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इजरायल चुनाव: क्या नेतन्याहू सुरक्षा मोर्चे पर मिली सफलताओं को राजनीतिक जीत में बदल पाएंगे?

Published: Sun, 25 Oct 2026 07:46 PM (IST)

7 अक्टूबर के हमले और ईरान संघर्ष के बाद बेंजामिन नेतन्याहू इजरायल के आम चुनाव में एक बड़ी चुनावी परीक्षा का सामना कर रहे हैं।

क्या नेतन्याहू सुरक्षा मोर्चे पर मिली सफलताओं को राजनीतिक जीत में बदल पाएंगे।

क्या नेतन्याहू सुरक्षा मोर्चे पर मिली सफलताओं को राजनीतिक जीत में बदल पाएंगे।

HighLights

  1. नेतन्याहू 7 अक्टूबर के बाद अहम चुनावी परीक्षा में।

  2. गादी आइसेनकोट नेतन्याहू के लिए कड़ी चुनौती बने।

  3. ईरान संघर्ष और सुरक्षा प्रमुख चुनावी मुद्दे।

डिजिटल डेस्क, तेल अवीव। 7 अक्टूबर, 2023 के हमले के तीन साल बाद, बेंजामिन नेतन्याहू सुरक्षा, राजनीतिक जवाबदेही और इजरायल की दिशा को लेकर एक अहम चुनावी परीक्षा का सामना कर रहे हैं। डोनल्ड ट्रंप के समर्थन और ईरान के साथ अनसुलझे टकराव ने दांव को और बढ़ा दिया है, लेकिन बंटा हुआ विपक्ष अपनी चुनौती को सत्ता में बदलने के लिए संघर्ष कर सकता है।

7 अक्टूबर 2023 को हमास से आतंकवादी हमले के बाद, इजरायल में मंगलवार, 27 अक्टूबर को पहला आम चुनाव हो रहा है। इसके नतीजे तय कर सकते हैं कि इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे नेतन्याहू अपने राजनीतिक करियर को आगे बढ़ा पाएंगे या फिर तीन साल युद्ध और आंतरिक उथल-पुथल के बाद उन्हें सत्ता गंवानी पड़ेगी।

ओपिनियन पोल में कड़े मुकाबले के आसार

हालांकि, ओपिनियन पोल एक कड़े मुकाबले की ओर इशारा कर रहे हैं। शुक्रवार को इजरायल के तीन प्रमुख टीवी नेटवर्कों द्वारा जारी सर्वे में, गादी आइसेनकोट की 'यशार' पार्टी को नेतन्याहू की 'लिकुड' पार्टी से आगे दिखाया गया है। हालांकि, न तो प्रधानमंत्री के गठबंधन को और न ही मुख्य विपक्षी गुट को 120 सदस्यों वाली संसद में बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटें मिलती दिख रही हैं।

अनुमान के मुताबिक, यशार को लगभग 22-23 सीटें मिल सकती हैं, जबकि, लिकुड को 19-21 सीटें मिलने की संभावना है। नेतन्याहू के गठबंधन को करीब 50 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि मुख्य विपक्षी गुट को 52-56 सीटें मिल सकती हैं। अरब नेतृत्व वाली पार्टियां 14-16 सीट जीत सकती हैं। ये केवल अनुमान हैं, नतीजे नहीं। लेकिन ये चुनाव के सबसे अहम सवाल की ओर इशारा करते हैं कि क्या नेतन्याहू अपने नेतृत्व पर आने वाले इस फैसले में टिक पाएंगे और क्या उनके विरोधी किसी विकल्प पर सहमत हो पाएंगे।

नेतन्याहू को चुनौती दे रहे गादी अइसेनकोट

इजरायल डिफेंस फोर्सेज (IDF) के पूर्व प्रमुख, गादी आइसेनकोट, नेतन्याहू के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरे हैं। उन्होंने 2015 से 2019 तक सैन्य प्रमुख के रूप में काम किया और 7 अक्टूबर के हमले के बाद बनी युद्धकालीन सरकार में शामिल हुए। जून 2024 में उन्होंने सरकार छोड़ दी। उनका तर्क था कि युद्ध से जुड़े फैसलों पर राजनीतिक स्वार्थों का असर पड़ रहा था। बाद में उन्होंने बेनी गैंट्ज से नाता तोड़ लिया और सितंबर 2025 में 'यशार' की स्थापना की।

आइसेनकोट की अपील उनके सैन्य अनुभव, बेहतर जवाबदेही और इस तर्क पर टिकी है कि इजरायल को अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं से समझौता किए बिना नेतृत्व में बदलाव की जरूरत है।

वे कोई पारंपरिक वामपंथी चुनौती देने वाले नेता नहीं हैं। उनकी आलोचना मुख्य रूप से नेतन्याहू द्वारा युद्ध को संभालने के तरीके, 7 अक्टूबर से पहले की विफलताओं और सरकार के घरेलू एजेंडे पर केंद्रित है। विपक्ष के कई अन्य नेताओं की तरह, वे भी हमास के प्रति सख्त रुख अपनाते हैं और उनका तर्क है कि इजरायल को अधिक प्रभावी सुरक्षा नेतृत्व की आवश्यकता है।

यह अंतर महत्वपूर्ण है। यह चुनाव केवल 'कठोर' और 'नरम' दृष्टिकोणों के बीच की सीधी लड़ाई नहीं है। नेतन्याहू के कई विरोधियों का तर्क है कि उनके फैसलों ने इजरायल की सुरक्षा को मजबूत करने के बजाय उसे कमजोर किया है।

ईरान युद्ध: सुरक्षा के लिए फायदेमंद या राजनीतिक बोझ?

सुरक्षा, नेतन्याहू के चुनाव प्रचार का मुख्य मुद्दा है और ईरान के मामले में यह सबसे अहम हो गया है। 28 फरवरी को इजरायल और अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया, जिसमें उसके परमाणु और सैन्य बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया गया। यह संघर्ष एक क्षेत्रीय टकराव में बदल गया था, लेकिन जून में पाकिस्तान की मध्यस्थता से एक युद्धविराम समझौता हुआ और दोनों पक्षों के बीच एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए गए।

इस विराम से मूल विवाद हल नहीं हुए हैं। ईरान का परमाणु कार्यक्रम, उस पर लगे प्रतिबंध और होर्मुज जलडमरूमध्य अभी भी तनाव के कारण बने हुए हैं। इसके अलावा, ईरानी बंदरगाहों पर दबाव और क्षेत्र में लगातार बनी अनिश्चितता के कारण फिर से लड़ाई छिड़ने का खतरा बना हुआ है।

सैन्य सफलताओं को राजनीतिक सफलता में बदल पाएंगे नेतन्याहू?

नेतन्याहू ने ईरान के खिलाफ इस अभियान को एक रणनीतिक उपलब्धि के रूप में पेश किया है। उनका तर्क है कि सैन्य कार्रवाई ने इजरायल के लिए एक बड़े खतरे को कमजोर कर दिया है। उनका मानना है कि तेहरान को अपनी क्षमताओं को फिर से बनाने या परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए आगे और भी कार्रवाई करनी पड़ सकती है।

ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि 27 अक्टूबर को होने वाले आम चुनाव में नेतन्याहू अपनी सैन्य सफलताओं को सियासी जीत में तब्दील कर पाते हैं या नहीं। अगर ऐसा होता है तो वो अपने अभियान को उसी तरह आगे बढ़ाएंगे और उन्हें चुनावों में हार मिलती है तो नए प्रधानमंत्री इजरायल को नई तरह से आगे बढ़ाएंगे।

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