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सालों तक हूती को यमन की समस्या मानता रहा था सऊदी, आज उन्हीं के दरवाजे तक पहुंच गई चिंगारी

Published: Wed, 16 Sep 2026 04:21 PM (IST)

सऊदी अरब ने मक्का के पास यमन के हुती विद्रोहियों के एक ड्रोन को मार गिराया, जिससे दोनों के बीच ...और पढ़ें

HighLights

  1. सऊदी अरब ने मक्का के पास हुती ड्रोन मार गिराया।

  2. हुती विद्रोहियों का ईरान के समर्थन से प्रभाव बढ़ा।

  3. यमन संघर्ष अब सऊदी अरब की सीमा तक पहुँच गया।

डिजिटल डेस्क, रियाद। मंगलवार को सऊदी अरब ने मक्का शहर के पास पहुंचने से पहले ही यमन के हुती विद्रोहियों के एक ड्रोन को हवा में ही गिरा दिया। मक्का इस्लाम का सबसे पवित्र स्थल है। अगर यह हमला कामयाब हो जाता, तो हालात इतने बिगड़ जाते कि पूरी दुनिया इस जंग में कूद सकती थी।

काफी सालों से चल रहा सऊदी अरब के साथ हुतियों का झगड़ा

सऊदी अरब के साथ हुतियों का झगड़ा हाल के सालों में बढ़ा है लेकिन इसकी शुरुआत 1990 के दशक में हुई थी। इसके संस्थापक, हुसैन अल-हुती ने सरकार के खिलाफ कई प्रदर्शन शुरू किए और बड़ी संख्या में हथियार बंद समर्थकों को इकट्ठा करना शुरू किया। उनकी पूरी लड़ाकू सेना उत्तरी यमन के सादा इलाके से आई थी।

काफी बाद में शुरू हुआ और असल लड़ाई इस पूरे संघर्ष के काफी बाद के दौर में शुरू हुई। इसकी शुरुआत 1990 के दशक में उत्तरी यमन के पहाड़ों में, सऊदी सीमा के पास एक छोटे से विद्रोह के तौर पर हुई थी, जिसे धर्म और राजनीति मुख्य वजह थी।

इसके संस्थापक, हुसैन अल-हुती ने सरकार विरोधी कई प्रदर्शनों का नेतृत्व करने के बाद बड़ी संख्या में हथियारबंद समर्थकों को इकट्ठा करना शुरू किया। उनकी पूरी लड़ाकू सेना उत्तरी यमन के सादा इलाके से आई थी

यमन के अंदरूनी लड़ाई की शुरुआत

2004 में यमन की सरकारी सेना ने हुसैन अल-हुती के खिलाफ ऑपरेशन शुरू किया और उन्हें मार डाला। लेकिन इससे आंदोलन खत्म नहीं हुआ बल्कि उनके लिए हुसैन अल-हुती हीरो बन गया।

हुसैन अल-हुती की मौत के बाद उनके भाई अब्दुल मलिक अल-हुती ने हुती मिलिशिया की कमान संभाली।उन्होंने 2004 और 2010 के बीच यमन सरकार के साथ 6 युद्ध लड़े, जिन्हें सादा युद्ध कहा जाता है। इनमें से ज्यादातर लड़ाई देश के उत्तरी इलाकों में हुई।

सऊदी अरब और ईरान की एंट्री

सऊदी अरब पहले इसे यमन का अंदरूनी मामला मानता था। लेकिन 2009 में हुती लड़ाकों ने सऊदी सीमा में घुसकर हमला किया, जिसके जवाब में सऊदी एयरफोर्स ने उन पर बमबारी की। हुती लड़ाके ईरान से ट्रेनिंग और आधुनिक हथियार जैसे मिसाइलें और ड्रोन हासिल करने लगे। 

साल 2014 में हुतियों ने यमन की राजधानी 'सना' पर कब्जा कर लिया और नतीजन सभी सरकारी संस्थान गिर गए और तत्कालीन राष्ट्रपति अब्द रब्बू मंसूर हादी साल 2015 में यमन से भाग गए और सऊदी अरब पहुंच गए। और इधर यमन में हुति जो एक छोटे विद्रोही गुट के तौर पर शुरू हुए थे वो अब राजधानी और यमन के उत्तरी इलाकों के बड़े हिस्सों के असल शासक बन गए।

सऊदी अरब का बड़ा सैन्य अभियान

यमन में हुए इस घटनाक्रम के बाद सऊदी नेताओं को डर था कि सत्ता का संतुलन उसी तरह से बदल सकता है जैसे लेबनान, इराक और सीरिया में सहयोगी गुटों के जरिए ईरान के प्रभाव से हुआ था। लेकिन सऊदी अरब को डर था कि ईरान हुतियों के जरिये उसकी सीमा पर कब्जा कर लेगा।

साल 2015 में सऊदी अरब ने अन्य अरब देशों के साथ मिलकर यमन के निर्वासित राष्ट्रपति की सरकार को बहाल करने के लिए बड़े पैमाने पर हमला शुरू किया था। तब से ही गतिरोध की स्थिति बनी हुई है। इस दौरान, UAE, अमेरिका, ब्रिटेन और इज़राइल समेत कई देशों ने हूती लड़ाकों के खिलाफ हवाई हमले किए, लेकिन वे और मज़बूत होते गए।

हालात अब ऐसे हो गए कि ईरान समर्थित हूती लड़ाके समुद्र के एक अहम और संकरे रास्ते के करीब पहुँच रहे हैं और सऊदी अरब की तेल सुविधाओं पर हमले कर रहे हैं।

हुतियों की बढ़ती ताकत और आज के हालात

2015 में हुती दुनिया का पहला ऐसा गैर सरकारी विद्रोह गुट बना, जिसने बैलिस्टिक मिसाइल का इस्तेमाल किया। अमेरिका, ब्रिटेन, UAE और इजराइल के हवाई हमालों के बाद भी हूती कमजोर नहीं हुए बल्कि और मजबूत होते गए।

समुद्री रास्तों पर बड़ा खतरा

हुती अब लाल सागर के एक बेहद महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्ग बाब अल- मंदेब की तरफ बढ़ रहे हैं और सऊदी अरब के तेल ठिकानों और इजराइल तक मिसाइलें दागने में सक्षम है।

क्या है हालिया स्थिति?

सऊदी अरब हूतियों के साथ एक और बड़े युद्ध में शामिल होने से हिचकिचाता दिख रहा है, क्योंकि इस लड़ाई में भारी जान-माल का नुकसान हो सकता है। वहीं अमेरिका भी ईरान के तनाव के कारण सीधे युद्ध से दूर रहने की कोशिश कर रहा है।

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