ईरान ने सस्ते ड्रोन-मिसाइल से US-इजरायल की महंगी सैन्य ताकत को दी चुनौती, जल्द युद्ध खत्म होने की उम्मीद टूटी
मध्य पूर्व में अमेरिका और इजरायल के खिलाफ ईरान का युद्ध लंबा और जटिल होता जा रहा है। ईरान सस्ते ...और पढ़ें

ईरान ने सस्ते ड्रोन-मिसाइल से US-इजरायल किया पलटवार। (रॉयटर्स)

समय कम है?
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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में युद्ध अब लंबा और जटिल होता जा रहा है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के साझा ऑपरेशन के तहत ईरान के सैन्य ठिकानों और नेतृत्व को निशाना बनाते हुए बड़े पैमाने पर हमले शुरु किए गए। शुरुआती हमलों में कई सीनियर ईरानी कमांडरों के मारे जाने की खबरें आईं, बावजूद इसके एक सप्ताह बीतने के बाद भी युद्ध समाप्त होने के बजाय और भीषण हो गया है।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने अमेरिका और इजरायल के खिलाफ इस युद्ध मे कम लागत की अधिक मारक क्षमता वाली रणनीति अपनाई है।
ईरान बड़े पैमाने पर सस्ते ड्रोन और मिसाइलों के जरिए हमले कर रहा है, जबकि अमेरिका और इजराइल को उन्हें रोकने के लिए बेहद महंगी एयर-डिफेंस मिसाइलें इस्तेमाल करनी पड़ रही हैं। इससे उनकी रक्षा प्रणाली पर भारी दबाव पड़ रहा है और हथियारों के भंडार पर भी असर पड़ने लगा है।
रडार और एयर डिफेंस पर हमले
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने अमेरिका और उसके सहयोगियों की मिसाइल रक्षा प्रणाली को कमजोर करने के लिए रडार और संचार केंद्रों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। कतर, जॉर्डन, यूएई और बहरीन में कई रडार ठिकानों को ड्रोन हमलों से नुकसान पहुंचाया है, जिससे क्षेत्रीय रक्षा नेटवर्क प्रभावित हुआ है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह युद्ध अब 'वॉर ऑफ एट्रिशन' यानी थकावट की लड़ाई में बदल सकता है। इसमें जीत उस पक्ष की हो सकती है जिसके पास ज्यादा समय तक हथियार और संसाधन बने रहें। लगातार ड्रोन और मिसाइल हमलों से पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ गया है।
प्रेशर में झुकेंगे नहीं- ईरान
ईरान के राष्ट्रपति ने साफ किया है कि उनका देश अमेरिका या इजरायल के दबाव में झुकने वाला नहीं है। हालांकि उन्होंने पड़ोसी खाड़ी देशों पर हुए हमलों के लिए खेद भी जताया और कहा कि यदि उकसाया नहीं गया तो ईरान क्षेत्रीय देशों पर हमले रोक सकता है।
फिलहाल, मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध आधुनिक सैन्य रणनीति का नया उदाहरण बन गया है, जहां सस्ते ड्रोन और मिसाइलें अरबों डॉलर के डिफेंस सिस्टम को चुनौती दे रही हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि यदि युद्ध जल्दी खत्म नहीं हुआ तो इसका असर ऊर्जा बाजार और वैश्विक सुरक्षा पर भी बहुत जल्द दिखने लगेगा।
