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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 26, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

चीन के दबाव में भारत का भरोसेमंद साथी: जापान-अमेरिका के साथ त्रिपक्षीय गठबंधन

Published: Tue, 26 Aug 2025 04:47 PM (IST)

भारत और जापान की साझेदारी केवल आर्थिक व तकनीकी सहयोग तक सीमित नहीं है। निस्संदेह दोनों देश अर्थव्यवस्था और प्रौद्योगिकी ...और पढ़ें

प्रधानमंत्री मोदी का 29 अगस्त का जापान दौरा भारत-जापान संबंधों में नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी का 29 अगस्त का जापान दौरा भारत-जापान संबंधों में नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है।

 नई दिल्ली, अनुराग मिश्र।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 29 अगस्त को होने वाला जापान दौरा भारत-जापान संबंधों में नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है। यह मोदी का जापान का आठवां दौरा होगा और प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा के साथ उनका पहला वार्षिक शिखर सम्मेलन होगा। यह मुलाकात ऐसे समय हो रही है जब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भू-राजनीतिक अस्थिरता और तकनीकी प्रतिस्पर्धा दोनों तेजी से बढ़ रही हैं।

इस दौरे के दौरान रक्षा एवं सुरक्षा सहयोग, व्यापार और निवेश, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार, और जन-जन संपर्क जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा होगी। भारत के लिए जापान केवल एक रणनीतिक साझेदार नहीं, बल्कि ऐसे मित्र देश के रूप में देखा जाता है जो उसकी आर्थिक वृद्धि और बुनियादी ढांचे के विकास में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। बुलेट ट्रेन परियोजना से लेकर सेमीकंडक्टर उत्पादन तक, जापानी निवेश भारत की दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति को गति देने में अहम साबित हो सकता है। विशेषज्ञ कहते हैं कि क्षेत्रीय स्तर पर भी जापान भारत के लिए अत्यंत अहम भागीदार है। भारत-जापान संबंधों का महत्त्व केवल क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय और वैश्विक परिदृश्य में भी गहरा और दीर्घकालिक है।

ओ.पी. जिंदल यूनिवर्सिटी की असिस्टेंट प्रोफेसर गीतांजलि सिन्हा रॉय कहती है कि मौजूदा भू-राजनीतिक हालात, दुनिया भर में जारी विभिन्न तरह के युद्धों और संघर्षों के बीच भारत-जापान संबंध अत्यंत अहम हो गए हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि भारत और जापान ‘ऑल वेदर फ्रेंड्स’ हैं। दोनों देशों ने हर मुश्किल और हर अवसर में एक-दूसरे का साथ निभाया है। हाल के समय में भी जब ऑपरेशन सिंधु हुआ, तब जापान के रक्षा मंत्री भारत आए थे। वह दौरा बेहद अहम था, जिसने यह संदेश दिया कि जापान भारत के साथ खड़ा है। एक और पहलू यह भी है कि हाल में यह चर्चा रही है कि भारत-अमेरिका संबंधों की दिशा में कुछ बदलाव आ रहा है। लेकिन यह तथ्य कि प्रधानमंत्री मोदी जापान जा रहे हैं, अपने आप में एक बड़ा संकेत है।

फॉरेन पॉलिसी एनालिस्ट और इंडिया फाउंडेशन के रिसर्च फेलो डॉ. पवन चौरसिया कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15वें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए जापान यात्रा पर जा रहे हैं। 2014 में पहली बार भारत के प्रधानमंत्री बनने के बाद से मोदी अब तक आठ बार जापान की यात्रा कर चुके हैं, जो भारत के लिए जापान की प्राथमिकता को दर्शाता है। मोदी के नेतृत्व में दोनों देशों के बीच विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी मजबूत हुई है, जिसमें रक्षा, सुरक्षा, व्यापार, और तकनीक जैसे क्षेत्र शामिल हैं। सनद रहे कि 2022 में जापान ने भारत में 3.2 लाख करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा की थी। इसके अतिरिक्त क्वाड शिखर सम्मेलन और वार्षिक भारत-जापान शिखर सम्मेलन ने दोनों देशों के बीच सहयोग को बढ़ाया है। सांस्कृतिक और आर्थिक संबंधों को गहरा करने के लिए ‘मेक इन इंडिया’ और ‘जापान प्लस’ जैसी पहलें शुरू की गई।

यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब दुनिया में तनाव तेज़ी से बढ़ रहा है। अमेरिका और भारत के बीच व्यापार में टकराव, हाल के संघर्षों से टूटी सप्लाई चेन और अहम तकनीकों में आत्मनिर्भरता की कोशिशें इसकी बड़ी वजह हैं। यह दौरा दोनों देशों की "विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी" को मज़बूत करता है और साझा लोकतांत्रिक मूल्यों व नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति उनकी प्रतिबद्धता दिखाता है। क्षेत्रीय स्तर पर हिंद-प्रशांत, दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में चीन की आक्रामकता, भारत की सीमाओं पर उसका दबाव और वैश्विक व्यापार मार्गों में रुकावट जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए दोनों देश मिलकर काम करेंगे। यह यात्रा इन चुनौतियों का समाधान खोजने और भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी तथा जापान की "फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक" सोच को आगे बढ़ाने की दिशा में एक अहम कदम है।

इंडो पैसिफिक में जापान की भूमिका निर्णायक

गीतांजलि मानती है कि सबसे पहले दिवंगत प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे के नेतृत्व में जापान ने इंडो-पैसिफिक की अवधारणा को आगे बढ़ाया। आबे-सान ही थे जिन्होंने क्वाड को दोबारा सक्रिय किया और उसकी प्रासंगिकता को पुनर्जीवित किया, जो आज अत्यंत अहम है। नवंबर में क्वाड की बैठक होने की संभावना है। फिलहाल इसका आयोजन भारत में तय है, हालांकि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी कहा था कि इसे अमेरिका में होना चाहिए। अब यह देखना होगा कि यह बैठक अंततः कहाँ होती है।

जापान ने केवल इंडो-पैसिफिक को विचार के रूप में नहीं रखा, बल्कि उसे एक दृष्टि, एक रणनीति और आगे चलकर एक पहल (initiative) के रूप में वैश्विक स्तर पर स्थापित किया। बीते कुछ वर्षों में हमने देखा कि किस तरह विभिन्न देशों ने इस अवधारणा को अपनाया। आसियान देशों ने भी इसे अपनी आउटलुक रणनीति में शामिल किया। भारत ने भी इंडो-पैसिफिक इनिशिएटिव को अपनाया और उसे अपनी विदेश नीति का अहम हिस्सा बनाया।

इंडो-पैसिफिक की वैश्विक महत्ता आज सप्लाई चेन से लेकर बंदरगाह कनेक्टिविटी, समुद्री सुरक्षा, स्वास्थ्य सहयोग और शैक्षणिक-वैज्ञानिक (STEM) छात्रवृत्ति जैसे कई आयामों में दिखाई देती है। यह स्पष्ट है कि जापान ने न केवल इंडो-पैसिफिक की नींव रखी, बल्कि आज पूरी दुनिया में इस विचार को आगे बढ़ाने में निर्णायक भूमिका निभाई है।

जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के शोधार्थी अमन कुमार कहते हैं कि यह यात्रा केवल महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि ऐतिहासिक है। आज के वैश्विक परिदृश्य में, जहां चीन दक्षिण चीन सागर में अपने पड़ोसियों (जैसे फिलीपींस और ताइवान) पर दबाव बना रहा है। अमेरिका अपने व्यापार शुल्क की राजनीति में व्यस्त है, और यूरोप यूक्रेन युद्ध में उलझा हुआ है। वहीं भारत और जापान दो ऐसे एशियाई लोकतंत्र के रूप में उभरकर सामने आते हैं जो क्षेत्र की स्थिरता की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार हैं। जापान का भारत में 68 अरब डॉलर का निवेश इस बात की घोषणा है कि भारत एशिया के भविष्य में केंद्रीय भूमिका निभाएगा।

जापान के लिए, भारत ही एकमात्र ऐसा साझेदार है जिसके पास चीन के संतुलन के लिए आवश्यक पैमाना, जनसांख्यिकीय ताकत और राजनीतिक इच्छाशक्ति है। वहीं भारत के लिए, जापान सबसे भरोसेमंद तकनीकी और निवेश साझेदार है, जो पश्चिमी देशों की तुलना में कहीं अधिक विश्वसनीय है, क्योंकि पश्चिमी निवेश अक्सर राजनीतिक शर्तों के साथ आते हैं।

इस यात्रा के दौरान दोनों प्रधानमंत्रियों की बैठक में भारत-जापान के स्पेशल स्ट्रैटेजिक एंड ग्लोबल पार्टनरशिप की समीक्षा होगी, जिसमें रक्षा और सुरक्षा, व्यापार और अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी और नवाचार, तथा जनसंपर्क शामिल होंगे। इसके अलावा क्षेत्रीय और वैश्विक महत्व के मुद्दों पर भी चर्चा की जाएगी। यह यात्रा दोनों देशों के लंबे समय से चले आ रहे विशेष मित्रता के संबंधों को फिर से दृढ़ करेगी।

चीन के लिहाज से जापान की भूमिका भारत के लिए अहम

डा. पवन कहते हैं कि यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज जापान, भारत की हिंद-प्रशांत रणनीति का सबसे मजबूत स्तंभ बनकर सामने आया है, खासकर चीन की आक्रामक नीतियों के जवाब में। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वाड के जरिए जापान भारत के साथ मिलकर आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन पहल (SCRI) जैसे प्रयासों में भागीदार है, जिनका मकसद अहम क्षेत्रों में चीन पर निर्भरता कम करना है। मालाबार, जिमेक्स और धर्म गार्जियन जैसे संयुक्त सैन्य अभ्यासों और 2020 के आपसी लॉजिस्टिक्स समझौते ने दोनों देशों के रक्षा संबंधों को और मज़बूत किया है। चीन के दावों और उसके सैन्य विस्तार के बीच जापान की भूमिका भारत के लिए अहम हो गई है।

यह सहयोग भारत की हिंद-प्रशांत महासागर पहल (IPOI) के कनेक्टिविटी विज़न को मज़बूत करता है। चीन में होने वाले एससीओ शिखर सम्मेलन से ठीक पहले मोदी का जापान दौरा इस बात का संकेत है कि भारत, रणनीतिक संतुलन और स्वायत्तता बनाए रखने के लिए जापान जैसे भरोसेमंद साझेदारों को प्राथमिकता देता है। अमेरिका अब भी भारत का बड़ा सहयोगी है, लेकिन जापान के निवेश, तकनीकी सहयोग और गैर-टकराव वाली नीति ने उसे भारत के लिए अनिवार्य बना दिया है—ख़ासकर तब, जब भारत चीन पर अपनी आर्थिक निर्भरता घटाना चाहता है।

अमेरिका से संबंधों के लिहाज से अहम

गीतांजलि कहती है कि जापान अमेरिका की सुरक्षा छतरी के तहत है और उसकी विदेश नीति की सबसे प्रमुख विशेषता यह रही है कि वह अमेरिका से मजबूत संबंध बनाए रखे। ऐसे में भारत का जापान जाना स्पष्ट करता है कि भारत-जापान संबंधों पर किसी तरह के व्यापारिक टैरिफ का नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। यह भी दर्शाता है कि भारत-अमेरिका संबंध भी अच्छे और सक्रिय रूप से कार्यरत हैं। तीसरा और अहम पहलू यह है कि मोदी पहले जापान जाएंगे और उसके बाद चीन में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे। यह क्रम अपने आप में एक महत्वपूर्ण संकेत है, यह संदेश कि सिर्फ इसलिए कि भारत SCO में भाग लेने जा रहा है, इसका मतलब यह नहीं कि वह अपने ‘ऑल वेदर फ्रेंड’ जापान को भूल रहा है।

आसियान दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण

गीतांजलि कहती है कि भारत-जापान क्षेत्रीय संदर्भ में भी कितने अहम हैं। आसियान इस रिश्ते का एक बड़ा हिस्सा है। भारत और जापान दोनों के लिए आसियान के साथ संबंध बेहद महत्वपूर्ण हैं और यही पहलू भारत-जापान साझेदारी को क्षेत्रीय दृष्टि से और प्रासंगिक बनाता है। इसके अलावा, जिस तरह जापान ने क्वाड को लगातार समर्थन दिया है, वह भी इस बात का एक और अहम आयाम है कि विभिन्न समूहों और गठबंधनों को लेकर भारत-जापान संबंध किस प्रकार से परिलक्षित होते हैं। क्वाड में जापान की सक्रिय भूमिका यह संदेश देती है कि वह केवल द्विपक्षीय सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि बहुपक्षीय ढांचे में भी भारत का मज़बूत सहयोगी है। व्यापक दक्षिण एशियाई संदर्भ में भी जापान ने भारत की मदद करने में एक निर्णायक भूमिका निभाई है।

सेमीकंडक्टर, प्रौद्योगिकीय विकास और हाई-स्पीड रेल में जापान की भूमिका अहम

गीतांजलि बताती है कि सबसे पहले यदि सेमीकंडक्टर की बात करें तो 2019 से ही भारत और जापान ने इस क्षेत्र में कई समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर किए हैं। सेमीकंडक्टर निर्माण और संबंधित सामग्री के क्षेत्र में जापान को स्पष्ट बढ़त हासिल है, जबकि भारत के पास इस उद्योग को स्थापित करने की क्षमता और विशाल प्रतिभा का भंडार मौजूद है। जापानी कंपनियाँ पहले ही भारत में निवेश कर रही हैं और भारत पूरे उद्योग का घरेलू स्तर पर निर्माण करने में सक्षम हो रहा है। इस संदर्भ में जापान विविधीकरण की तलाश में है और भारत उसके लिए सबसे उपयुक्त साझेदार के रूप में उभर कर सामने आया है।

हाई-स्पीड रेल की बात करें तो यह परियोजना भारत-जापान सहयोग की सबसे बड़ी और अहम पहलों में से एक है। यह न सिर्फ बुनियादी ढांचा विकास की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि देश की कनेक्टिविटी को आसान, आरामदायक और विश्वसनीय बनाने वाला भी है। इससे पहले दिल्ली मेट्रो परियोजना में भी जापान ने निर्णायक सहयोग दिया था। उसी तरह हाई-स्पीड रेल भी भारत में परिवहन की गुणवत्ता को जापान के उच्चतम स्तर की सेवाओं जैसा बनाने में मदद करेगी।

प्रौद्योगिकी सहयोग की दृष्टि से भी यह वर्ष विशेष है क्योंकि 2025 को भारत-जापान विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। सेमीकंडक्टर अनुसंधान में जेआईसीए और आईआईटी हैदराबाद के बीच सक्रिय सहयोग इसका उदाहरण है। इसके अलावा जैव-प्रौद्योगिकी, रोबोटिक्स, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक क्षेत्र, इंटरनेट ऑफ थिंग्स और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में दोनों देश साझेदारी कर रहे हैं। जापान जहां तकनीक में वर्षों आगे है, वहीं भारत अपने प्रतिभाशाली युवाओं और विशेषज्ञों से उसे मज़बूत समर्थन प्रदान कर सकता है।

भारत-जापान सहयोग का यह स्वरूप केवल अनुसंधान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उच्चस्तरीय प्रशिक्षण सुविधाएं, भारतीय विशेषज्ञों को विशेष वीज़ा और जापानी कंपनियों के भारत में बड़े पैमाने पर निवेश भी शामिल है। निस्संदेह यह सहयोग भारत की आर्थिक वृद्धि को गति देगा और तकनीकी क्षेत्र में भारत की क्षमताओं को विश्व स्तर पर स्थापित करने में मदद करेगा।

डा. पवन कहते हैं कि शिखर सम्मेलन में होने वाले संभावित समझौते भारत की अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे को नई गति दे सकते हैं। जापान की तकनीकी विशेषज्ञता, भारत के "मेक इन इंडिया" और आत्मनिर्भर भारत जैसे लक्ष्यों को मज़बूती देगी। सेमीकंडक्टर क्षेत्र में नया आर्थिक सुरक्षा ढांचा बनने की उम्मीद है, जिससे सप्लाई चेन सहयोग बढ़ेगा और भारत के बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को लाभ मिलेगा। इसमें संयुक्त निवेश और नए प्रोजेक्ट भी शामिल हो सकते हैं।

हाई-स्पीड रेल के क्षेत्र में मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल परियोजना (MAHSR) के लिए जापान की नई E10 शिंकानसेन तकनीक को अपनाने की घोषणा हो सकती है। साथ ही, एआई और फ़ार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने और 2025-26 को "भारत-जापान विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार का वर्ष" घोषित करने पर भी सहमति बन सकती है।

कुल मिलाकर, ये पहल भारत में जापानी निवेश को आकर्षित करेंगी, जिससे जीडीपी की रफ़्तार बढ़ेगी, बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण होगा और भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता मज़बूत होगी।

यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया के शोधकर्ता गौरव कुमार कहते हैं कि मोदी की इस यात्रा के 3-4 पहलू सबसे कम आंके गए लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। भारत का आर्थिक भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि वह सेमीकंडक्टर, डिजिटल अवसंरचना और आधुनिक परिवहन जैसे क्षेत्रों में कितनी महारत हासिल कर पाता है। काबिले गौर बात यह है कि जापान इन तीनों क्षेत्रों में वैश्विक नेतृत्व रखता है।

यदि सेमीकंडक्टर से जुड़े समझौते वास्तविकता में बदलते हैं तो भारत आखिरकार चीन और ताइवान पर अपनी निर्भरता घटा पाएगा और वैश्विक चिप आपूर्ति श्रृंखला में प्रवेश करेगा। ऐसे समय में जब दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), 5G/6G और रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स पर आधारित है, यह कोई छोटा कदम नहीं होगा, बल्कि तकनीकी संप्रभुता की दिशा में एक बड़ी छलांग होगी।

मुंबई–अहमदाबाद बुलेट ट्रेन इस दिशा की सिर्फ शुरुआत है। हाई-स्पीड रेल, मेट्रो प्रणाली और स्मार्ट लॉजिस्टिक्स में जापान की विशेषज्ञता भारत की अवसंरचना को आधुनिक बना सकती है। स्वच्छ ऊर्जा, रोबोटिक्स और डिजिटल गवर्नेंस के क्षेत्र में तकनीकी हस्तांतरण भारत की अर्थव्यवस्था को सुपरचार्ज कर सकता है और इसे दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के अपने लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ा सकता है।

रक्षा और सुरक्षा में जापान से बढ़ रही मजबूती

गीतांजलि बताती है कि रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में भारत और जापान के बीच सहयोग लगातार गहराता जा रहा है। सबसे अहम उदाहरण यूनिकॉर्न परियोजना है, जिसे दोनों देश न केवल साथ मिलकर विकसित कर रहे हैं, बल्कि सह-उत्पादन भी कर रहे हैं। यह कदम रक्षा सहयोग के क्षेत्र में एक बड़ी प्रगति है। इसके अलावा, जिस तरह जापान इटली और ब्रिटेन के साथ मिलकर छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों पर काम कर रहा है, भविष्य में यह संभावना है कि भारत भी इस साझेदारी में शामिल हो या जापान ऐसे विमानों को भारत को बेचे। इसी तरह, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच समुद्री सहयोग तेजी से विकसित हो रहा है। भारत पहले से क्वाड का हिस्सा है, लेकिन जापान-ऑस्ट्रेलिया के बीच जो सैन्य सहयोग बढ़ रहा है, उसका लाभ भारत को अप्रत्यक्ष रूप से अवश्य मिलेगा। इंडो-पैसिफिक के संदर्भ में क्वाड की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस वर्ष वॉशिंगटन डीसी में हुई पिछली क्वाड बैठक में बंदरगाहों की सुविधाओं, विकास और कनेक्टिविटी पर अहम निर्णय लिए गए। भारत-जापान की आगामी वार्ता में भी समुद्री सहयोग विशेष रूप से रक्षा और सुरक्षा के संदर्भ में एक प्रमुख मुद्दा होगा। भारत और जापान के बीच 2008 में जो सुरक्षा संवाद समझौता हुआ था, उसे अब अद्यतन करने की आवश्यकता है। यह उम्मीद की जा सकती है कि इस बार होने वाली रक्षा और सुरक्षा बैठक में दोनों देश उस समझौते को आधुनिक संदर्भों में अद्यतन करेंगे और उसे नई दिशा देंगे।

गौरव कुमार कहते हैं कि रक्षा इस यात्रा की मौन रीढ़ है। भारत और जापान पहले से ही क्वाड ढांचे के तहत संयुक्त नौसैनिक अभ्यास कर रहे हैं, लेकिन यह यात्रा सहयोग को और गहराई तक ले जाती है, रक्षा उत्पादन, प्रौद्योगिकी साझा करने और खुफिया सहयोग की दिशा में। सीधी भाषा में कहें तो इंडो-पैसिफिक को चीनी वर्चस्व पर नहीं छोड़ा जाएगा।

यह बैठक भारत-जापान रक्षा-सुरक्षा सहयोग में एक मोड़ साबित हो सकती है। अब तक यह साझेदारी मुख्यतः क्वाड के तहत होने वाले मलाबार जैसे नौसैनिक अभ्यासों तक सीमित दिखती थी। लेकिन अब, जब जापान अपने शांतिवादी संकोच को त्यागकर खुले तौर पर लंबी दूरी की मिसाइलों, पनडुब्बियों और साइबर क्षमताओं में निवेश कर रहा है, और भारत हिमालयी मोर्चे पर दबाव का सामना कर रहा है, दोनों देश और अधिक तत्परता के साथ सामंजस्य स्थापित कर रहे हैं।

शिखर बैठक से उम्मीद है कि सहयोग रक्षा विनिर्माण, तकनीकी हस्तांतरण और खुफिया जानकारी के आदान-प्रदान जैसे गहरे क्षेत्रों तक पहुंचेगा। इसका सीधा अर्थ है कि इंडो-पैसिफिक अब चीनी प्रभुत्व का क्षेत्र नहीं रहेगा। इसके बजाय, दिल्ली–टोक्यो रक्षा धुरी क्षेत्र में स्थिरता सुनिश्चित करेगी—जहां नौवहन की स्वतंत्रता, शक्ति संतुलन और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा प्राथमिकता होगी। इंडो-पैसिफिक की स्थिरता किसी एक महाशक्ति पर नहीं, बल्कि साझेदारियों के जाल पर टिकी होगी, जिसमें भारत और जापान केंद्रीय भूमिका निभाएंगे।

त्रिपक्षीय भविष्य के संदर्भ में अहम है जापान की भूमिका

गीतांजलि मानती है कि यह कहना सही होगा कि भारत और जापान की साझेदारी केवल आर्थिक व तकनीकी सहयोग तक सीमित नहीं है। निस्संदेह दोनों देश अर्थव्यवस्था और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, जैसा कि पहले भी उल्लेख किया गया। लेकिन इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि यह सहयोग एक व्यापक संकेत देता है विशेषकर भारत, जापान और अमेरिका के त्रिपक्षीय भविष्य के संदर्भ में।

क्वाड इसका प्रमुख उदाहरण है। इस वर्ष क्वाड के विदेश मंत्रियों की बैठक पहले ही हो चुकी है और अब आगे क्वाड शिखर बैठक होने वाली है। इस संदर्भ में यह तथ्य अत्यंत उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री मोदी सबसे पहले जापान का दौरा कर रहे हैं और उसके बाद शंघाई सहयोग संगठन सम्मेलन के लिए चीन जा रहे हैं। यह यात्रा-क्रम स्वयं में कई प्रश्न खड़े करता है कि जापान-अमेरिका संबंधों की दिशा क्या होगी और भारत-अमेरिका रिश्ते किस तरह विकसित होंगे विशेषकर व्यापार शुल्क जैसे विवादित मुद्दों को देखते हुए।

फिर भी वास्तविकता यह है कि भारत-जापान की यह मुलाकात केवल शुल्क या आर्थिक मुद्दों तक सीमित नहीं है। यह एक मजबूत संकेत है कि भारत-जापान-अमेरिका संबंध न केवल स्थिर हैं, बल्कि भविष्य में और अधिक फलेंगे-फूलेंगे। आने वाली क्वाड बैठकें और वैश्विक साझेदारियां इसका प्रमाण हैं। इस प्रकार यह यात्रा केवल द्विपक्षीय सहयोग नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संदेश भी है कि भारत-जापान-अमेरिका की तिकड़ी आने वाले समय में वैश्विक राजनीति और सुरक्षा ढांचे में सकारात्मक और निर्णायक भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

अमन कुमार कहते हैं कि अगर 21वीं सदी का इंडो-पैसिफिक क्षेत्र शतरंज की बिसात है, तो जापान भारत का सबसे मजबूत मोहरा है। आसियान अब भी विभाजित और सतर्क है, ऑस्ट्रेलिया अकेले खड़ा होने के लिए पर्याप्त शक्ति नहीं रखता, और अमेरिका, भले ही शक्तिशाली हो, अपने अस्थिर घरेलू राजनीति के कारण हमेशा भरोसेमंद नहीं माना जा सकता। जापान के पास चीन के उदय का मुकाबला करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। यह सीधे तौर पर चीन और उत्तर कोरिया की धमकियों का सामना करता है। यही प्राकृतिक तालमेल भारत के साथ बनाता है। नई दिल्ली और टोक्यो मिलकर बीजिंग की आक्रामक पहल के खिलाफ एक विश्वसनीय संतुलन स्थापित करते हैं।

डा. पवन मानते हैं कि इस यात्रा को केवल आर्थिक या तकनीकी सहयोग के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे भू-राजनीतिक समीकरण अहम हैं। आज भले ही भारत और अमेरिका के रिश्तों में कुछ तनाव है, लेकिन मूल्यों और ज़रूरतों के लिहाज़ से भारत, अमेरिका और जापान क़रीब हैं। यही कारण है कि यह दौरा त्रिपक्षीय साझेदारी को और गहरा करने का संकेत देता है।

यात्रा का प्रमुख एजेंडा सेमीकंडक्टर और एआई के लिए नया सुरक्षा ढांचा बनाने से जुड़ा है। इसके साथ ही रक्षा, सुरक्षा और क्षेत्रीय मुद्दों पर भी बातचीत होगी, जिससे यह मुलाक़ात एक रणनीतिक धुरी बन जाती है। अमेरिकी टैरिफ की अनिश्चितताओं के बीच भारत इस यात्रा के ज़रिए क्वाड की प्रासंगिकता बनाए रखने का संदेश भी दे रहा है। खास बात यह है कि अगला क्वाड शिखर सम्मेलन भारत की मेज़बानी में होगा, जो हिंद-प्रशांत में चीन की बढ़ती चुनौती का जवाब देने की दिशा में अहम होगा।

इसके अलावा यह दौरा बहुपक्षवाद के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को भी मज़बूत करता है। एससीआरआई और आईपीओआई जैसे मंचों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन और आपदा रोधी अवसंरचना गठबंधन में भी जापान भारत का अहम भागीदार है। चीन यात्रा से पहले जापान को प्राथमिकता देना इस बात का संकेत है कि भारत समान विचारधारा वाले लोकतंत्रों के साथ मिलकर वैश्विक शक्ति संतुलन और दीर्घकालिक स्थिरता के लिए काम करना चाहता है।

गौरव कुमार कहते हैं कि इस यात्रा को केवल अर्थशास्त्र के चश्मे से देखना एक बड़ी भूल होगी। यह केवल व्यापारिक आंकड़ों या एमओयू पर हस्ताक्षर भर की बात नहीं है। भारत और जापान कुछ और बड़े आयाम गढ़ रहे हैं, वे वास्तव में वैश्विक गठबंधनों का भविष्य आकार दे रहे हैं। यह यात्रा अमेरिका–जापान–भारत त्रिपक्षीय ढांचे को नई ऊर्जा देती है। यह क्वाड को भी एक गंभीर सुरक्षा मंच की तरह प्रस्तुत करती है, न कि केवल बयानबाजी करने वाले समूह की तरह। भारत और जापान की नजदीकी इंडो-पैसिफिक में शक्ति संतुलन को बदलना शुरू कर देगी।

इसका असर एशिया से आगे भी महसूस होगा। यूक्रेन संकट के बाद अस्थिरता झेल रहा यूरोप इसे मज़बूत साझेदारियों के संकेत के रूप में देखेगा। चीन के बढ़ते दबदबे से जूझ रहा आसियान इससे सुकून पाएगा। और अफ्रीका, जहां भारत और जापान दोनों अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं, वहां भी यह साझेदारी स्थिरता और विकास का संदेश देगी।

प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा केवल द्विपक्षीय नहीं है, इसका बहुपक्षीय असर है। संदेश साफ है—एशिया का शक्ति संतुलन अब सिर्फ बीजिंग या वाशिंगटन में तय नहीं होगा। यह नई दिल्ली और टोक्यो में भी आकार लेगा। यही इस यात्रा का असली अर्थ है सिर्फ अर्थशास्त्र से कहीं ज्यादा बड़ा। यह क्वाड, भारत की "एक्ट ईस्ट" नीति और वैश्विक सप्लाई चेन लचीलापन सबको जोड़ता है।

प्रधानमंत्री मोदी की जापान यात्रा कूटनीति से कहीं बढ़कर है। यह एक रणनीतिक घोषणा है। यह जापान को भारत की इंडो-पैसिफिक दृष्टि का सबसे मज़बूत स्तंभ बनाती है, तकनीकी सहयोग के ज़रिए आर्थिक रूपांतरण का वादा करती है और चीनी आक्रामकता के खिलाफ रक्षा-सुरक्षा कवच को और मजबूत करती है।

समझौतों को लागू करना बड़ी चुनौती

डा. पवन कहते हैं कि शिखर सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य रक्षा और सुरक्षा सहयोग को मज़बूत करना और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता सुनिश्चित करना है। उम्मीद है कि दोनों नेता 2008 के सुरक्षा सहयोग घोषणापत्र में संशोधन करेंगे। इसमें ख़ुफ़िया जानकारी साझा करने और रक्षा उपकरणों के सह-विकास जैसे ठोस कदम शामिल हो सकते हैं।

हाल ही में भारतीय नौसेना के लिए यूनिकॉर्न मस्तूल के सह-विकास और संयुक्त अभ्यास (जैसे 2025 में होने वाला छठा धर्म रक्षक) जैसे उदाहरण दोनों देशों की साझेदारी को नई दिशा दे रहे हैं। इससे नौसैनिक अभ्यासों में तालमेल और निवारक क्षमताएँ बढ़ेंगी।

हिंद-प्रशांत संदर्भ में यह बैठक क्वाड की भूमिका को और मज़बूत करेगी। इसमें नौवहन की स्वतंत्रता, आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा और चीन की आक्रामक गतिविधियों पर साझा प्रतिक्रिया पर ज़ोर दिया जा सकता है।

साथ ही, महत्वपूर्ण खनिजों और आर्थिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम करने से क्षेत्रीय अस्थिरता के ख़तरों को कम किया जा सकेगा और नियम आधारित व्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा। कुल मिलाकर, यह साझेदारी स्थिरता ला सकती है और मज़बूत गठबंधनों के ज़रिए आक्रामकता को रोक सकती है। हालांकि, अगर चीन इसे नियंत्रण की कोशिश के रूप में देखता है तो तनाव बढ़ने की आशंका भी बनी रहेगी। इस पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि समझौतों को कितनी प्रभावी तरह से लागू किया जाता है।

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