नई दिल्ली [जेएनएन]। इमरान खान की ओर से नया पाकिस्तान बनाने का दावा उनके प्रधानमंत्री बनने के 15 दिन के अंदर ही खोखला साबित होने लगा है। इससे भी खराब और खतरनाक बात यह है कि इमरान खान के नेतृत्व में पुराने पाकिस्तान वाले तौर-तरीके बेशर्मी के साथ अमल में आने शुरू हो गए हैं।

इमरान खान ने कट्टरपंथी तत्वों के आगे घुटने टेकते हुए आर्थिक सलाहकार परिषद में शामिल किए गए प्रिंस्टन विवि के जाने-माने अर्थशास्त्री आतिफ मियां को इस्तीफा देने के लिए कह दिया। आतिफ मियां से इस्तीफा इसलिए मांगा गया, क्योंकि वह अहमदी समुदाय के हैं और चरमपंथी मौलाना-मौलवी इसी कारण उन्हें आर्थिक सलाहकार परिषद में शामिल किए जाने का विरोध कर रहे थे।

अहमदी समुदाय को मुसलमान नहीं मानते!

पाकिस्तान में अहमदी समुदाय के लोगों को मुसलमान नहीं माना जाता। पाकिस्तान के पहले नोबेल विजेता प्रोफेसर अब्दुल सलाम भी अहमदी समुदाय के थे। आज पाकिस्तान में उनका कोई नाम नहीं लेता। बहुत पहले उनकी कब्र पर उनके नाम के आगे लिखा मुस्लिम शब्द भी खुरच दिया गया था।

यह दिलचस्प है कि जब आतिफ मियां को आर्थिक सलाहकार परिषद में शामिल करने को लेकर कट्टरपंथी तत्वों के विरोध के स्वर उभरे थे तो इमरान खान और उनके सहयोगियों ने कहा था कि वे ऐसे तत्वों के आगे नहीं झुकेंगे, लेकिन आखिरकार वे झुक ही गए। दो दिन पहले तक इमरान खान के जो सहयोगी यह दलील पेश कर रहे थे कि मोहम्मद अली जिन्ना ने भी एक अहमदी को विदेश मंत्री बनाया था वे ही अब यह तर्क दे रहे हैं कि सरकार विवाद बढ़ाने वाला कोई काम नहीं करना चाहती।

एक और सदस्य ने दिया इस्तीफा

इमरान खान को इसलिए कहीं अधिक शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि आतिफ को हटाए जाने के विरोध में आर्थिक सलाहकार परिषद के एक और सदस्य एवं हार्वर्ड विवि के प्रोफेसर असीम एजाज ख्वाजा ने भी इस्तीफा दे दिया है। उनके इस फैसले पर अमेरिका में रह रहे पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक्कानी ने फक्र का इजहार किया है।

इमरान खान द्वारा आर्थिक सलाहकार परिषद से आतिफ मियां को हटाने के फैसले का विरोध करने वाले यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या ऐसे ही बनेगा नया पाकिस्तान? आतिफ मियां को हटाने का विरोध इमरान की पहली पत्नी जेमिमा गोल्डस्मिथ ने भी किया है। एक ट्वीट के जरिये उन्होंने कहा है कि इस फैसले का बचाव नहीं किया जा सकता। यह निराशाजनक है।

इमरान सरकार की बुरी शुरुआत

इमरान खान की ओर से आतिफ मियां से जिस तरह इस्तीफा मांगा गया उससे पाकिस्तान के साथ-साथ बाहर के मुल्कों में रह रहे पाकिस्तानी भी उनकी जमकर निंदा कर रहे हैं। एक तरह से उनकी थू-थू हो रही है। सोशल मीडिया पर लोग इमरान के इस फैसले को एक बहुत बुरी शुरूआत के तौर पर देख रहे हैं।

आतिफ को हटाए जाने के फैसले का विरोध करने वालों में भारत में शशि थरूर की दोस्त के तौर पर चर्चित पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार भी हैं। वह खुद को इमरान की पार्टी-पीटीआई का समर्थक बताती हैं, लेकिन उन्होंने यह सवाल उछाला है कि आखिर जिस फैसले का दो दिन बचाव किया जाता रहा उससे पीछे कैसे हट जाया गया? मुश्किल यह है कि इस सवाल का जवाब किसी के पास और यहां तक कि इमरान के पास भी नहीं। अब इमरान कह रहे हैं कि उन्हें नहीं पता था कि दुनिया के टॉप 25 इकोनामिस्ट में गिनती रखने वाले आतिफ मियां अहमदी हैं। इमरान के इस बयान को नितांत झूठा माना जा रहा है, क्योंकि आतिफ एक जाना-माना नाम हैं।

इमरान के पाकिस्तान में आतिफ की बेइज्जती को अहमदिया समुदाय के लिए एक बड़े संकट के तौर पर देखा जा रहा है। अहमदी समुदाय के लोग यह आशंका जता रहे हैं कि तथाकथित नए पाकिस्तान में उनके उत्पीड़न का चक्र और तेज हो सकता है। यह निराधार नहीं, क्योंकि इमरान के पीएम बनने के बाद भी अहमदी समुदाय की मस्जिदों पर हमले का सिलसिला कायम है। पाकिस्तान में अहमदिया लोगों को केवल इस कारण मुसलमान नहीं माना जाता, क्योंकि वे मुहम्मद साहब को आखिरी नबी नहीं मानते। 

Posted By: Vikas Jangra