अनुपमा सिंह कौन हैं? जिन्होंने यूएन की भरी सभा में पाकिस्तान को कहा भस्मासुर
भारतीय राजनयिक अनुपमा सिंह ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में पाकिस्तान को फ्रेंकस्टीन स्टेट बताते हुए कड़ी फटकार लगाई।
HighLights
अनुपमा सिंह ने पाकिस्तान को फ्रेंकस्टीन स्टेट करार दिया।
पाकिस्तान को अपने ही पाले आतंकवाद का शिकार बताया।
PoJK में मानवाधिकार उल्लंघनों पर ध्यान आकर्षित किया।
डिजिटल डेस्क, जिनेवा। भारतीय राजनयिक अनुपमा सिंह ने संयुक्त राष्ट्र में इस्लामाबाद को कड़ी फटकार लगाते हुए पाकिस्तान को एक चरमराता हुआ फ्रेंकस्टीन स्टेट यानी भस्मासुर जैसी स्थिति वाला देश करार दिया है, जो खुद के ही बनाए हुए आतंकवाद के ढांचे का शिकार हो गया है।
जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 62वें सत्र के दौरान संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की प्रथम सचिव के रूप में कार्यरत सिंह ने शुक्रवार को तीखी टिप्पणी की।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त की वार्षिक रिपोर्ट पर एक इंटरएक्टिव डायलॉग के दौरान भारत के राइट ऑफ रिप्लाई का इस्तेमाल करते हुए, इस युवा राजनयिक ने जम्मू-कश्मीर को लेकर पाकिस्तान और इस्लामिक सहयोग संगठन द्वारा लगाए गए आरोपों की झड़ी को सिरे से खारिज कर दिया।
कौन हैं अनुपमा सिंह?
अनुपमा सिंह एक प्रमुख भारतीय राजनयिक और 2014 बैच की भारतीय विदेश सेवा अधिकारी हैं। वर्तमान में वह संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद और जिनेवा में भारत के स्थायी मिशन में प्रथम सचिव के रूप में कार्यरत हैं। उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंचों, विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान द्वारा फैलाए गए आतंकवाद और कश्मीर के झूठे प्रोपेगैंडा का मुंहतोड़ और बेबाक जवाब देने के लिए जाना जाता है।
उन्होंने मौलाना आजाद नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से कंप्यूटर साइंस में बीटेक और दिल्ली विश्वविद्यालय के FMS से फाइनेंस में एमबीए किया है। IFS में शामिल होने से पहले उन्होंने KPMG में कंसलटेंट के रूप में भी काम किया।
क्या हैं फ्रेंकस्टीन स्टेट का मतलब?
फ्रेंकस्टीन स्टेट ऐसे देश जिसने आतंकवादी समूह या चरमपंथी विचारधारा को पाला-पोसा और शक्तिशाली बनाया, लेकिन बाद में वही तत्व उस देश के नियंत्रण से बाहर हो गया और खुद उसी के अस्तित्व के लिए विनाशकारी खतरा बन गया। भस्मासुर की तरह खूद के वरदान में भस्म हो जाने की तरह है।
दुनिया की सहानुभूति बटोरने का पाखंड
अपने भाषण के सबसे ज्यादा चर्चा में रहे हिस्से में, सिंह ने छद्म आतंकवादी समूहों पर निर्भर रहने के पाकिस्तान के ऐतिहासिक रवैये की कड़ी आलोचना की। उन्होंने दुनिया की सहानुभूति बटोरने की पाकिस्तान की कोशिशों को उसका पाखंड बताया।
सिंह ने कहा कि यह वह देश है जहां के मौजूदा रक्षा मंत्री राज्य की नीति के रूप में आतंकवादियों को पनाह देने, ट्रेनिंग देने और तैनात करने का दावा करते हैं, और फिर भी पाकिस्तान खुद को आतंकवाद का शिकार बताता है। यह वास्तव में एक ऐसा विरोधाभास है जिसे केवल पाकिस्तान ही कायम रख सकता है।
उन्होंने आगे कहा, "यह एक फ्रेंकस्टीन स्टेट का जीता-जागता उदाहरण है, जो तब हैरान रह जाता है जब उसका अपना ही पाला हुआ राक्षस उसे काटने दौड़ता है।"
PoJK में हो रही क्रूर कार्रवाई पर ध्यान खींचना
मानवाधिकारों के मुद्दे पर सिंह ने इस्लामाबाद को ही आईना दिखाया। उन्होंने पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में जारी नागरिक अशांति और कथित राज्य प्रायोजित हिंसा की ओर परिषद का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने विशेष रूप से रावलकोट में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हाल ही में हुई हिंसक कार्रवाई का जिक्र किया।
उन्होंने तर्क दिया, "रावलकोट में चल रही त्रासदी, सैकड़ों नागरिकों की हत्या, और पूरे PoJK में हो रही क्रूर कार्रवाई उस व्यवस्था का अनुमानित परिणाम है जो जबरन कब्जे पर बनी है और दमन के जरिए कायम है।" उन्होंने यह भी कहा कि वहां रोटी, बिजली और सम्मान जैसी बुनियादी मांगों का जवाब "गोलियों और क्रूरता" से दिया जा रहा है।
सिंधु जल संधि को पुराना घोषित करना
सिंह ने सीमा पार आतंकवाद को दोनों देशों के बीच संसाधन बंटवारे से सीधे तौर पर जोड़ा। उन्होंने स्पष्ट किया कि हाल ही में पहलगाम आतंकी हमले जैसी सुरक्षा चुनौतियों के बाद, 66 साल पुरानी सिंधु जल संधि अब वर्तमान वास्तविकताओं के अनुकूल नहीं रह गई है।
नई दिल्ली की स्पष्ट सीमाएं तय करते हुए, सिंह ने अंत में इस मंच को याद दिलाया कि जम्मू-कश्मीर का पूरा क्षेत्र भारत का अभिन्न और अविभाज्य अंग था, है और हमेशा रहेगा।
पाकिस्तान के बार-बार के दखल को मौसमी नौटंकी करार देते हुए, प्रथम सचिव ने पड़ोसी देश से आग्रह किया कि वह भारतीय क्षेत्रों पर अपनी अंधी लालसा को छोड़े और इसके बजाय अपने ही टूटते घर को व्यवस्थित करने पर ध्यान केंद्रित करे।
