आधे मिनट में 14 हजार फीट नीचे गया था फ्लाईदुबई एयरक्राफ्ट... क्या होता है जब तेजी से नीचे जाता है पैसेंजर प्लेन?
यह लेख यात्री विमानों के ध्वनि की गति के करीब पहुंचने और अचानक गोता लगाने के प्रभावों के पीछे के ...और पढ़ें
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ध्वनि की गति के करीब आने पर विमान पर शॉक वेव बनती हैं।
HighLights
ध्वनि की गति के करीब आने पर विमान पर शॉक वेव बनती हैं।
स्टीप डाइव से विमान पर g-फोर्स और संरचनात्मक दबाव बढ़ता है।
FAA नियम विमानों की डिजाइन डाइव स्पीड और सुरक्षा सीमाएं निर्धारित करते हैं।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। दुबई से तेल अवीव जाने वाली फ्लाईदुबई की एक फ्लाइट में को-पायलट ने कथित तौर पर कैप्टन पर चाकू से हमला किया। इसके बाद यात्रियों और क्रू ने स्थिति को संभाला। यह घटना तब हुई जब सऊदी अरब के ऊपर लगभग आधे मिनट में विमान 14 हजार फीट नीचे गोता लगाते हुए नीचे की ओर गिरने लगा।
लेकिन बुधवार को फ्लाईदुबई की बोइंग 737 मैक्स 8 विमान का रडर खराब होने के बाद उसे सऊदी अरब के तबुक में उतारना पड़ा, और ऐसी घटनाओं के पीछे क्या विज्ञान है और तब क्या होता है जब कोई यात्री विमान ध्वनि की गति के करीब पहुंचता है?
क्या होता है जब यात्री विमान ध्वनि की गति के करीब पहुंचता है
यात्री विमान के ध्वनि की गति तक पहुंचने से काफी पहले ही उसके विंग इसका असर महसूस करने लगते हैं। US फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन (FAA) की एयरप्लेन फ्लाइंग हैंडबुक के अनुसार, ज्यादा ऊंचाई पर जेट की गति को मैक नंबर में बताया जाता है, जो विमान की असली एयरस्पीड और ध्वनि की गति का अनुपात होता है। मैक 1 ध्वनि की गति के बराबर होती है।
FAA हैंडबुक के अनुसार, सबसोनिक उड़ान यानि ध्वनि की गति से कम गति वाली उड़ान के लिए बनाए गए जेट की गति ध्वनि की गति से कम मैक नंबर तक सीमित रहती है, क्योंकि शॉक वेव बनती है।
विंग अपनी घुमावदार ऊपरी सतह पर बहने वाली हवा की गति को बढ़ाकर लिफ्ट पैदा करता है, इसलिए हवा का कुछ हिस्सा विमान के पहुंचने से पहले ही ध्वनि की गति तक पहुंच जाता है। शॉक वेव वहां बनती है जहां तेजी से बहने वाली हवा अचानक धीमी होकर ध्वनि की गति से कम हो जाती है।
FAA के अनुसार, जैसे-जैसे विमान तेज उड़ता है शॉक और मजबूत होता जाता है और विंग के साथ पीछे की ओर बढ़ता है, जब तक कि उसके पीछे की हवा की धारा सतह से अलग नहीं हो जाती।
यात्री विमानों की होती है दो गति सीमाएं
यात्री विमानों की गति की दो सीमाएं होती हैं जिन्हें पायलटों को पार नहीं करना चाहिए। पहली होती है अधिकतम ऑपरेटिंग स्पीड या VMO, जो कम ऊंचाई पर लागू होती है, और दूसरी है अधिकतम ऑपरेटिंग मैक नंबर या MMO, जो ज्यादा ऊंचाई पर लागू होती है, जहाँ ठंडी हवा ध्वनि की गति को कम कर देती है।
हैंडबुक के अनुसार, MMO सीमा से आगे जाने पर, अलग हुई हवा की धारा के कारण प्लेन से जोरदार झटके लग सकते हैं और विमान पर नियंत्रण खोने का खतरा हो सकता है। लिफ्ट में बदलाव से प्लेन का अगला हिस्सा नीचे की ओर झुक सकता है, जिसे पायलट मैक टक कहते हैं, अगर ये ज्यादा हो जाए तो पायलट के पास प्लेन को तेजी से नीचे गिरने से रोकने के लिए शायद ही कोई कंट्रोल बचे।
स्टीप डाइव का एयरलाइनर पर क्या असर होता है?
स्टीप डाइव से एयरक्राफ्ट पर लगने वाले g-फ़ोर्स भी बदलते हैं। नोज के अचानक नीचे की ओर झुकने से यह कुछ समय के लिए जीरो g से नीचे जा सकता है।
US नेशनल ट्रांसपोर्टेशन सेफ्टी बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार, जीरो g पर चीजें हवा में फैरती हैं, और उससे नीचे जाने पर छत की ओर तैरने लगती है और फिर डाइव से बाहर निकलने पर g फोर्स बढ़ जाता है, जिससे पहले से ही तेज रफ्तार के दबाव में चल रहे स्ट्रक्चर पर और ज्यादा दबाव पड़ता है।
g फोर्स का टेल पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है, क्योंकि तेज रफ्तार में रडर या एलिवेटर की बड़ी या बार-बार होने वाली हलचल उन्हें उनकी डिजाइन क्षमता से ज्यादा दबाव में डाल सकती है।
न्यूज एजेंसी AP की रिपोर्ट के अनुसार नीचे आते समय FZ1073 का ज्यादातर रडर उसकी टेल से अलग हो गया था। जानकारों का शक है कि डाइव की वजह से यह नुकसान हुआ होगा, लेकिन इसकी पुष्टि सिर्फ पूरी जांच से ही हो सकती है।
कितना दबाव झेल सकते हैं एयरलाइनर
US के नियमों के अनुसार, हर नए एयरलाइनर की डिजाइन डाइव स्पीड उसकी ऑपरेटिंग लिमिट से ज्यादा होनी चाहिए। FAA के अनुसार, यह आंकड़ा एक काल्पनिक मुश्किल स्थिति के आधार पर तय किया जाता है जिसमें प्लेन को क्रूजिंग के दौरान नोज-डाउन स्थिति में 7.5 डिग्री झुकाया जाता है और पायलट के उसे वापस सीधा करने से पहले 20 सेकंड तक वैसे ही छोड़ दिया जाता है।
उस डाइव स्पीड तक हर रफ्तार पर एयरक्राफ्ट में फ्लटर नहीं होना चाहिए। फ्लटर विंग्स या टेल की सतहों में होने वाला जोरदार और खुद-ब-खुद बढ़ने वाला कंपन है, और नए डिजाइनों का डाइव स्पीड तक इसके लिे फ्लाइट टेस्ट किया जाना जरूरी है।
FAA के नियमों के अनुसार, एयरलाइनर के स्ट्रक्चर को सामान्य स्पीड पर बिना किसी स्थाई नुकसान के कम से कम 2.5g और -1g का दबाव झेलने में सक्षम होना चाहिए। डिजाइन डाइव स्पीड पर नेगेटिव g की जरूरत घटकर जीरो हो जाती है। इसके बाद डिजाइनर्स को इन सीमाओं के ऊपर 50 प्रतिशत का सेफ्टी मार्जिन जोड़ना होता है, जिसे स्ट्रक्चर को कम से कम तीन सेकंड तक झेलना होता है। यूरोप के एविएशन रेगुलेटर, EASA के नियम भी इसी तरह के हैं।
कैनबरा के पास 2017 में Qantas 737 के साथ हुई एक घटना की ऑस्ट्रेलियाई ट्रांसपोर्ट सेफ्टी ब्यूरो की जांच के दौरान, बोइंग ने जांचकर्ताओं को बताया कि वह अपने 737 ट्रेनिंग मैनुअल में गाइडेंस जोड़ने पर विचार कर रहा था। इसमें कहा गया था कि VMO या MMO से ज्यादा स्पीड पर हवाई जहाजों का फ्लाइट टेस्ट किया गया है। ताकि यह पक्का किया जा सके कि पायलट के स्मूद इनपुट से हवाई जहाज सामान्य फ्लाइट एनवेलप में वापस आ जाएगा।
अब जांच में आगे क्या होगा?
फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर में हवा में जेट की स्पीड, g-फ़ोर्स और कंट्रोल की पोजिशन दर्ज होगी। जिससे जांच कर्ता इन रीडिंग का इस्तेमाल करके यह पता लगाने की कोशिश करेंगे कि डाइव के दौरान क्या हुआ था।
