क्या ठप हो रहा है मिडिल ईस्ट का व्यापार, कैसे बिगड़ा तेल का खेल? Inside Story
मिडिल ईस्ट में अमेरिका-इजरायल-ईरान और हूती-सऊदी संघर्ष से तनाव गहरा गया है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर गंभीर असर पड़ रहा है।

मिडिल ईस्ट में तेल व्यापार के भविष्य पर मंडरा रहा खतरा (जागरण)
HighLights
मध्य पूर्व में अमेरिका-ईरान और हूती-सऊदी संघर्ष से तनाव बढ़ा।
होर्मुज और लाल सागर जैसे महत्वपूर्ण जलमार्गों पर खतरा।
वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित, कच्चे तेल की कीमतें प्रति बैरल 100 डॉलर पार।
डिजिटल डेस्क, तेहरान। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के बाद से ही मिडिल ईस्ट में तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। ये युद्ध अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि हूती और सऊदी अरब के बीच छिड़ी जंग ने पूरी दुनिया के लिए नई चिंता पैदा कर दी है।
अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध की वजह से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पहले से बंद था। होर्मुज वह जलमार्ग है, जहां से दुनिया में सप्लाई होने वाला करीब 20 फीसदी तेल गुजरता था, लेकिन मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध की वजह से इस जलमार्ग से तेल की आवाजाही पर असर पड़ा है।
होर्मुज के अलावा जहाजों के लिए लाल सागर (रेड सी) एक विकल्प के तौर पर बना हुआ था। होर्मुज से गुजरने वाले कुछ जहाज इस रास्ते से गुजरने लगे थे, लेकिन सऊदी अरब और हूतियों के बीच शुरू हुए युद्ध ने मिडिल ईस्ट के तेल को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
मिडिल ईस्ट में जारी इस भारी तनाव की वजह से तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। तेल-गैस की सप्लाई का असर दुनिया पर पड़ रहा है। कई देशों में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं।
कैसे शुरू हुई सऊदी अरब और हूतियों के बीच लड़ाई?
हूती और सऊदी अरब के सैन्य गठबंधन के बीच एक दशक से तनाव बना हुआ है। हालांकि 2022 में यूनाइटेड नेशन्स (UN) की मध्यस्थता के बाद दोनों के बीच समझौता हुआ और हमले रुके।
वहीं पिछले हफ्ते यमन के हूती विद्रोहियों ने पिछले हफ्ते देश के रेड सी (लाल सागर) तट के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया। हूती विद्रोहियों के ऐसा करने से इस अहम समुद्री रास्ते पर जहाजों की सुरक्षा को लेकर खतरा पैदा हो गया।
हूती ने पहले ही इस इलाके में सऊदी जहाजों की नाकेबंदी का एलान कर दिया था। आने वाले समय में वे इसे सख्ती से लागू कर सकते हैं। तट के किनारे उनकी मौजूदगी ही शिपिंग कंपनियों को डरा देगी, जिससे इंश्योरेंस की लागत बढ़ सकती है।

रेड सी पाइपलाइन पर हूती विद्रोहियों का कब्जा
ईरान-अमेरिका के बीच युद्ध को चलते हुए छह महीने से ज्यादा का समय हो गया है और तब से ही होर्मुज में दोनों देशों की सेनाओं ने नाकेबंदी की हुई है।
अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध के चलते सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पूरी क्षमता से काम कर रही थी और प्रायद्वीप के आर-पार रेड सी के यानबू बंदरगाह तक रोजाना लगभग 7 मिलियन बैरल तेल पहुंचा रही थी।
सऊदी अरब की ये पाइपलाइन ग्लोबल एनर्जी ट्रेड के लिए एक अहम लाइफलाइन थी, लेकिन पिछले हफ्ते इस ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर ड्रोन से हमला हुआ और इस हमले का आरोप इराक में ईरान-समर्थित शिया मिलिशिया पर लगा। यह हमला रेड सी तट पर हूती विद्रोहियों के आगे बढ़ने के साथ ही हुआ।
सऊदी ने हूती विद्रोहियों पर किया हमला
मिडिल ईस्ट में छिड़े युद्ध के बीच सऊदी और हूती विद्रोहियों के बीच लड़ाई कोई इत्तेफाक नहीं है। इस युद्ध की शुरुआत ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के राजकीय अंतिम संस्कार के बाद ही हो गई थी।
असल में, जब ईरान युद्ध शुरू हुआ, तो इस इलाके में ईरान के प्रॉक्सी (समर्थक गुटों) में से हूती गुट ने खुद को युद्ध से दूर रखा था। जुलाई में, ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए हूती प्रतिनिधिमंडल ईरान आया है।
हूती के इस प्रतिनिधिमंडल को जब एक ईरानी विमान वापस यमन छोड़ने जा रहा था, तब सऊदी अरब ने धमकी दी, क्योंकि वो नहीं चाहता थे कि ये विमान हूती विद्रोहियों को लेकर उतरे।
सऊदी अरब ने यमन की राजधानी सना के हवाई अड्डे पर बमबारी की, जिस पर हूती विद्रोहियों का कंट्रोल माना जाता है। सऊदी अरब के हमले के बाद भी ईरान का वह विमान आखिरकार उतर ही गया।
हूती विद्रोहियों का मक्का पर हमला
हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब को इस हमले का जवाब दिया। खबरों के मुताबिक, उन्होंने इस सप्ताह की शुरुआत में मक्का पर एक ड्रोन दागा था। वहीं हूती विद्रोहियों ने ऐसे किसी हमले की जिम्मेदारी नहीं ली और इस आरोप को भी खारिज किया था।
इस्लामिक पवित्र शहर के इतिहास में पहली बार, सऊदी अरब के सिविल डिफेंस ने मक्का में हवाई हमले के खतरे को देखते हुए इमरजेंसी अलर्ट जारी किया।
अलर्ट में लोगों को सलाह दी गई कि वे सुरक्षित जगहों पर घर के अंदर चले जाएं और खतरा टलने तक खिड़कियों और दरवाजों से दूर रहें।
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अमेरिकी नाकेबंदी से ईरान पर दबाव
सऊदी अरब के एयरपोर्ट पर बमबारी करने के बाद हूती गुट के बयानों में तेजी आ गई। हूती ने जवाबी कार्रवाई भी की, लेकिन इस जवावी कार्रवाई के लिए एक और वजह थी, वह है फारस की खाड़ी में ईरानी बंदरगाहों और शिपिंग की अमेरिकी नाकेबंदी।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, होर्मुज में अमेरिकी सेना की नाकेबंदी असरदार साबित हो रही है और ईरानी अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डाल रही है। यह एक ऐसी रणनीति है जो अमेरिका की ताकत के अनुकूल है।
तेहरान अपना तेल बाहर नहीं भेज पा रहा है, ईरानी रियाल की कीमत बहुत गिर गई है और ईरानी लोग नकद पैसे के बजाय अंडे जमा करने लगे हैं। अमेरिका, ईरान के खिलाफ ये नाकेबंदी कहीं अधिक समय तक बनाए रखने में सक्षम है।
साथ-साथ लड़ेंगे ईरान और हूती
देखा जाए तो इस युद्ध में ईरान और हूती साथ-साथ खड़े नजर आ रहे हैं। हूती गुट की कार्रवाई के जरिए ईरान यह संदेश दे रहा है कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल नहीं गुजर सकता, तो होर्मुज के अलावा और भी ऑप्शन होगा, उसे भी बंद कर दिया जाएगा।
लाल सागर पर हूती विद्रोहियों का कब्जा ईरान की इसी मंशा का उदाहरण नजर आ रहा है। कहा जाए तो जब तक युद्ध का समाधान नहीं हो जाता, तब तक इस क्षेत्र में ऊर्जा व्यापार पूरी तरह ठप रहेगा।
हूती गुट की सीधी लड़ाई सऊदी अरब से है, जिसके खिलाफ वे 2015 से लड़ रहे हैं। लेकिन जाहिर है, ईरान के 'एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस' (प्रतिरोध धुरी) के सदस्य के तौर पर, उन्हें अब तेहरान से साजो-सामान और खुफिया जानकारी के मामले में भारी समर्थन मिल रहा है।
ईरान के लिए भी हूती इसलिए जरूरी है, क्योंकि मिडिल ईस्ट युद्ध में ईरान के दो और प्रॉक्सी हिज्बुल्लाह और हमास को भारी नुकसान उठाना पड़ा है।
ऐसा लग रहा है कि ईरानी धुरी में बदलाव हो रहा है, जिसमें हूती और इराक में ईरान-समर्थित मिलिशिया प्रॉक्सी के बीच अधिक प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं।
सऊदी अरब ही बढ़ी मुश्किलें
सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच छिड़े युद्ध में अमेरिका ने सीधे दखल देने से मना कर दिया है। अमेरिका, सऊदी को डिप्लोमैटिक मदद तो दे रहा है, लेकिन इसके अलावा ज्यादा कुछ नहीं।
सऊदी अरब मिसाइल और ड्रोन इंटरसेप्टर चाहता है, लेकिन ईरान के साथ चल रहे युद्ध की वजह से अमेरिका के पास इनका स्टॉक कम हो गया है।
सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने मिस्र और यूके से भी मदद मांगी है, लेकिन कोई भी रियाद को तुरंत मिलिट्री मदद नहीं भेज रहा है। यहां तक कि सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान के बीच हाल ही में हुए मक्का समझौते पर भी अभी तक कोई काम शुरू नहीं हुआ है।

मिडिल ईस्ट में चल रहा तनाव किस ओर जा रहा है?
मिडिल ईस्ट में छिड़ी जंग को एक व्यापक दृष्टिकोण से देखें तो सभी देश अपनी ताकत और जलमार्ग पर अपना आधिकार साबित करने में लगे हैं।
हूती विद्रोहियों के एक्शन से यह साबित होता है कि ईरान का 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' (प्रतिरोध का धुरी) अपना रूप बदल रहा है, जिसमें यमनी मिलिशिया मुख्य भूमिका निभा रही है। इसका असर ईरान युद्ध और रेड सी (लाल सागर) व हॉर्न ऑफ अफ्रीका इलाके की सुरक्षा पर पड़ेगा।
ऊर्जा बाजार के लिए होर्मुज के अलावा दूसरे रास्ते चाहे समुद्र के जरिए हों या पाइपलाइन के जरिए, ये जलमार्ग भी अब पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। इलाके में ईरान समर्थित कई मिलिशिया गुट उन्हें निशाना बना सकते हैं।
इस युद्ध की वजह से ग्लोबल एनर्जी सप्लाई में वेस्ट एशिया के दबदबे पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं और शायद अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस इलाके से हटकर दूसरे विकल्पों पर विचार करना पड़ सकता है।
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