नेपाल में बाढ़ का कहर: भारत की मदद से बना स्कूल तबाह, छात्रों ने की ऊंचे स्थान पर नया विद्यालय बनाने की मांग
भारत की मदद से बना नेपाली स्कूल भीषण बाढ़ में तबाह हो गया है। प्रधानाचार्य की सूझबूझ से सभी सुरक्षित ...और पढ़ें

बाढ़ में तबाह हुआ भारत की मदद से बना स्कूल (सोशल मीडिया)
HighLights
प्रधानाचार्य की सूझबूझ से 900 बच्चों की जान बची।
बाढ़ ने 76 साल पुराने स्कूल को पूरी तरह तबाह किया।
स्कूल पुनर्निर्माण के लिए भारत सरकार से मदद की उम्मीद।
डिजिटल डेस्क, काठमांडू। नेपाल में आई प्राकृतिक आपदा ने गांव से लेकर शहर तक सब कुछ तहस-नहस कर दिया है। इसी प्रलय की चपेट में नुवाकोट जिले का 76 साल पुराना 'त्रिभुवन त्रिशूलि सेकेंडरी स्कूल' भी आ गया, जो मलबे में तब्दील हो चुका है।
गनीमत रही कि समय रहते प्रधानाचार्य की सूझबूझ और तीन मिनट के भीतर मिले खतरों के संकेतों ने अंदर मौजूद लगभग नौ सौ बच्चों और स्टाफ की जान बचा ली। खास बात यह है कि इस स्कूल की एक तीन मंजिला इमारत को साल 2015 के भूकंप के बाद भारत सरकार के सहयोग से बनवाया गया था।
सूझबूझ से बची करीब 900 बच्चों की जान
जिस समय बाढ़ और सैलाब ने स्कूल को अपनी चपेट में लिया, उस वक्त परिसर के अंदर लगभग एक हजार लोग मौजूद थे। प्रधानाचार्य राजेंद्र दवादी को तीन अलग-अलग जगहों से खतरे के संकेत मिले, एक अकाउंटेंट ने आकर बताया कि पानी तेजी से घुस रहा है, एक शिक्षक को ऊपर से फोन आया कि क्षेत्र जलमग्न हो चुका है, और एक अभिभावक अपनी बेटी को लेने स्कूटर से पहुंच गए।
स्कूल के दो सदस्य कर्मचारी लापता
बिना एक पल गंवाए, प्रिंसिपल दवादी ने तुरंत स्कूल की घंटी बजवाई और बच्चों को सुरक्षित बाहर निकालने का आदेश दिया। सभी छात्र और शिक्षक समय रहते सुरक्षित पहाड़ी पर पहुंच गए, जिससे बड़ा जानमाल का नुकसान टल गया। हालांकि, दो स्टाफ सदस्य कर्मचारी चुल्लिम लामा और शिक्षक संतोष परिहार लापता बताए जा रहे हैं।
सब कुछ तबाह, भारत से फिर उम्मीद
बता दें कि यह स्कूल नेपाल के बाढ़ प्रभावित रसुवा, धाडिंग और नुवाकोट जिलों का सबसे पुराना स्कूल था, जिसमें 1643 छात्र पढ़ते थे। बाढ़ ने स्कूल का सब कुछ तबाह कर दिया, जिसमें भारतीय दूतावास की मदद से बनी 18 कमरों की तीन मंजिला इमारत भी शामिल है। अब स्कूल के पास केवल दो बसें बची हैं, जिसमें एक बस भी भारत सरकार द्वारा दी गई थी।
प्रधानाचार्य ने भारत सरकार से जताई उम्मीद
प्रधानाचार्य राजेंद्र दवादी ने उम्मीद जताई है कि संकट के इस समय में भारत सरकार एक बार फिर उनके स्कूल को दोबारा बसाने में मदद करेगी। उन्होंने बताया कि साल 2015 के भूकंप के बाद भी भारत ने स्कूल के निर्माण में बड़ा सहयोग किया था।
छात्रों ने बयां किया खौफनाक मंजर
स्कूल के खौफनाक मंजर को लेकर कक्षा 10 की छात्रा सुनीता तामांग ने बताया कि वे सुबह की असेंबली की तैयारी कर रही थीं, तभी शिक्षकों ने चिल्लाकर पहाड़ी की तरफ भागने को कहा।
जब उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तो नदी उनके खेल के मैदान को बहा ले जा रही थी। वहीं, कक्षा 12 के छात्र रोहन श्रेष्ठ ने बताया कि पानी दिखने से पहले ही नदी की गड़गड़ाहट बादलों की तरह गूंज रही थी। अब बच्चे और शिक्षक एक अस्थायी शिविर में हैं और एक-दूसरे की हिम्मत बंधा रहे हैं।
नई शुरुआत करने में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
गौरतलब है कि प्रिंसिपल और छात्रों की बस एक ही मांग है, क्लासेस जल्द शुरू हों, लेकिन स्कूल को कभी भी नदी के किनारे दोबारा नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि इसे सुरक्षित और ऊंचे स्थान पर शिफ्ट किया जाना चाहिए।
फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती आवागमन की है। नदी पर बने पुल बह जाने के कारण लगभग 65-70% बच्चे एक तरफ और 30-35% बच्चे दूसरी तरफ फंस गए हैं। प्रधानाचार्य का कहना है कि यदि वहां कोई बेली ब्रिज (अस्थायी पुल) बन जाए, तो बच्चों की पढ़ाई जल्द से जल्द दोबारा शुरू की जा सकती है।
