दुबई, एजेंसियां। पैगंबर के चित्रण और अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाओं को लेकर संघर्ष बढ़ गया है। इस क्रम में पश्चिम एशियाई और अन्य देशों में मुस्लिमों ने फ्रांसीसी वस्तुओं के बहिष्कार का आह्वान किया है। कुवैत में स्टोरों से फ्रांसीसी वस्तुओं को हटा लिया गया। कतर यूनिवर्सिटी ने फ्रांसीसी सांस्कृतिक सप्ताह रद कर दिया और सऊदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात में लोगों से कैरेफोर ग्रोसरी स्टोर चेन से दूर रहने का आह्वान किया गया।

हालांकि बहिष्कार के इन आह्वानों का फिलहाल कोई खास असर नहीं देखा जा रहा है। तुर्की, बांग्लादेश और गाजा पट्टी में विरोध प्रदर्शनों का आयोजन किया गया जबकि पाकिस्तान में इनकी योजना बनाई जा रही है। पाकिस्तान ने फ्रांस के राजदूत को बुलाकर विरोध भी दर्ज कराया।

दरअसल, यह सारा विवाद तब शुरू हुआ था जब कक्षा में पैगंबर का कार्टून दिखाने पर एक कट्टरपंथी ने एक फ्रांसीसी शिक्षक की 16 अक्टूबर को पेरिस के पास सिर काटकर हत्या कर दी थी। इस घटना के बाद फ्रांस के एक शहर की इमारत पर पैगंबर का कार्टून प्रदर्शित किया गया था और देशभर में प्रदर्शनों के दौरान भी उन्हें प्रदर्शित किया गया।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने कहा कि वह फ्रांसीसी मूल्यों को नुकसान पहुंच रही इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा को रोकने के लिए अपने प्रयास दोगुने करेंगे। उनका कहना था कि फ्रांस शांति का भावना के साथ सभी मतभेदों का सम्मान करता है, लेकिन देश कभी हार नहीं मानेगा। इस पर तुर्की के राष्ट्रपति तैयप एर्दोगन ने अपने देशवासियों से फ्रांसीसी सामान नहीं खरीदने का आह्वान किया।

इससे पहले एर्दोगन ने मैक्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी सवाल उठाया था, जवाब में फ्रांस ने अंकारा से अपने राजदूत को वापस बुला लिया। उधर, यूरोपीय यूनियन में फ्रांस के कई साझीदार देशों ने मैक्रों का समर्थन किया। इटली के प्रधानमंत्री ने मैक्रों पर एर्दोगन की टिप्पणी को अस्वीकार्य बताया। वहीं, जर्मनी के विदेश मंत्री ने एर्दोगन के बयान को निचले स्तर का करार दिया।

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