[शाहिद ए चौधरी]। वर्ष 2008 में जब शेख हसीना सत्ता में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के रूप में लौटीं थीं, तो उन्होंने वादा किया था कि वह बांग्लादेश में मौजूद प्रत्येक भारत विरोधी आतंकी मोड्यूल को उखाड़ फेकेंगी और भारत के उत्तर पूर्व क्षेत्र में विद्रोह कम करने में सहयोग करेंगी। टॉप रैंक इंटेलिजेंस अधिकारी इस बात से सहमत हैं कि ढाका में बिना शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग के पूर्व शासन में विद्रोही गुटों को नियंत्रित करना असंभव था। इन अधिकारियों के अनुसार, उन्होंने बांग्लादेश में प्रत्येक ज्ञात पाकिस्तानी एजेंट को उखाड़ फेका। अब एक दशक बाद दोनों देश आतंक को कुचलने के लिए अधिक तीव्रता से रियल-टाइम इंटेलिजेंस एक दूसरे से शेयर कर रहे हैं जिससे भारत को अधिक लाभ हो रहा है।

कल यानी 30 दिसंबर को बांग्लादेश में आम चुनाव होने जा रहे हैं। भारत पड़ोस में निष्पक्ष चुनाव चाहता है। लेकिन उसके लिए यह भी अधिक आवश्यक है कि हसीना सत्ता में लौटें, क्योंकि भारतीय उपमहाद्वीप में अवामी लीग ही उसकी सबसे अच्छी दोस्त है। इसलिए प्रश्न यह है कि क्या चुनाव से स्थितियां बदल जाएंगी? जवाब से पहले यह जानना जरूरी है कि अवामी लीग ने इन गुजरे सालों में क्या किया है? साल 2008 में अवामी लीग की

वापसी से भारत-बांग्लादेश के संबंधों में हर मोर्चे पर नाटकीय परिवर्तन आया। संपर्क के अनेक प्रोजेक्ट जिनके बारे में पहले सोचना भी कठिन था, अब पूरे हो चुके हैं या समझौते की विकसित स्थिति में हैं। नदी पोट्र्स व सड़कों से गुड्स का ट्रांस-शिपमेंट जारी है और अनेक बस व ट्रेन रूट चालू हैं।

कोलकाता से बांग्लादेश होती हुई उत्तर पूर्व क्षेत्र में जाने वाली बस सेवा शुरू हो गई है, जिससे उस क्षेत्र में जाने के लिए समय व दूरी में कमी आई है। पश्चिम बंगाल के उत्तरी इलाके में भूमि सीमा विवाद के साथ लंबे समय से अटका समुद्री सीमा विवाद भी हल हो गया है। साथ ही दोनों तरफ की इस बात में दिलचस्पी नहीं है कि तीस्ता जल-बंटवारे से लेकर अवैध सीमा व्यापार तक जो मतभेद हैं उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाए। पावर और एनर्जी सेक्टर सहयोग भी अन्य द्विपक्षीय उपलब्धियों में से एक है।

बांग्लादेश में स्थिरता बनाए रखने में भारत का सबसे बड़ा योगदान है। भारत ने सुरक्षा सहयोग में योगदान दिया है, ट्रेनिंग से लेकर उन गुटों को नियंत्रित करने में जो क्षेत्र की स्थिरता के लिए खतरा हैं। लगभग दर्जन भर समझौते हुए हैं जिनके तहत बांग्लादेश में 10 बिलियन डॉलर का भारतीय प्राइवेट निवेश हुआ है। बांग्लादेश में इन्फ्रास्ट्रक्चर और अन्य प्रोजेक्ट के लिए 7.5 बिलियन डॉलर की लाइन ऑफ क्रेडिट को मंजूरी दी गई है। लेकिन इसी के साथ भारत की चिंताएं भी हैं और वह दुविधा में भी है। नई दिल्ली बांग्लादेश में ‘फेयर इलेक्शन’ देखना चाहती है, पिछली बार की तरह नहीं जब बिना मुकाबले के अवामी लीग सत्ता में लौटी थी।

भारत को राहत मिली जब अवामी लीग के पूर्व सदस्य और धर्मनिरपेक्ष समझे जाने वाले कमल हुसैन ने बहुदलीय गठबंधन ‘जातीय ओइक्य फ्रंट’ (नेशनल यूनिटी फ्रंट) बनाया जिसमें बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी सबसे बड़ा दल है। हसीना की हुसैन से मुलाकात के बाद चुनाव प्रक्रिया आरंभ हुई। लेकिन चुनाव के करीब आते ही इस फ्रंट के पार्टनर के रूप में जमाअत-ए- इस्लामी (बांग्लादेश) सेंटर स्टेज पर आ गई जिसका कैडर ग्रामीण क्षेत्रों तक फैला हुआ है। जमाअत-ए-इस्लामी पार्टी के रूप में चुनाव नहीं लड़ रही है, क्योंकि 2013 में उसका पंजीकरण रद कर दिया गया था, लेकिन उसने 300 में से 25 सीटों पर अपने सदस्यों को बीएनपी के टिकट पर मैदान में उतारा है।

जमाअत-ए-इस्लामी की सक्रियता भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि उसकी जड़ें पाकिस्तान में हैं, जबकि इस आरोप का वह लगातार खंडन करती है। बीएनपी बांग्लादेश की अन्य प्रमुख पार्टी है जो 2001 में सत्ता में आई थी तो भारत के सत्तारूढ़ कुलीनों ने उससे डील करने का प्रयास किया था, जो असफल रहा। हालांकि अंतरराष्ट्रीय प्रेस का अनुमान है कि बीएनपी-जमाअत-ए- इस्लामी गठबंधन सत्ता में नहीं आएगा, लेकिन यदि वह आ जाता है तो भारत-बांग्लादेश संबंधों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, नई दिल्ली की सबसे बड़ी यही चिंता है। क्या इससे संपर्क प्रोजेक्ट खटाई में पड़ जाएंगे, भारत के उत्तर पूर्व में अस्थिरता का खतरा बढ़ जाएगा या पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेश में जो डॉलरों में निवेश हुआ है उसमें हस्तक्षेप होगा? इन तमाम सवालों के उत्तर चुनाव के बाद ही सार्वजनिक हो सकते हैं।

बहरहाल बांग्लादेश के 11वें संसदीय चुनाव में कांटे की टक्कर होने की संभावना है। जमाअत-ए-इस्लामी के टॉप नेताओं को 1971 के युद्ध अपराधों के लिए फांसी दी गई थी, जिसके लिए उसने हसीना को माफ नहीं किया है और हर कीमत पर अवामी लीग को पराजित करने का प्रण लिया है। जमाअत-एइस्लामी का वोट शेयर लगभग पांच प्रतिशत है और जब यह बीएनपी के निश्चित 30 प्रतिशत वोट शेयर से मिल जाता है तो अवामी लीग के समक्ष मजबूत प्रतिद्वंदी खड़ा हो जाता है, खासकर इसलिए कि इसमें कमल हुसैन के गठबंधन की चार पार्टियां भी शामिल हैं।

हुसैन का जमाअत-ए-इस्लामी व बीएनपी के साथ जाने पर भारत के धर्मनिरपेक्ष व बंगाली राष्ट्रवादियों को बहुत आश्चर्य हुआ है, विशेषकर इसलिए कि उन्होंने अपनी पार्टी के सिंबल उगता सूरज की जगह बीएनपी के सिंबल धान को स्वीकार करके यह संकेत देने का प्रयास किया है कि उनका राजनीतिक उद्देश्य पाकिस्तान समर्थक गठबंधन से भिन्न नहीं है।

हसीना के लिए यह चुनाव उनकी नीतियों व कार्यक्रमों, जो उन्होंने अपने एक दशक के शासन में लागू किए हैं, की कठिन परीक्षा हैं। इसका चुनावी नतीजों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ना चाहिए, लेकिन उन्हें सत्ता विरोधी लहर का सामना भी करना पड़ रहा है, खासकर इसलिए कि उनकी पार्टी के सांसदों व मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। खैर कल यह तय हो जाएगा कि हसीना को लगातार तीसरा टर्म मिलता है या बांग्लादेश ‘परिवर्तन’ के लिए वोट करता है।

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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