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2015 के बाद पहाड़ों पर चढ़ने के लिए सबसे घातक साल रहा 2026, नेपाल और PoK में खराब मौसम ने ली 40 पर्वतारोहियों की जान

Published: Fri, 02 Oct 2026 03:43 PM (IST)

मई से अब तक नेपाल और काराकोरम क्षेत्र में 40 पर्वतारोहियों और अभियान कर्मियों की जान जा चुकी है, जिससे ...और पढ़ें

नेपाल में हिमलुंग बेस कैंप(फोटो: रॉयटर्स)

नेपाल में हिमलुंग बेस कैंप(फोटो: रॉयटर्स)

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डिजिटल डेस्क, काठमांडू। इस साल मई से लेकर अब तक नेपाल के हिमालय और गुलाम कश्मीर के काराकोरम क्षेत्र में कम से कम 40 पर्वतारोहियों और अभियान कर्मियों की जान जा चुकी है। इसके साथ ही वर्ष 2026, 2015 के बाद से इस पूरे क्षेत्र का सबसे घातक पर्वतारोहण वर्ष साबित हुआ है।

भारी बर्फबारी और लगातार बदलते प्रतिकूल मौसम ने बेहद खतरनाक स्थितियां पैदा कर दी थीं। हालांकि, जान गंवाने की एक बड़ी वजह गंभीर मौसम चेतावनियों के बावजूद आगे चढ़ते रहने या असुरक्षित कैंपों में डटे रहने के फैसले भी रहे हैं।

दो बड़े हिमस्खलनों ने ली 26 जानें

इस वर्ष दर्ज की गई कुल मौतों में से 26 मौतें केवल दो बड़े हिमस्खलनों की वजह से हुईं। काराकोरम की ब्रॉड पीक 8,051 मीटर पर आए बर्फीले तूफान में 10 लोगों की जान चली गई, जिनमें विश्व रिकॉर्डधारी पर्वतारोही निर्मल पूर्जा और पांच अन्य अनुभवी नेपाली पर्वतारोही शामिल थे।

वहीं दूसरी ओर, 27 सितंबर को नेपाल के हिमलुंग हिमाल (7,126 मीटर) में बेस कैंप तैयार करने के दौरान आए एक अन्य भीषण हिमस्खलन में 16 नेपाली अभियान कर्मियों की दबकर दर्दनाक मौत हो गई।

रिकॉर्ड बनाने की अंधी दौड़

पर्वतारोहण विशेषज्ञों का मानना है कि रिकॉर्ड बनाने की होड़ और भारी व्यावसायिक निवेश के चलते पर्वतारोही सुरक्षा मानकों से समझौता कर रहे हैं। हाई-एल्टीट्यूड अभियान सुरक्षा विश्लेषक डॉ. एरिस थोर्न के अनुसार, जब दांव बहुत बड़ा होता है, तो पर्वतारोही मौसम के अनुमान के बजाय जोखिम भरी किस्मत पर दांव लगाने लगते हैं।

अभियान से पीछे हटने का मतलब लाखों रुपयों का नुकसान और महीनों की तैयारी पर पानी फिरना होता है, जिसके कारण स्पष्ट खतरों और चेतावनियों को भी नजरअंदाज कर दिया जाता है।

वरिष्ठ पर्वतारोहण इतिहासकार वॉन वेंस का कहना है कि जब स्पॉन्सरशिप और मार्केटिंग अभियानों में करोड़ों रुपये फंसे होते हैं, तो जानलेवा डेथ जोन के जोखिम का निष्पक्ष आकलन पूरी तरह दरकिनार हो जाता है।

नेपाल में कड़े नियमों की कमी

नेपाल में ऊंची चोटियों पर चढ़ने के लिए पर्वतारोहियों की योग्यता को लेकर कोई सख्त सरकारी नियम तय नहीं हैं, जो लंबे समय से चिंता का विषय रहा है।

एवरेस्ट विशेषज्ञ एलन अर्नेट ने सवाल उठाया कि जब सामान्य एथलेटिक प्रतियोगिताओं के लिए भी कड़े पात्रता नियम होते हैं, तो दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ों पर चढ़ने के लिए कोई अनिवार्य पैमाना क्यों नहीं है।

इसी लापरवाही का नतीजा मनास्लु (8,163 मीटर) पर देखने को मिला, जहां भारतीय मूल के पर्वतारोही ध्रुबज्योति गुहा और उनके गाइड फुर्सेम्बा शेरपा खराब मौसम के बावजूद कैंप 3 की ओर बढ़ते रहे, जबकि छह अन्य पर्वतारोही कैंप 2 से सुरक्षित लौट आए थे। बाद में गुहा और उनके शेरपा अपने टेंट के अंदर बर्फ में दबे पाए गए।

आर्थिक मजबूरी में जान जोखिम में डालते हैं स्थानीय कामगार

हिमलुंग हिमाल में जान गंवाने वाले कर्मियों में इमेजिन नेपाल के मिंगमा ग्याल्जे शेरपा की टीम के रसोइए और सहायक भी शामिल थे। मिंगमा ने बताया कि उन्होंने मौसम बिगड़ने पर कर्मचारियों को बेस कैंप खाली करने को कहा था, लेकिन वे कुछ देर नीचे आने के बाद फिर ऊपर लौट गए और रविवार की सुबह हिमस्खलन की चपेट में आ गए।

हिमालयी कामगारों के अधिकारों की पैरोकार माया शेरपा ने इस मजबूरी को स्पष्ट करते हुए कहा कि खराब मौसम में कैंप जल्दी छोड़ने पर इन स्थानीय कामगारों को अपनी मौसमी दिहाड़ी कटने या कंपनियों द्वारा असहयोगी करार दिए जाने का गहरा डर सताता है। यही वजह है कि वे रोजी-रोटी की मजबूरी और जानलेवा तूफानों के बीच फंसकर अक्सर अपनी जान गंवा बैठते हैं।

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