इजरायल की सियासत में अरब दल कैसे बना 'किंगमेकर'? आबादी से इतिहास तक की पूरी कहानी
इजरायल की कुल आबादी का 21 फीसदी हिस्सा आज वहां की राजनीति में निर्णायक ताकत बन चुका है। सैन्य शासन ...और पढ़ें

इजरायल में अरब समुदाय का इतिहास।
HighLights
इजरायल की राजनीति में अरब समुदाय निर्णायक शक्ति के रूप में उभरा।
हालिया चुनावों में अरब पार्टियों ने 19 सीटें जीतकर किंगमेकर की भूमिका निभाई।
अरब समुदाय का इतिहास संघर्षपूर्ण रहा, अब राजनीतिक भागीदारी बढ़ी।
शुभम कुमार, नई दिल्ली। यहूदी राष्ट्र इजरायल की राजनीति में इन दिनों एक नया और दिलचस्प मोड़ देखने को मिल रहा है। देश की कुल आबादी का लगभग 21 फीसदी हिस्सा होने के नाते, वहां का अरब समुदाय अब केवल एक दर्शक नहीं, बल्कि देश की सत्ता और सरकार गठन की गणित तय करने में एक निर्णायक ताकत के रूप में उभर रहा है।
हालांकि इस बात में कोई दोराय नहीं है कि इजरायल के राजनीतिक पटल पर अरब दलों की यह यात्रा जितनी संघर्षपूर्ण रही है, उतनी ही यह आज के दौर में बेहद प्रासंगिक भी बन चुकी है।
ऐसे में अब सवाल है कि एक यहूदी राष्ट्र में अरब समुदाय का इतिहास क्या है? इस समुदाय की भागीदारी आज इजरायल की राजनीति में सबसे अहम क्यों है? और निर्णायक ताकत के रूप में कैसे सामने आई?
क्यों चर्चा में इजरायल की अरब पार्टी?
अरब पार्टी के चर्चा में आने की सबसे बड़ी वजह इजरायल चुनाव 2026 में उसका प्रदर्शन है। इस बात को ऐसे समझिए कि इस चुनाव में जहां प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 27 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन उनका दक्षिणपंथी गठबंधन 53 सीटें पाने के साथ बहुमत से दूर रह गया है।
वहीं, पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाली विपक्षी खेमे को भी 48 सीटें ही मिल पाई, जिससे विपक्षी खेमा भी बहुतम के आंकड़े को नहीं छू सका है। ऐसे में इस चुनाव में अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों ने रिकॉर्ड 19 सीटें जीतकर किंगमेकर की स्थिति हासिल कर ली है।
हालांकि इजरायल के इतिहास की सबसे बड़ी और अहम बात यह है कि आज तक किसी भी पार्टी ने बहुमत के साथ नेसेट में सरकार बनाने का प्रस्ताव नहीं रखा है। ऐसे में इस बार अरब पार्टियां इजरायल के अगले प्रधानमंत्री के चुनाव में अहम भूमिका निभा सकती है।
पहले इजरायल के गठन को समझिए
देखिए, इजरायल के आधुनिक इतिहास और वहां के अरब अल्पसंख्यकों की स्थिति को समझने के लिए हमें सात दशक से भी अधिक पीछे जाना होगा। समय था द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का...जहां यहूदियों पर हुए भीषण अत्याचारों के मद्देनजर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक स्वतंत्र यहूदी राष्ट्र की मांग ने जोर पकड़ा।
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फिर समय आया 29 नवंबर 1947 का जब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव (Resolution 181) पारित किया। इसके तहत ब्रिटिश नियंत्रण वाले फलस्तीन क्षेत्र को दो हिस्सों में बांटने की योजना बनी-
- एक स्वतंत्र यहूदी राष्ट्र।
- दूसरा स्वतंत्र अरब राष्ट्र।
फिर आया इजरायल के उदय का समय
संयुक्त राष्ट्र के इसी विभाजन प्लान के आधार पर 14 मई 1948 को इजरायल राष्ट्र के औपचारिक गठन की घोषणा की गई। इस घोषणा के तुरंत बाद पहला अरब-इजरायल युद्ध छिड़ गया।
इस संघर्ष और उथल-पुथल के परिणामस्वरुप जो क्षेत्र इजरायल के नियंत्रण में आए, वहां रहने वाले फलस्तीनी अरब वहीं के नागरिक बन गए। हालांकि, इस भू-राजनीतिक बदलाव ने क्षेत्र में एक दीर्घकालिक संघर्ष और अविश्वास की नींव रख दी, जिसका असर आज भी वहां की राजनीति पर साफ दिखाई देता है।
इजरायल में अरब समुदाय के इतिहास को जानिए
देखिए इजरायल के गठन के बाद वहां के इतिहास में एक ऐसा पहलू भी रहा है, जिस पर अक्सर कम ही चर्चा होती है। वह है इजरायल की सीमा के भीतर रह गए अरब नागरिकों का संघर्ष, उनका शुरुआती दौर और संसद तक पहुंचने की उनकी यह कांटेभरी राह। आज भले ही इजरायली राजनीति में अरब दल किंगमेकर की भूमिका में हैं, लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने का उनका इतिहास बेहद कड़े नियंत्रण और पाबंदियों से होकर गुजरा है।
नागरिकता तो मिली, लेकिन सख्त पहरे के साथ
जब 1948 में इजरायल राष्ट्र का गठन हुआ, तो जो अरब नागरिक नव-निर्मित देश की सीमाओं के भीतर रह गए, उन्हें कानूनी रूप से इजरायल की नागरिकता दे दी गई। लोकतंत्र की खूबसूरती देखिए कि उन्हें 1949 में हुए देश के पहले संसदीय चुनाव से ही मतदान का अधिकार भी मिल गया था।
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लेकिन यह अधिकार केवल कागजों तक ही सीमित नजर आता था। वास्तविकता यह थी कि अरब नागरिक साल 1966 तक कड़े सैन्य प्रशासन के अधीन रहे। इस दौरान उनके दैनिक जीवन पर कई तरह के प्रतिबंध थे। यहां तक कि एक शहर से दूसरे शहर जाने के लिए भी उन्हें अनुमति लेनी पड़ती थी। ऐसे माहौल में राजनीतिक रूप से संगठित होना या अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना बेहद मुश्किल था।
अब समझिए अरब समुदाय का राजनीतिक सफर
देखिए, एक यहूदी राष्ट्र के निर्माण के साथ इस बात को समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि इजरायल की स्थापना के शुरुआती दशकों 1948 से लेकर 1960 के दशक के अंत तक में अरब नागरिकों की स्थिति बेहद संवेदनशील थी।
उन्हें सुरक्षा एजेंसियों की कड़ी निगरानी में रहना पड़ा और लंबे समय तक सैन्य प्रशासन के अधीन रखा गया। इस दौरान वे मुख्यधारा की राजनीति से कटे हुए थे।
सत्ताधारी दलों के साए में शुरुआत की कहानी
फिर शुरुआती दौर में जो अरब राजनेता संसद नेसट तक पहुंचे भी, वे ज्यादातर मुख्यधारा के यहूदी दलों जैसे मेपई पार्टी से जुड़े उप-दलों या संबद्ध सूचियों के जरिए आए थे। वे स्वतंत्र रूप से अपनी राजनीतिक पहचान स्थापित करने में संघर्ष कर रहे थे।
स्वतंत्र अरब दलों का उदय
फिर समय आया 1970 और 1980 के दशक का। इस समय के बाद धीरे-धीरे बदलाव आया। अरब नेताओं ने अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पार्टियां बनानी शुरू कीं। कम्युनिस्ट पार्टी जैसे हदाश के बैनर तले यहूदियों और अरबों ने मिलकर एक साझा मंच तैयार किया। इसके बाद ब्लैक पैंथर आंदोलन और जमीनी स्तर पर अधिकारों की मांग तेज हुई।
इजरायल की राजनीति में अरब दलों का कैसा दबदबा?
इजरायल की संसद यानी नेसट में कुल 120 सीटें होती हैं। यहां सरकार बनाने के लिए किसी भी दल या गठबंधन को जादुई आंकड़ा यानी कम से कम 61 सीटों की आवश्यकता होती है।
चूंकि इजरायल में अनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली लागू है, इसलिए वहां हमेशा से मिली-जुली सरकारों का दौर रहा है और कोई भी एक पार्टी आसानी से बहुमत नहीं पा पाती। यही वजह है कि इजरायली राजनीति में अरब राजनीतिक दल अब किंगमेकर की भूमिका में आ चुके हैं।
दल और गठबंधन के बारे में भी जानिए
हालिया राजनीतिक परिदृश्य में 'ज्वाइंट लिस्ट' और 'राअम' (Ra'am- यूनाइटेड अरब लिस्ट) जैसे दल अरब मतदाताओं का मुख्य प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली 'राम' पार्टी ने तो पिछले कुछ वर्षों में यह साबित कर दिया है कि वे जरूरत पड़ने पर वैचारिक दूरियों को दरकिनार कर सरकार के गठन या समर्थन में व्यावहारिक सौदेबाजी कर सकते हैं।
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बढ़ती भागीदारी और मतदान का रुझान भी समझिए
देश की लगभग 21% आबादी करीब 21 लाख से अधिक नागरिक होने के बावजूद ऐतिहासिक रूप से अरब मतदाताओं में मतदान का प्रतिशत यहूदी नागरिकों की तुलना में थोड़ा कम रहता था।
लेकिन हालिया चुनावों में अपने अधिकारों, सामुदायिक सुरक्षा, बजट आवंटन और अपराध पर लगाम कसने जैसे मुद्दों को लेकर अरब नागरिकों में राजनीतिक जागरूकता तेजी से बढ़ी है।
क्यों अहम है अरब दलों की भूमिका?
इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि यहूदी दक्षिणपंथी और वामपंथी-मध्यमार्गी धड़ों के बीच बंटी इजरायली राजनीति में जब भी त्रिशंकु संसद जैसी स्थिति बनती है, तब यह साफ हो जाता है कि बिना अरब दलों के समर्थन के स्थिरता हासिल करना नामुमकिन सा हो जाता है।
ऐसे में भले ही कई यहूदी दक्षिणपंथी दल वैचारिक आधार पर अरब पार्टियों को सरकार में शामिल करने का विरोध करते आए हैं, लेकिन संख्या बल के गणित के आगे कई बार राजनीतिक मजबूरियों को झुकना पड़ता है। अरब समुदाय के प्रतिनिधि अब शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे के विकास और अपने क्षेत्रों में बढ़ती हिंसा व संगठित अपराध को रोकने के लिए सरकार पर सीधा दबाव बना रहे हैं।
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