नई दिल्‍ली, (रमेश मिश्र)। कोरोना और यूक्रेन संकट की गंभीर स्थिति के बीच राष्‍ट्रपति पुतिन का भारत आने का फैसला काफी अहम है। हालांकि, घरेलू संकट की वजह से पुतिन सिर्फ कुछ घंटे ही भारत में रहेंगे। पुतिन के इस फैसले से चीन और अमेरिका की चिंता क्‍यों बढ़ गई है ? आखिर अमेरिका और चीन की चिंता की बड़ी वजह क्‍या है ? पुतिन की इस यात्रा के कूटनीतिक मायने क्‍या हैं? भारत और रूस की दोस्‍ती पर इसका क्‍या असर होगा? चीन सीमा विवाद पर इसका क्‍या असर होगा? भारत के लिए रूस क्‍यों उपयोगी है? इन तमाम मसलों पर प्रोफेसर हर्ष वी पंत (आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, नई दिल्ली में निदेशक, अध्ययन और सामरिक अध्ययन कार्यक्रम के प्रमुख) की राय।

रूसी राष्‍ट्रपति पुतिन की यात्रा के क्‍या संकेत हैं ?

1- रूसी राष्‍ट्रपति राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा तो महज कुछ घंटों की है, लेकिन इसके निह‍ितार्थ बहुत गहरे हैं। खास बात यह है कि राष्‍ट्रपति पुतिन और पीएम नरेन्द्र मोदी के बीच कुछ देर अकेले में भी बातचीत होगी। हाल के वर्षों में खासकर चीन और भारत सीमा व‍िवाद के समय से रूस और भारत के संबंधों में एक गैप दिखा है। दोनों देशों के संबंधों में वह गरमाहट नहीं दिखी। चीन सीमा विवाद के समय भारत को रूस के सहयोग की जरूरत थी, लेकिन रूस ने मौन धारण कर लिया। इस दौरान भारत अमेरिका के काफी निकट आया। अनुच्‍छेद 370 और आतंकवाद जैसे ज्‍वलंत मुद्दों पर अमेरिका ने भारत का पक्ष लिया। चीन की चुनौती से निपटने के लिए क्‍वाड जैसे संगठन में अमेर‍िका ने भारत को सदस्‍य बनाया। अमेरिका ने दुनिया के समक्ष भारत को अपना गहरा दोस्‍त बताया। रूस और चीन की निकटता भी भारत को खलती रही है। इतना ही नहीं चीन की निकटता के साथ रूस पाकिस्‍तान के भी करीब गया।

2- रूसी मिसाइल सिस्‍टम एस-400 पर भारत के रुख ने यह संकेत दिया है कि भारत अपने सामरिक मामलों में किसी की दखलअंदाजी स्‍वीकार नहीं करता। भारत के इस कदम को शायद रूस को उम्‍मीद नहीं रही होगी। खासकर तब जब अमेरिका ने इस डील का विरोध किया था। इस रक्षा सौदे को समाप्‍त करने के लिए उसने भारत पर जबरदस्‍त दबाव बनाया, लेकिन भारत अपने फैसले पर अडिग रहा। भारत के इस कदम के बाद रूस को यह बात समझ में आ गई कि भारत अपने विदेश नीति के सैद्धांतिक नीतियों में कोई बदलाव नहीं किया है। रूसी राष्‍ट्रपति पुतिन की इस यात्रा को इसी कड़ी से जोड़कर देखा जाना चाहिए। एस-400 मिसाइल सिस्‍टम डील के जरिए भारत यह संदेश देने में सफल रहा है कि उसके रूस के संबंधों पर किसी बात का कोई असर नहीं पड़ता है।

3- कोरोना और यूक्रेन संकट की गंभीर स्थिति के बीच राष्‍ट्रपति पुतिन का भारत आने का फैसला यह संकेत है कि भारत के साथ रूस की पुरानी दोस्ती आगे भी प्रासंगिक रहेगी। संभवत: घरेलू संकट की वजह से ही पुतिन ने सिर्फ कुछ घंटे भारत में गुजारने का फैसला किया है। पुतिन की यह यात्रा भारत व रूस के पारंपरिक रिश्तों में ढलान आने के कयासों को भी खत्म करने वाली साबित होगी। खासकर तब जब पुतिन की तरफ से दिसंबर 2019 की प्रस्तावित यात्रा को टालना, लावरोव का बतौर रूस के विदेश मंत्री पहली बार पाकिस्तान जाना, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन को मदद, अमेरिका से भारत की बढ़ती नजदीकियां, क्वाड की स्थापना आदि के चलते यह कयास लगाए जा रहे थे कि भारत व रूस के बीच रिश्तों में अब पुरानी गर्माहट नहीं रहेगी।

भारत के लिए कितनी उपयोगी है पुतिन की यात्रा ?

रूसी राष्‍ट्रपति पुतिन की इस यात्रा से भारत व रूस के द्विपक्षीय रिश्तें काफी प्रगाढ़ होंगे। आजादी के बाद से ही भारत और रूस के रिश्‍ते काफी मजबूत रहे हैं। खासकर रूस के साथ सैन्‍य संबंध शुरू से बेहतर रहे हैं। मिलिट्री हार्डवेयर्स के अलावा भारत रूस से टैंक्स, छोटे हथियार, एयरक्राफ्ट्स, शिप्स, कैरियर एयरक्राफ्ट (INS विक्रमादित्य) और सबमरीन्स भी खरीदता है। दोनों देश मिलकर ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल बना रहे हैं। एक आंकड़े को मुताबिक 1991 से अब तक भारत ने रूस से 70 बिलियन डालर के सैन्‍य उपकरण खरीदे हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि सैन्‍य उपकरण भारत की जरूरत के हिसाब से अमेरिका से काफी सस्‍ते हैं। इन सबके अलावा चीन सीमा विवाद को देखते हुए रूस के साथ भारत की दोस्‍ती काफी खास है। इसका चीन पर मनोवैज्ञानिक दबाव होगा।

क्‍या भारत के साथ एस-500 पर रक्षा डील होगी ?

1- इस यात्रा के दौरान अगर पुतिन और मोदी के बीच एस-500 सुपर एडवांस्ड मिसाइल डिफेंस सिस्टम पर डील करते हैं तो चीन और पाकिस्तान पर भारत लंबी बढ़त हासिल कर लेगा। चीन और पाकिस्‍तान की चिंता की एक बड़ी वजह यह भी है। भारत और रूस भी फिलहाल, इस मामले पर कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं। तीन वर्ष पूर्व एस-400 डील के वक्त भी दोनों देशों का बिल्कुल यही रवैया था।

2- भारत ने 2018 में रुस से एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदने का सौदा किया था। रूस के अलावा यह सिस्टम चीन और तुर्की के पास है। खास बात यह है कि भारत और रूस की एस-400 सौदे पर अमेरिका खिन्‍न है। उसने तुर्की पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए, लेकिन भारत के खिलाफ वो किसी तरह का दबाव नहीं डाल पाया। इसकी वजह यह है कि चीन को काबू में रखने के लिए उसे भारत की जरूरत है और वो भारत का नाराज करने का जोखिम नहीं ले सकता। चीन ने भी भारत को एस-400 मिलने का विरोध किया था। हालांकि, इस मामले में रूस ने साफ कर दिया था कि भारत और रूस के 70 साल पुराने सैन्य रिश्ते हैं, लिहाजा वो S-400 भारत को जरूर देगा।

Edited By: Ramesh Mishra