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नेपाल में फिर से बवाल... बालेन शाह को पीएम बनाने वाले Gen-Z काठमांडू की सड़कों पर क्यों कर रहे प्रदर्शन?

Published: Mon, 20 Jul 2026 08:06 PM (IST)Updated: Mon, 20 Jul 2026 08:13 PM (IST)

नेपाल के युवा प्रधानमंत्री बालेन शाह को पद संभालने के 100 दिनों के बाद ही Gen-Z के विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

बालेन सरकार के खिलाफ काठमांडू की सड़कों पर नारेबाजी। (फाइल)

बालेन सरकार के खिलाफ काठमांडू की सड़कों पर नारेबाजी। (फाइल)

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डिजिटल डेस्क, काठमांडू। नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री बालेन शाह को पद संभालने के 100 दिनों के बाद ही उसी तरह के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है, जिसने उनसे पहले वाले प्रधानमंत्री को सत्ता से हटा दिया था। जब मार्च में बालेन शाह ने पद संभाला तो उनसे एक ऐसी पीढ़ी की उम्मीदें थीं जो भ्रष्टाचार, राजनीतिक परिवारों और खोखले वादों से तंग आ चुकी थी।

रैपर से इंजीनियर और फिर राजनेता बने बालेन शाह सिर्फ एक और चुने हुए नेता नहीं थे, वह उस राजनीतिक बदलाव का चेहरा थे जो Gen-Z के उस विद्रोह से पैदा हुआ था जिसने 2025 में नेपाल को हिलाकर रख दिया था।

लेकिन क्रांतिओं की एक आदत होती है कि वे ऐसी उम्मीदें तो जगा देती हैं जिन्हें पूरा करना नामुमकिन होता है। मुश्किल से तीन महीने बाद ही, प्रदर्शनकारी काठमांडू की सड़कों पर वापस आ गए हैं।

नेपाल में फिर सड़कों पर Gen-Z

पिछले हफ्ते नेपाल में युवा त्रिपुरेश्वर स्थित पासपोर्ट विभाग के बाहर जमा हुए। वे वहां कागजी कार्रवाई के लिए नहीं आए थे। वे नेपाली नाम के 25 साल के राइड-शेयर ड्राइवर का शोक मना रहे थे, जिन्होंने कुछ दिन पहले ट्रैफिक पुलिस के साथ जुर्माने को लेकर हुए विवाद के बाद खुद को आग लगा ली थी।

नेपाल में मौजूदा सरकार के नेतृत्व बानेल शाह कर रहे हैं। पद संभालने के 100 दिनों को भीतर ही, उनके प्रशासन को अब उसी तरह के जमीनी दबाव का सामना करना पड़ रहा है जिसने उनसे पहले वाले प्रधानमंत्री की सरकार गिरा दी थी।

प्रदर्शनकारी नदी के किनारे रहने वाले अनधिकृत निवासियों को जबरदस्ती हटाए जाने, पुलिस के व्यवहार और अब गणेश नेपाली की मौत को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। कुछ लोग तो सीधे शाह के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।

काठमांडू की सड़कों पर फिर प्रदर्शन

एक तरफ कैबिनेट में मची उथल-पुथल ने शाह की सरकार को परेशान किया तो एक बहुत पुरानी नीतिगत सनक प्रदर्शनकारियों को बड़ी संख्या में सड़कों पर उतार दिया।

अनधिकृत बस्तियों को हटाने से भड़के लोग

मेयर के तौर पर, शाह लंबे समय से काठमांडू की नदियों के किनारे बनी अनधिकृत बस्तियों को हटाने की कोशिश कर रहे थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद, उन्होंने उस अभियान को राष्ट्रीय स्तर पर फिर से शुरू किया। नेपाल न्यूज के अनुसार, अप्रैल 2026 से अधिकारियों ने काठमांडू घाटी और उसके बाहर बस्तियों को हटाना शुरू कर दिया, जिससे 2,600 से ज्यादा परिवार और लगभग 15,000 लोग प्रभावित हुए।

सरकार ने एक पुनर्वास योजना का वादा किया जिसमें एक हजार दिनों के भीतर जमीन देने की बात कही गई थी, लेकिन वकीलों और Gen Z कार्यकर्ताओं समेत आलोचकों का तर्क था कि परिवारों को तब हटाया जा रहा था जब उनके असली भूमिहीन कब्जेदार होने की स्थिति की पुष्टि भी नहीं हुई थी। कुछ लोगों ने यह मामला सुप्रीम कोर्ट में उठाया।

अस्थाई होल्डिंग सेंटरों में भेजे गए परिवारों से 6 जुलाई तक जगह खाली करने को कहा गया, लेकिन दर्जनों लोगों ने ऐसा करने से इनकार कर दिया, क्योंकि उनके पास जाने के लिए कोई दूसरी जगह नहीं थी। कुछ दिनों बाद, मानसून की बाढ़ ने कीर्तिपुर के एक होल्डिंग सेंटर को अपनी चपेट में ले लिया, जिससे लगभग 150 विस्थापित लोगों को आपातकालीन स्थिति में वहां से निकालना पड़ा।

जब युवा कार्यकर्ता वहां हालात का जायजा लेने गए, तो पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज किया और कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया। इस कार्रवाई की विपक्ष के नेताओं, जिनमें नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष गगन थापा भी शामिल थे, उन्होंने भी कड़ी आलोचना की।

गणेश नेपाली ने दे दी अपनी जान

इसी माहौल में गणेश नेपाली ने अपनी जान दे दी। वह एक राइड-हेलिंग ऐप के लिए गाड़ी चलाते थे, तभी म्युनिसिपल पुलिस ने पार्किंग के नियमों के उल्लंघन के आरोप में उनकी मोटरसाइकिल का पहिया लॉक कर दिया।

जुर्माना न भर पाने के कारण, उन्होंने एक सरकारी दफ्तर के बाहर खुद को आग लगा ली। उनकी मौत ने आवास और पुलिस की सख्त कार्रवाई से जुड़ी दो अलग-अलग शिकायतों को गुस्से की एक लहर में बदल दिया।

बालेन सरकार के खिलाफ काठमांडू की सड़कों पर नारेबाजी

जिन नारों ने बालेन शाह को सत्ता तक पहुंचाया, वे अब उनकी अपनी सरकार के बाहर भी गूंज रहे हैं। जो प्रदर्शनकारी कभी एक नए नेपाल की मांग कर रहे थे, उन्होंने उस सपने को छोड़ा नहीं है।

उन्होंने बस उन्हीं उम्मीदों को उस व्यक्ति पर केंद्रित कर दिया है, जिसके बारे में उन्हें लगता था कि वह इसे पूरा कर सकता है। बालेन शाह के लिए, क्रांति खत्म हो चुकी है। जवाबदेही का दौर तो अब शुरू हुआ है।

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