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नेपाल त्रासदी के बीच एक चाय ब्रेक ने कैसे बचाई छत्तीसगढ़ के 5 दोस्तों की जान?

Published: Sun, 30 Aug 2026 04:30 PM (IST)Updated: Sun, 30 Aug 2026 06:00 PM (IST)

नेपाल में आए भीषण सैलाब के बीच छत्तीसगढ़ के पांच दोस्तों की जान महज एक कप चाय ने बचा ली।

नेपाल त्रासदी।

नेपाल त्रासदी।

HighLights

  1. छत्तीसगढ़ के पांच दोस्त नेपाल बाढ़ त्रासदी में सुरक्षित बचे।

  2. एक चाय ब्रेक ने उन्हें भयानक सैलाब की चपेट में आने से बचाया।

  3. उन्होंने अपनी आंखों से गाड़ियों और शवों को बहते देखा।

डिजिटल डेस्क, काठमांडू। नेपाल की घाटियों में आए भयानक सैलाब और बाढ़ ने जहां एक ओर चारों तरफ तबाही मचा दी है। वहीं दूसरी ओर इस त्रासदी के बीच छत्तीसगढ़ के रायपुर से घूमने गए पांच दोस्तों के लिए एक कप चाय जिंदगी की सबसे बड़ी सौगात साबित हुई।

इस घटना के सामने आने के बाद एक सवाल खूब पूछे जा रहे हैं। सवाल यह पूछे जा रहे हैं कि आखिर कैसे एक टी ब्रेक ने छत्तीसगढ़ के पांच दोस्तो की जान बचाई? आइए हम आपको बताते हैं।    

छत्तीसगढ़ के वो पांच दोस्त

पूरे बात को ऐसे समझिए कि रायपुर के माना कैंप इलाके के रहने वाले नारायण सेन, दिनेश ओझा, प्रेम सिंह जगत, यतींद्र प्रकाश और दिनेश सिंह ठाकुर 21 अगस्त को नेपाल की यात्रा पर निकले थे। 

Nepal Tragedy (1)

बता दें कि यह पूरा वाकया 26 अगस्त की सुबह करीब 9:30 से 10:00 बजे के बीच का है। ये सभी दोस्त नेपाल के धाडिंग जिले के मलेखु कस्बे में पहुंचे थे और पशुपतिनाथ मंदिर जाने के रास्ते में थे। तभी उन्होंने एक होटल पर चाय पीने के लिए रुकने का फैसला किया।

चाय पीने के लिए नहीं रुकते तो....

पांचों दोस्तो में शामिल एक 53 वर्षीय नारायण सेन बताते हैं कि वे उस चाय की टपरी पर अपनी किस्मत की वजह से रुके थे। यदि वे वहां 10-15 मिनट पहले निकल जाते, तो वे सीधे उस बहते हुए सैलाब की चपेट में आ जाते।

नारायण बताते हैं कि होटल पर रुकने के बाद ही उन्हें पता चला कि आगे का एक पुल बाढ़ में पूरी तरह बह चुका है। वह होटल एक भारतीय का था, जिन्होंने संकट के उस समय में इन सभी दोस्तों की बहुत मदद की और उन्हें खाना खिलाया।

आंखों के सामने बहती चली गईं गाड़ियां और लाशें

नारायण बताते हैं कि चाय की दुकान पर रुकने के बाद इन दोस्तों ने वह खौफनाक मंजर देखा जिसे वे जिंदगीभर नहीं भूल पाएंगे। उन्होंने अपनी आंखों से देखा कि कैसे उफनती त्रिशूली नदी में गाड़ियां, शव और तमाम घरेलू सामान पानी के तेज बहाव में बहते जा रहे थे। इस भयावह दृश्य को देखकर वे बुरी तरह डर गए थे।

Nepal Tragedy (1)

55 वर्षीय दिनेश सिंह ठाकुर जो कि पेशे से पुलिस हेड कांस्टेबल हैं उन्होंने बताया कि घटना के वक्त वे पशुपतिनाथ मंदिर से महज 50 किलोमीटर की दूरी पर थे। उन्होंने बताया कि होटल पर अचानक लोगों को बेचैन और भागते हुए देखकर उन्हें अनहोनी का अहसास हुआ। बाद में पता चला कि बाढ़ ने पूरे गांवों, इमारतों, दफ्तरों और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स को तबाह कर दिया है।

कैसे गाड़ी में काटी रात?

खतरे को भांपते हुए स्थानीय लोगों और प्रशासन ने उन्हें एक ऊंचे और सुरक्षित स्थान पर शरण लेने की सलाह दी। इन पांचों दोस्तों ने मलेखु में एक ऊंचे स्थान पर पनाह ली और अपनी गाड़ी के अंदर ही पूरी रात बिताई। बिजली और पानी की सुविधा नहीं थी, लेकिन स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने उनकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा।

डर के मारे उन लोगों को रातभर ठीक से नींद नहीं आई क्योंकि हर पल यह डर सता रहा था कि बाढ़ और ज्यादा भयानक रूप न ले ले। दिनेश ठाकुर ने बताया कि मुश्किल वक्त में वे लगातार भगवान शिव का नाम जपते रहे और उन्हें पूरा विश्वास था कि महादेव के आशीर्वाद से ही उनकी जान बची है।

Nepal Tragedy (3)

इंटरनेट और हेल्पलाइन ने दी बड़ी राहत

गौर करने वाली बात यह है कि भले ही वे नेपाल में कुदरत के कहर के बीच फंस गए थे, लेकिन वहां इंटरनेट सेवा ठीक से काम कर रही थी। इसके जरिए वे लगातार रायपुर में अपने परिवारों के संपर्क में रहे, जिससे उनके परिजनों में ज्यादा पैनिक नहीं फैला। इसके अलावा, उन्होंने भारत सरकार द्वारा जारी किए गए हेल्पलाइन नंबर का इस्तेमाल करके अपनी सही लोकेशन भी साझा की थी।

स्थानीय महिलाओं ने दी बहनों जैसा प्यार

इस पूरी त्रासदी के बीच एक बेहद भावुक और सुकून देने वाला पल तब आया जब स्थानीय महिला सुरक्षा कर्मियों ने इन सभी दोस्तों की कलाई पर राखियां बांधीं। दरअसल, ये लोग रक्षा बंधन के बाद ही अपनी यात्रा से वापस लौटने वाले थे, इसलिए इनकी बहनों ने इन्हें पहले ही राखियां दे दी थीं। नेपाल में तैनात महिला सुरक्षा कर्मियों ने जब इन्हें राखी बांधी, तो उस मुश्किल माहौल में उन्हें घर जैसा अपनापन और ढांढस बंधा।

फिर कैसे हुई सुरक्षित घर वापसी?

गौरतलब है कि हालात सुधरने के बाद ये पांचों दोस्त 28 अगस्त को नेपाल से अपने सफर के लिए रवाना हुए और आखिरकार शनिवार को सकुशल अपने घर रायपुर लौट आए।

दिनेश ओझा, जो कपड़ों की सिलाई का काम करते हैं, ने कहा कि उन्होंने वहां जो कुछ देखा और अपनों की तलाश में लोगों को रोते-बिलखते हुए पाया, वह मंजर वे कभी नहीं भूल पाएंगे। हालांकि, वे इस बात से बेहद खुश और राहत महसूस कर रहे हैं कि वे सुरक्षित अपने परिवार के पास लौट आए हैं।

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