क्या अब नेतन्याहू का समय खत्म? इजरायल में आइसेनकोट के सत्ता में आने की संभावना; 10 बड़ी बातें
राष्ट्रपति हर्जोग ने विपक्ष के नेता गादी आइसेनकोट को इजरायल की अगली सरकार बनाने की जिम्मेदारी सौंपी है, जिन्हें 67 सांसदों का समर्थन प्राप्त है।

इजरायल में कैसे बनेगी सरकार। (फाइल फोटो।)
डिजिटल डेस्क, तेल अवीव। इजरायल में 27 अक्टूबर को हुए चुनाव में किसी भी राजनीतिक दल को साफ बहुमत नहीं मिल पाया। अब राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने विपक्ष के नेता गादी आइसेनकोट को देश की अगली सरकार बनाने की जिम्मेदारी सौंपी है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के मुख्य प्रतिद्वंद्वी को सत्ता में आने का पहला मौका मिल गया है।
इजरायल डिफेंस फोर्सेज (IDF) के पूर्व प्रमुख आइसेनकोट को नेसेट (इजरायली संसद) के 120 सदस्यों में से 67 का समर्थन हासिल हुआ है। हालांकि, गठबंधन सरकार बनाना एक चुनौती है क्योंकि उनके गुट के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है। इसके अलावा, संभावित सहयोगी दल अरब पार्टियों और अति-रूढ़िवादी गुटों की भूमिका को लेकर एक-दूसरे से असहमत हैं। इस बीच, नेतन्याहू एक राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने पर जोर दे रहे हैं।
आइए जानते हैं इजरायल में चल रहे राजनीतिक घटनाक्रम के बारे में 10 बड़ी बातें।
1. इजरायल की अगली सरकार बनाने के लिए आइसेनकोट को छह सप्ताह का समय मिला है
हर्जोग ने शनिवार को राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत करने और आइसेनकोट तथा नेतन्याहू के साथ अलग-अलग चर्चा करने के बाद अपने फैसले की घोषणा की।
इस जनादेश के तहत पूर्व सैन्य प्रमुख को संभावित सहयोगियों के साथ बातचीत करने और सरकार बनाने के लिए जरूरी संसदीय समर्थन जुटाने के लिए 42 दिनों तक का समय दिया गया है। यह फैसला इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे नेतन्याहू के लिए एक बड़ा झटका है। सत्ता में बने रहने की उनकी कोशिशों को तब करारा झटका लगा, जब संसद के अधिकांश गुटों ने इस पद के लिए आइसेनकोट के नाम की सिफारिश की।
अपनी पहली प्रतिक्रिया में आइसेनकोट ने एक राष्ट्रीय आपातकालीन सरकार बनाने की अपील की। उन्होंने एक्स पर लिखा, "अब एक राष्ट्रीय आपातकालीन सरकार बनाने का समय आ गया है। हम इसके योग्य साबित हों, यह सुनिश्चित करने के लिए मैं हर संभव कोशिश करूंगा।"
2. आइसेनकोट को 67 सांसदों का समर्थन कैसे मिला?
120 सदस्यों वाली संसद (नेसेट) में 67 सांसदों का प्रतिनिधित्व करने वाले गुटों ने आइसेनकोट के नाम की सिफारिश की। इनमें यहूदी-नेतृत्व वाला विपक्षी गुट (जिसके पास 48 सीटें हैं), अरब पार्टी 'राआम' (8 सीटें) और जॉइंट लिस्ट (11 सीटें) शामिल हैं।
जॉइंट लिस्ट के सर्वसम्मत समर्थन ने आइसेनकोट को संसदीय बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटों के आंकड़े तक पहुंचने में अहम भूमिका निभाई। इस बीच, नेतन्याहू को 46 सांसदों का प्रतिनिधित्व करने वाले गुटों से समर्थन मिला। सात सांसदों ने किसी भी उम्मीदवार का समर्थन नहीं किया।
हालांकि, इन समर्थनों का मतलब यह नहीं है कि अपने आप कोई गठबंधन सरकार बन जाएगी। आइसेनकोट को अभी संभावित सहयोगियों के साथ बातचीत करनी होगी और अहम नीतिगत मुद्दों पर उनका समर्थन हासिल करना होगा।
3. अरब पार्टियां यह तय कर सकती हैं कि आइसेनकोट सरकार बना पाएंगे या नहीं
'राआम' और 'जॉइंट लिस्ट' के समर्थन से आइसेनकोट को एक बड़ा फायदा मिला है। इनकी कुल 19 सीटें उन्हें बहुमत हासिल करने में मदद कर सकती हैं, लेकिन अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों के साथ काम करना एक राजनीतिक चुनौती है। इससे पहले केवल एक बार ही कोई अरब पार्टी इजरायली गठबंधन सरकार का हिस्सा रही है।
2021 में पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट के नेतृत्व वाली सरकार में 'राआम' शामिल हुई थी। वह सरकार 18 महीने बाद गिर गई थी, जिसका एक कारण वेस्ट बैंक को लेकर हुए मतभेद थे। आइसेनकोट अपने स्वाभाविक सहयोगियों जैसे 'टुगेदर', 'द डेमोक्रेट्स' और 'इजरायल अवर होम' के साथ मिलकर एक अल्पसंख्यक सरकार बना सकते हैं और बाहरी समर्थन के लिए अरब पार्टियों पर निर्भर रह सकते हैं। इस तरह के गठबंधन से उनके पास कुल 67 सीटें हो जाएंगी।
हालांकि, एविग्डोर लिबरमैन की पार्टी इजरायल अवर होम ने साफ कर दिया है कि वह अरब पार्टियों के समर्थन वाली किसी अल्पसंख्यक सरकार का साथ नहीं देगी। वहीं, द डेमोक्रेट्स ने सार्वजनिक रूप से इन अरब पार्टियों को गठबंधन में शामिल करने की मांग की है। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमलों और उसके बाद गाजा में शुरू हुए युद्ध के कारण राजनीतिक माहौल और भी संवेदनशील हो गया है।
4. अति-रूढ़िवादी पार्टियां बहुमत हासिल करने का एक और संभावित रास्ता हो सकती हैं
आइसेनकोट और उनके सहयोगी इजरायल की दो अति-रूढ़िवादी पार्टियों से संपर्क कर सकते हैं, जिनके पास कुल मिलाकर 13 सीटें हैं। इनका समर्थन मिलने से विपक्षी गुट को अरब पार्टियों पर निर्भर रहे बिना, बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटों तक पहुंचने में मदद मिल सकती है। हालांकि, बातचीत के दौरान इस मुद्दे पर असहमति हो सकती है कि अति-रूढ़िवादी धार्मिक शिक्षण संस्थानों (सेमिनरी) के छात्रों को सैन्य सेवा से छूट दी जाती रही है।
आइसेनकोट और लिबरमैन ने इस छूट की कड़ी आलोचना की है। कई इजरायली मानते हैं कि इन व्यवस्थाओं से उन अन्य नागरिकों पर अनुचित बोझ पड़ता है जो सेना में सेवा देते हैं। राष्ट्रपति के साथ परामर्श के दौरान यूनाइटेड तोराह जुडाइज्म ने किसी भी उम्मीदवार का समर्थन करने से इनकार कर दिया, जबकि शास ने नेतन्याहू का समर्थन किया। इससे किसी समझौते की संभावना बनी हुई है, लेकिन इसके लिए कुछ कठिन समझौते करने होंगे।
5. आइसेनकोट चार मुख्य सिद्धांतों के साथ एक राष्ट्रीय आपातकालीन सरकार चाहते हैं
आइसेनकोट ने इजरायल की राजनीतिक और सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए एक राष्ट्रीय आपातकालीन सरकार बनाने का प्रस्ताव रखा है। उनके प्रस्तावित प्रशासन का संचालन चार सिद्धांतों पर होगा। इजरायल को एक यहूदी और लोकतांत्रिक राज्य के रूप में मान्यता देना, स्वतंत्रता की घोषणा का सम्मान करना, सभी नागरिकों के लिए राष्ट्रीय और सैन्य सेवा अनिवार्य करना और हमास के सैन्य और राजनीतिक विंग को खत्म करना।
उनकी पार्टी याशर ने भी यह स्पष्ट किया है कि वह केवल उन्हीं पार्टियों और सांसदों के साथ काम करेगी जो उनके इन सिद्धांतों को स्वीकार करते हैं। नेतान्याहू की एकजुट सरकार बनाने की अपील के जवाब में याशर ने लिकुड पार्टी के सदस्यों से आग्रह किया कि वे खुद को उन कट्टरपंथी पार्टियों के गठबंधन से दूर कर लें। यहां इशारा नेतान्याहू के धार्मिक-राष्ट्रवादी गुट में शामिल अति-दक्षिणपंथी धड़ों की ओर है।
6. नेतन्याहू ने संसदीय बहुमत खो दिया, लेकिन लिकुड सबसे बड़ी पार्टी बनी रही
इस झटके के बावजूद नेतन्याहू इजरायली राजनीति में एक अहम ताकत बने हुए हैं। 27 अक्टूबर के चुनाव में उनकी लिकुड पार्टी 27 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। हालांकि, उनके धार्मिक-राष्ट्रवादी गुट की सीटें 64 से घटकर 53 रह गईं, जो संसदीय बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटों के आंकड़े से कम हैं।
प्रधानमंत्री को तब भी एक झटका लगा जब यूनाइटेड तोराह जुडाइज्म पार्टी ने हर्जोग के साथ बातचीत के दौरान उनका समर्थन करने से इनकार कर दिया। इस पार्टी के फैसले ने अति-रूढ़िवादी गुटों के साथ उनके लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक गठबंधन की स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
7. आइसेनकोट की कोशिशों का मुकाबला करने के लिए नेतन्याहू ने राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने की मांग की
आइसेनकोट की नियुक्ति के बाद नेतन्याहू ने सभी जायोनी राजनीतिक गुटों को मिलाकर एक व्यापक राष्ट्रीय एकता सरकार के तुरंत गठन की मांग की। टेलीविजन पर दिए गए अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि बाहरी सुरक्षा खतरों खासकर ईरान से निपटने के लिए इजरायल को एक एकजुट राजनीतिक नेतृत्व की जरूरत है।
नेतान्याहू ने कहा कि प्रस्तावित सरकार ईरान से परमाणु खतरे को हमेशा के लिए खत्म कर देगी, इजरायल को एक यहूदी राष्ट्र के रूप में बनाए रखेगी और हमारे बीच एकता लाएगी। हालांकि, विपक्ष ने उनकी इस अपील को खारिज कर दिया।
डेमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष यायर गोलान ने कहा कि इजरायल के लोकतंत्र, सुरक्षा और भविष्य की रक्षा के लिए नेतान्याहू की सरकार को हटाकर एक बदलाव और उद्धार लाने वाली सरकार लाई जानी चाहिए। गोलान ने यह भी मांग की कि अति-रूढ़िवादी नागरिकों को सेना में भर्ती किया जाए और उन्हें कार्यबल का हिस्सा बनाया जाए। उन्होंने तर्क दिया कि रक्षा और करों का बोझ केवल धर्मनिरपेक्ष इजरायलियों पर ही नहीं पड़ना चाहिए।
8. नेतन्याहू की कोशिश है कि आइसेनकोट अरब पार्टियों के साथ हाथ न मिलाएं
नेतन्याहू की राजनीतिक रणनीति का एक अहम हिस्सा यह रहा है कि वे आइसेनकोट और अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों के बीच किसी भी तरह के समझौते को हतोत्साहित करें। उन्होंने बार-बार सरकार में उनकी भागीदारी को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया है।
हर्जोग द्वारा अपना फैसला सुनाए जाने से कुछ समय पहले नेतन्याहू ने आतंकवादियों का समर्थन करने वालों के साथ जल्दबाजी में सरकार बनाने के खिलाफ चेतावनी दी। वे अरब-नेतृत्व वाले दलों के लिए इसी तरह की शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने बिना किसी सबूत के यह दावा भी किया है कि अरब दलों ने चुनाव चुरा लिए हैं।
वहीं, आइसेनकोट ने संकेत दिया है कि वे कुछ शर्तों के साथ उनके (अरब दलों के) साथ काम कर सकते हैं। इन शर्तों में यह मानना भी शामिल है कि हमास एक आतंकवादी संगठन है जिसे खत्म किया जाना चाहिए। सरकार बनाने की आइसेनकोट की कोशिशों में यह मुद्दा सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बन सकता है।
9. अगर आइसेनकोट असफल रहते हैं तो नेतन्याहू को एक और मौका मिल सकता है
अगर आइसेनकोट 42 दिनों के भीतर सरकार बनाने में नाकाम रहते हैं तो हर्जोग संसद में बहुमत हासिल करने का अगला मौका नेतन्याहू को दे सकते हैं। प्रधानमंत्री विपक्षी दलों के सांसदों को अपने पाले में लाकर विपक्ष को कमजोर करने की कोशिश कर सकते हैं।
नेतन्याहू पहले भी इस तरह की राजनीतिक चालें चल चुके हैं। 2022 के चुनावों से पहले उन्होंने अपने खिलाफ बने गठबंधन को अस्थिर कर दिया था और अंततः सत्ता में वापसी की थी। हालांकि, उनके सामने अभी की चुनौती कहीं अधिक कठिन है क्योंकि विपक्षी गुट को व्यापक समर्थन हासिल है और बहुमत पाने के लिए उन्हें कहीं अधिक सांसदों को अपने साथ लाना होगा।
10. अगर दोनों नेता असफल रहते हैं, तो एक और चुनाव हो सकता है
अगर आइसेनकोट और नेतन्याहू में से कोई भी सरकार बनाने में सफल नहीं होता है तो नेसेट किसी दूसरे उम्मीदवार को यह काम सौंप सकती है। इस प्रक्रिया के लिए लगभग 100 दिनों की समय-सीमा तय है। अगर इस अवधि के भीतर कोई भी उम्मीदवार सरकार नहीं बना पाता है तो इजरायल में एक और चुनाव कराना होगा।
एक और संभावना यह है कि आइसेनकोट के सहयोगियों और नेतन्याहू की लिकुड पार्टी के बीच एक यूनिटी गवर्नमेंट (मिली-जुली सरकार) बन जाए, हालांकि फिलहाल ऐसा होने की उम्मीद कम ही है। इस तरह की सरकार के पास 67 सीटें होंगी, लेकिन इसके लिए आइसेनकोट के सहयोगियों को अपना मुख्य चुनावी वादा (नेतन्याहू को सत्ता से हटाना) छोड़ना पड़ेगा।
वहीं नेतन्याहू को अपने कट्टर दक्षिणपंथी और अति-रूढ़िवादी राजनीतिक सहयोगियों से दूरी बनानी होगी। हर्जोग ने राजनीतिक दलों से अपील की है कि वे खुले मन से बातचीत करें और एक और चुनाव को टालने के लिए हर संभव कोशिश करें।
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