छात्र आंदोलनों ने ब्राजील और सर्बिया के चुनावों में कैसे बदली राजनीति की दिशा? सड़कों पर उतरे जेन-जी ने लिखा नया राजनीतिक इतिहास
ब्राजील और सर्बिया में छात्र आंदोलनों ने दिखाया कि युवा विरोध प्रदर्शन राजनीतिक समीकरणों को बदल सकते हैं। सर्बिया में ...और पढ़ें

छात्र आंदोलनों ने ब्राजील और सर्बिया में बदली राजनीतिक दिशा

समय कम है?
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डिजिटल डेस्क, बेलग्रेड। जब भी छात्र सड़कों पर उतरते हैं, तो अक्सर उन्हें अनुभवहीन या आसानी से बहकाए जाने वाला मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन हाल ही में ब्राजील और सर्बिया में हुए चुनावों ने साबित कर दिया है कि जब छात्र और युवा आंदोलन लंबे समय तक चलते हं, तो वे किसी भी राजनीतिक समीकरण को पूरी तरह बदल सकते हैं।
यह दोनों देश इस बात के अलग-अलग उदाहरण हैं कि जन-विरोध और छात्रों की लामबंदी सत्ता में बैठे लोगों को कड़ी चुनौती दे सकती है।
सर्बिया में मांग से लेकर चुनावी जीत तक
सर्बिया में छात्र आंदोलन की शुरुआत नवंबर 2024 में नोवी साद रेलवे स्टेशन पर हुई एक भीषण त्रासदी हुई थी, जहां कंक्रीट की छत गिरने से 16 लोगों की मौत हो गई थी। इस हादसे के बाद सरकार से जवाबदेही, पारदर्शिता और दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की मांग उठने लगी। धीरे-धीरे यह गुस्सा भ्रष्टाचार और सरकारी नीतियों के खिलाफ बड़े असंतोष में बदल गया।
छात्रों ने यूनिवर्सिटी विभागों को ब्लॉक कर दिया और बिना किसी केंद्रीय नेतृत्व के सामूहिक रूप से खुद को संगठित किया। उनकी मांगे सिर्फ हादसे तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि इसमें जल्द चुनाव कराने और संस्थागत सुधार की मांग भी जुड़ गई।
हाल ही में हुए संसदीय चुनावों में छात्रों के समर्थन वाली स्टूडेंट लिस्ट ने राष्ट्रपति अलेक्जेंडर वुसिक के नेतृत्व वाले गठबंधन को पछाड़ दिया। शुरुआती नतीजों के अनुसार, स्टूडेंट लिस्ट को 52.71 प्रतिशत वोट मिले और संसद में 140 सीटें हासिल हुईं, जबकि सत्ताधारी गठबंधन 39.17 प्रतिशत वोटों के साथ 104 सीटों पर सिमट गया।
ब्राजील में एकजुट हुए छात्र
वहीं ब्राजील का मामला इससे अलग था। वहां छात्रों और युवाओं का आंदोलन किसी नई पार्टी को जिताने के लिए नहीं, बल्कि फ्लावियो बोल्सोनारो की राजनीति वापसी को रोकने के लिए था। पहले दौर के चुनाव में बोल्सोनारो ने लुइज इनासियो लूला डा सिल्वा को पीछे छोड़ दिया था।
इसके बाद देश भर के विश्वविद्यालयों के छात्र और युवा सड़कों पर उतर आए। जुंटोस, आंदोलन की छात्रा नेता जूलिया एंड्राडे माइया ने बताया कि लोग इसलिए सड़कों पर उतरे क्योंकि वे जानते थे कि बोल्सोनारो का कार्यकाल सार्वजनिक सेवाओं, अल्पसंख्यकों के अधिकारों और पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा था। यह विरोध प्रदर्शन सिर्फ लूला के समर्थन में नहीं, बल्कि फासीवाद को हराने के लिए था।
सोशल मीडिया और जमीनी प्रदर्शनों के मेल ने इस अभियान को अभूतपूर्व ताकत दी। अंततः, कड़े मुकाबले के बाद लूला डा सिल्वा ने 51.79 प्रतिशत वोट पाकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। वे ब्राजील के लोकतांत्रिक इतिहास के ऐसे पहले राष्ट्रपति बने, जो पहले दौर में पीछे रहने के बाद रनऑफ में जीते।
आगे की बड़ी चुनौतियां
ब्राजील और सर्बिया के इन आंदोलनों ने यह तो साबित कर दिया कि लगातार चलने वाला जन-असंतोष पारंपरिक राजनीतिक ताकतों को हिला सकता है। हालांकि, असली परीक्षा अब शुरू होती है।
विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव जीतने या सरकार बदलने भर से जनता की मूल समस्याएं खत्म नहीं हो जातीं। सर्बिया के छात्रों के सामने जहां अपनी चुनावी ताकत को पारदर्शी और जवाबदेह शासन में बदलने की चुनौती है, वहीं ब्राजील में लूला सरकार को भी पर्यावरण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाना होगा।
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