47 साल पहले 600 लोगों ने की थी मक्का की घेराबंदी, बदल गई थी सऊदी इतिहास की दिशा
मक्का में हाल ही में हूती ड्रोन को रोके जाने की घटना ने 1979 की ग्रैंड मस्जिद घेराबंदी की याद ...और पढ़ें

जब हुआ था मक्का मस्जिद पर कब्जा। (फाइल फोटो।)
HighLights
हाल ही में मक्का के पास हूती ड्रोन को रोका गया।
1979 में जुहैमान ने ग्रैंड मस्जिद पर कब्जा कर लिया था।
इस घटना ने सऊदी अरब की नीतियों को बदला।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। यमन के हूती विद्रोहियों के हमले में तेजी आने के बाद सऊदी अरब ने मंगलवार (15 सितंबर, 2026) को मक्का में इमरजेंसी अलर्ट जारी किया। इस्लामिक पवित्र शहर के निवासियों को संभावित खतरे के बारे में चेतावनी जारी की गई। हालांकि बाद में इस अलर्ट को हटा लिया गया।
बुधवार को सऊदी अधिकारियों ने बताया कि उनके एयर डिफेंस सिस्टम ने मक्का के दक्षिण में एक हूती ड्रोन को पवित्र शहर के ऊपर प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में घुसने से पहले ही रोककर नष्ट कर दिया। सऊदी अधिकारियों ने दो पवित्र मस्जिदों और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा को अति संवेदनशील बताया। हूती विद्रोहियों ने मक्का को निशाना बनाने की बात से इनकार किया है।
घटनाक्रम ने याद दिलाया 47 साल पहले का एपिसोड
यह घटना एक ऐसी बात की याद दिलाती है जो कभी लगभग अकल्पनीय लगती थी। मक्का की पवित्रता ने हमेशा उसे राजनीतिक हिंसा की पहुंच से दूर नहीं रखा है। लगभग 47 साल पहले 20 नवंबर 1979 को आधुनिक सऊदी इतिहास की सबसे असाधारण घटना घटी। एक हथियारबंद समूह ने इस मस्जिद पर कब्जा कर लिया था।
यह घटना काबा के आस-पास बनी मस्जिद अल-हरम में फज्र (सुबह) की नमाज के ठीक बाद की है। सुबह की नमाज के लिए हजारों नमाजी जमा हुए थे तभी वहां अफरा-तफरी मच गई। सऊदी नेशनल गार्ड के 40 साल के पूर्व कॉर्पोरल और धार्मिक उपदेशक जुहैमान अल-उतैबी ने इमाम को एक तरफ धकेल दिया और माइक अपने हाथ में ले लिया। वहां मौजूद ज्यादातर नमाजियों को पता ही नहीं था कि क्या हो रहा है।

जुहैमान और उसके लगभग 600 साथी तेजी से मस्जिद के विशाल परिसर में फैल गए। उन्होंने मस्जिद में ताबूत पहुंचाए। ऊपर से तो ऐसा लग रहा था कि ये मृतकों के लिए दुआ मांगने की पारंपरिक अंतिम संस्कार की रस्म का हिस्सा हैं लेकिन जब ताबूत खोले गए तो उनमें हथियार निकले, जिन्हें उग्रवादियों में बांट दिया गया।
'महदी आ गए हैं'
ग्रैंड मस्जिद पर कब्जा कर लिया गया था। बागी गुट के एक सदस्य ने पहले से तैयार एक बयान पढ़ना शुरू किया। महदी के आगमन की घोषणा की गई, वह ईश्वरीय मार्गदर्शन प्राप्त व्यक्ति जिसके आने की भविष्यवाणी इस्लामी परंपरा में की गई है। घोषणा की गई, "महदी आ गए हैं।"
बागियों ने जुहयमान के बहनोई मोहम्मद अब्दुल्ला अल-कहतानी को महदी बताया। हदीसों में, यानी पैगंबर मोहम्मद की कही या मंजूर की गई बातों में महदी (यानी ईश्वर द्वारा निर्देशित व्यक्ति) के आने की भविष्यवाणी की गई है।
बगावत की वजह क्या थी?
यह विद्रोह सऊदी अरब में हो रहे बड़े बदलावों के दौर में हुआ। तेल से मिली दौलत ने देश की कायापलट कर दी थी, जिससे तेजी से आधुनिकीकरण हुआ, नया इंफ्रास्ट्रक्चर बना और पश्चिमी देशों का प्रभाव बढ़ा। जुहैमान और उनके साथियों ने सऊदी राजशाही के इस्लामी सिद्धांतों को छोड़ने के तौर-तरीकों का विरोध किया और हाउस ऑफ सऊद पर भ्रष्टाचार और धार्मिक रास्ते से भटकने का आरोप लगाया।
उनके बयानों और बाद के विवरणों के अनुसार, उनका मकसद सऊदी राजशाही को चुनौती देना और उस व्यवस्था को फिर से लागू करना था जिसे वे ज्यादा शुद्ध इस्लामी व्यवस्था मानते थे। सऊदी अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं लगी।
काबा को आजाद कराने की लड़ाई
ग्रैंड मस्जिद पर हथियारों के दम पर कब्जा करने का विचार लगभग अकल्पनीय था। पवित्र स्थल के भीतर हथियार ले जाना मना था और परिसर के अंदर तैनात सुरक्षाकर्मियों के पास हल्के हथियार ही थे।
उग्रवादियों ने तेजी से मस्जिद की मीनारों, कमरों, गलियारों और जमीन के नीचे के हिस्सों जैसी अहम जगहों पर कब्जा कर लिया था। इन जगहों से वे सऊदी सुरक्षा बलों की उस पहली कोशिश को नाकाम करने में कामयाब रहे, जिसमें वे कॉम्प्लेक्स को वापस अपने कब्जे में लेना चाहते थे। मस्जिद के चारों ओर सुरक्षा घेरा बना दिया गया। स्पेशल फोर्स और सेना की टुकड़ियों को वहां बुलाया गया।
सऊदी ने जारी किया धार्मिक आदेश
लेकिन एक बड़ी बाधा थी यह थी कि इस्लामिक कानून मक्का के पवित्र इलाके में लड़ाई करने पर खास रोक लगाता है। आखिरकार, सऊदी अरब के वरिष्ठ धार्मिक अधिकारियों ने चरमपंथियों को खदेड़ने के लिए बल प्रयोग की इजाजत देने वाला एक धार्मिक आदेश जारी किया।

इसके बाद लड़ाई और तेज हो गई। सऊदी सेना ने लड़ते हुए मस्जिद परिसर में प्रवेश किया और धीरे-धीरे इसके हिस्सों पर दोबारा कब्जा कर लिया लेकिन विद्रोही मस्जिद के नीचे बने कमरों, कोठरियों और भूमिगत रास्तों के एक बड़े नेटवर्क में पीछे हट गए।
बेसमेंट में छोड़ी गई गैस
घेराबंदी लगभग दो हफ्ते तक चली। आखिरकार सऊदी अरब ने बाहरी मदद मांगी। फ्रांस ने चुपचाप विशेषज्ञों की एक छोटी टीम भेजी ताकि जमीन के नीचे के इलाकों को खाली कराने की योजना बनाई जा सके। आखिरी हमले में उन बेसमेंट इलाकों में गैस छोड़ी गई जहां बचे हुए विद्रोही छिपे हुए थे। जमीन के नीचे बने कॉम्प्लेक्स में छेद किए गए और उनके जरिए गैस अंदर भेजी गई।
इस ऑपरेशन से आखिरकार उनका प्रतिरोध टूट गया। 5 दिसंबर 1979 की सुबह तक जुहैमान और बाकी बचे बागियों ने सरेंडर कर दिया। जिस फोर्स में शुरुआत में लगभग 600 लोग थे उसमें अब 100 से कुछ ज्यादा लोग ही बचे थे।
जुहैमान को मिली मौत की सजा
जुहैमान को जिंदा पकड़ लिया गया। 9 जनवरी 1980 को उन्हें और 62 अन्य पकड़े गए बागियों को मक्का और मदीना समेत सऊदी अरब के कई शहरों में सबके सामने मौत की सजा दी गई। ये सजाएं सऊदी अरब के अलग-अलग हिस्सों में एक साथ दी गईं और यह देश के आधुनिक इतिहास में सबसे बड़ी सामूहिक फांसी की घटना बन गई।
घेराबंदी के बाद क्या हुआ?
घेराबंदी के नतीजे बागियों के अंजाम से कहीं ज्यादा दूर तक फैले हुए थे। इस विशाल मस्जिद पर कब्जे ने सऊदी राजशाही की वैधता के सामने देश के अपने ही धार्मिक माहौल से एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी।
क्राउन प्रिंस फहद ने इसके जवाब में देश को और ज्यादा रूढ़िवादी धार्मिक नीतियों की ओर बढ़ाया। सरकार ने धार्मिक नियमों को सख्ती से लागू करना शुरू किया और इस आरोप का जवाब देने की कोशिश की कि सऊदी राज्य इस्लामी कानून से दूर हो गया है।
कई दशकों तक 1979 के विद्रोह के सामाजिक और धार्मिक नतीजों ने सऊदी अरब में रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित किया। यह स्थिति हाल के वर्षों में खासकर क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के नेतृत्व में बदलने लगी, जब देश ने सामाजिक और आर्थिक सुधारों का कार्यक्रम शुरू किया।

और अब, जुहैमान के लोगों द्वारा ग्रैंड मस्जिद को युद्ध का मैदान बनाने के लगभग आधी सदी बाद यह पवित्र शहर एक बार फिर सुरक्षा संकट के केंद्र में है। हालात बिल्कुल अलग हैं। 1979 में हुई घेराबंदी एक अंदरूनी सशस्त्र विद्रोह था जो दो हफ्ते तक चला और जिसमें चरमपंथियों ने इस्लाम की सबसे पवित्र मस्जिद पर कब्जा कर लिया था।
ताजा घटना एक क्षेत्रीय संघर्ष और हवाई खतरे से जुड़ी है। सऊदी अरब का कहना है कि मक्का पहुंचने से पहले ही इस खतरे को रोक दिया गया था। लेकिन संवेदनशीलता अब भी वैसी ही है। सऊदी अरब और दुनिया भर के मुसलमानों के लिए मक्का सिर्फ एक शहर नहीं है। यहां काबा है और ग्रैंड मस्जिद भी यहीं है। यह एक ऐसी पवित्र जगह है जिसकी सुरक्षा का महत्व सऊदी अरब की सीमाओं से कहीं ज्यादा है।
