकिस्तान को सऊदी अरब से बेहिसाब फंडिंग होती है। जिससे वहां इस्लामिक कट्टरता बढ़ी है। सऊदी की मदद से पाकिस्तान में धार्मिक स्कूल और मदरसे ख़ूब खुले।

भारत से रिश्ते
सऊदी अरब की पाकिस्तान के साथ दोस्ती भले बहुत मजबूत है लेकिन वो भारत की भी उपेक्षा नहीं करता है। सऊदी अरब ने कभी ख़ुद को भारत से पूरी तरह अलग नहीं किया। वहां बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी भी काम करते हैं। 2016 में इनकी संख्या 30 लाख थी। भारत की आर्थिक प्रगति और बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के कारण सऊदी अरब के लिए भारत तेल का बड़ा खरीददार बन गया है। आर्थिक जरूरतों के बाद दोनों देशों के अहम होते रिश्तों के कारण 2006 में सऊदी के किंग अब्दुल्ला का दौरा हुआ।

इस दौरे के बाद दोनों देशों के रिश्तों में और प्रगाढ़ता आई। 2014-15 में दोनों देशों के बीच 39.4 अरब डॉलर का व्यापार हुआ था। सऊदी ने 2014 में भारत के साथ एक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें सूचनाओं के आदान-प्रदान और सैन्य ट्रेनिंग जैसी चीजें शामिल थीं। प्रधानमंत्री मोदी भी वहां के दौरे पर गए और उनका शाही शासन ने गर्मजोशी से स्वागत किया था। मोदी को सऊदी अरब का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भी दिया गया।

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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