कोपेनहेगन (डेनमार्क), एएनआइ। विज्ञानी अभी तक इस बात से अनभिज्ञ हैं कि व्यायाम के समय को लेकर उसका असर अलग-अलग क्यों होता है। इसीलिए इसकी समझ विकसित करने के लिए हाल ही में विज्ञानियों की एक टीम ने विभिन्न समय पर किए जाने वाले व्यायाम के असर को लेकर एक व्यापक अध्ययन किया है। इस अध्ययन का निष्कर्ष ‘सेल मेटाबालिज्म’ जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

इस शोध में दर्शाया गया है कि विभिन्न समय पर किए जाने वाले व्यायाम के कारण शरीर के अंग किस प्रकार से खास तरीके से स्वास्थ्यवर्धक सिग्नल मालीक्यूल पैदा करते हैं। मतलब, इसका निर्माण व्यायाम के समय से प्रभावित होता है। इन सिग्नलों का स्वास्थ्य, नींद, स्मरण शक्ति, व्यायाम के प्रदर्शन और मेटाबोलिक होमियोस्टैटिस (स्थितियों से निपटते हुए व्यवस्था सही रखना पर व्यापक प्रभाव पड़ता है।

कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट और यूनिवर्सिटी आफ कोपेनहेगन के नोवो नोर्डिक्स फाउंडेशन सेंटर फार बेसिक मेटाबोलिक रिसर्च (सीबीएमआर) के प्रोफेसर जुलीन आर. जीराथू ने बताया कि व्यायाम का समय किस प्रकार से अलग-अलग प्रभाव पैदा करता है, इसकी बेहतर समझ से मोटापे और टाइप2 के डायबिटीज के मरीजों समेत अन्य लोगों की मदद की जा सकती है ताकि उन्हें व्यायाम का अधिकतम लाभ मिले। लगभग सभी कोशिकाएं (सेल्स) अपनी जैविक प्रकिया को 24 घंटे में रेगुलेट करती हैं, इसे सर्कैडियन रिद्म कहते हैं। इसका मतलब यह है कि व्यायाम के समय के आधार पर विभिन्न ऊतकों की संवेदनशीलता अलग-अलग होती हैं।

कैसे किया अध्ययन : शोधकर्ताओं की इस अंतरराष्ट्रीय टीम ने इसका व्यापक असर जानने की कोशिश की। इसके लिए शोधकर्ताओं ने चूहों पर अध्ययन किया, जिसकी शारीरिक गतिविधियां (व्यायाम) तड़के और देर रात शाम में ज्यादा होती हैं। इनके मस्तिष्क, हृदय, मांसपेशियां, लिवर तथा फैट के ऊतकों के सैंपल लेकर मास स्पेक्ट्रोमेट्री की मदद से विश्लेषण किया।

इससे विज्ञानियों को ऊतकों में सैकड़ों तरह के मेटाबोलाइट्स और हार्मोन सिग्नलिंग मालीक्यूल्स के बारे में जानने का मौका मिला। इससे विभिन्न समय पर व्यायाम से होने वाले बदलावों को मानीटर किया जा सका। चूंकि यह एक पहला व्यापक अध्ययन है, जिसमें विभिन्न ऊतकों पर समय और व्यायाम आधारित मेटाबोलिज्म पर पड़ने वाले असर को समेटा गया है, इसलिए मेटाबोलिज्म तथा आर्गन क्रासटाक (सिग्नल का एक या ज्यादा घटक किस प्रकार से दूसरे सिग्नल को प्रभावित करता है) का सुधारित माडल बनाया जा सकता है। ऊतक किस प्रकार से आपस में संवाद करते हैं- इसकी जानकारी से खास ऊतकों के सर्कैडियन रिद्म की गड़बड़ियों को सुधारा जा सकता है। सर्कैडियन रिद्म में गड़बड़ी के कारण मोटापा और टाइप2 डायबिटीज का खतरा बढ़ता है।

अध्ययन की सीमाएं

इस अध्ययन की विभिन्न सीमाएं हैं। चूंकि यह प्रयोग चूहों पर किया गया है, जिसमें इंसानों के साथ बहुत सारी जीनेटिक, फिजियोलाजिकल और व्यवहार जन्य समानताएं होती हैं, लेकिन इनके साथ ही अहम भिन्नताएं भी हैं। उदाहरण के लिए चूहा रतिचर प्राणी है और उसके व्यायाम भी ट्रेडमिल रनिंग तक ही सीमित रहे, जिसके परिणाम कठिन व्यायाम से अलग हो सकते हैं। इसके अलावा इस अध्ययन में लिंग, उम्र तथा बीमारियों पर विचार नहीं किया गया। अध्ययन की इन सीमाओं के बावजूद यह इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके आधार पर आगे के शोध का यह समझने में मददगार हो सकता है कि यदि व्यायाम का समय ठीक किया जाए तो यह किस प्रकार से स्वास्थ्य में सुधार लाने में भूमिका निभा सकता है।

Edited By: Neel Rajput