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5000 टन वजनी मशीनों का दंभ भर रहा चीन, क्या भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में बन सकता है बाधा?

Published: Mon, 02 Nov 2026 03:06 PM (IST)

चीन ने सुरंग खोदने वाली मशीनों सहित निर्माण मशीनरी के निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं, जिससे भारत की बुनियादी ...और पढ़ें

चीन की टनल बोरिंग मशीन (AI जेनेरेटेड)

चीन की टनल बोरिंग मशीन (AI जेनेरेटेड)

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संक्षेप में पढ़ें

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। रेयर अर्थ मिनरल्स पर निर्यात कंट्रोल के बाद अब चीन निर्माण मशीनरी के निर्यात पर भी कड़े नियम लागू कर रहा है। इनमें सुरंग खोदने वाली बड़ी टनल बोरिंग मशीनें भी शामिल हैं।

दुनिया भर में इन मशीनों का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक चीन ही है। भारत अपनी सड़क, रेलवे और मेट्रो परियोजनाओं के लिए इन मशीनों पर काफी हद तक निर्भर रहता है। ऐसे में चीन के इन नए प्रतिबंधों से भारत की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की गति प्रभावित हो सकती है।

रेयर अर्थ मिनरल्स पर एकाधिकार

रेयर अर्थ मिनरल्स पर लगभग एकाधिकार होने की वजह से चीन को वैश्विक बाजार में मोलभाव करने की ताकत मिल गई है। अब वह इसी रणनीति को एक आम उद्योग में बदलना चाहता है और शायद इसके जरिए एशिया के अपने एक प्रमुख प्रतिद्वंद्वी पर दबाव बनाना चाहता है।

सुरंग खोदने वाली मशीनों के साथ-साथ, ये नियम अन्य निर्माण उपकरणों पर भी लागू होते हैं, जिनमें अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में कंक्रीट का छिड़काव करने वाली मशीनें भी शामिल हैं।

बीजिंग ने 'दोहरे उपयोग' (सैन्य और नागरिक दोनों कार्यों में इस्तेमाल) की संभावना का हवाला दिया है। चीन ने कहा है कि चीन के साथ विवाद वाले संवेदनशील देशों और क्षेत्रों को अब और भी सख्त नियमों का सामना करना पड़ेगा।

भारत और चीन के बीच हिमालयी सीमा लंबे समय से तनाव का केंद्र रही है, और पिछले ही हफ्ते वहां फिर से तनाव बढ़ गया था। भारत इस इलाके में रेलवे लाइनें और सड़कें बना रहा है, ताकि सैनिकों की तैनाती में लगने वाले समय को कम किया जा सके। इसके लिए भारत को कई सुरंगों की जरूरत पड़ेगी।

भारत पर संभावित प्रभाव क्या हो सकता है?हिमालयी सीमा के नजदीक भारत सड़कों, रेलवे और सुरंगों का नेटवर्क तेजी से बढ़ा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में कनेक्टिविटी मजबूत करना तथा सैन्य आवाजाही को तेज बनाना है।

इन परियोजनाओं के लिए टनल बोरिंग मशीनों की जरूरत होती है। चीन अगर इन मशीनों या उनके जरूरी पुर्जों की आपूर्ति रोक दे, तो निर्माण कार्यों में देरी हो सकती है।

नई पाबंदियों में मशीनों के साथ उनके कुछ पुर्जे भी शामिल किए गए हैं। इससे पहले से इस्तेमाल हो रही मशीनों पर भी असर पड़ने की आशंका है।

भारत पर संभावित प्रभाव क्या हो सकता है?

हिमालयी सीमा के नजदीक भारत सड़कों, रेलवे और सुरंगों का नेटवर्क तेजी से बढ़ा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में कनेक्टिविटी मजबूत करना तथा सैन्य आवाजाही को तेज बनाना है।

इन परियोजनाओं के लिए टनल बोरिंग मशीनों की जरूरत होती है। चीन अगर इन मशीनों या उनके जरूरी पुर्जों की आपूर्ति रोक दे, तो निर्माण कार्यों में देरी हो सकती है।

नई पाबंदियों में मशीनों के साथ उनके कुछ पुर्जे भी शामिल किए गए हैं। इससे पहले से इस्तेमाल हो रही मशीनों पर भी असर पड़ने की आशंका है।

ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स का क्या कहना है?

चीनी मशीनों पर नियंत्रण से कुछ इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की रफ्तार धीमी पड़ सकती है, जिसमें विवादित हिमालयी सीमा के पास होने वाले रणनीतिक निर्माण कार्य भी शामिल हैं।

लेकिन चीन द्वारा निर्यात नियंत्रण को सख्त करने से, एक वैकल्पिक विनिर्माण केंद्र के रूप में भारत की स्थिति और मजबूत हो सकती है। विदेशी उपकरण निर्माताओं के पास भारत जैसे बड़े बाजारों में अपनी क्षमता बढ़ाने का एक अच्छा कारण है।

बीजिंग की सिंघुआ यूनिवर्सिटी के 'सेंटर फॉर इंटरनेशनल सिक्योरिटी एंड स्ट्रेटेजी' के फेलो, सन चेंगहाओ का कहना है कि अधिक ऊंचाई पर काम करने वाली मशीनों को इसमें शामिल करने का मतलब यह हो सकता है कि चीन का खास ध्यान रणनीतिक रूप से संवेदनशील इलाकों पर है।

सन ने कहा, चीन के लिए मुख्य चिंता यह है कि उसकी इंजीनियरिंग क्षमताओं का इस्तेमाल कहां हो रहा है और क्या इससे किसी दूसरे देश के सैन्य बुनियादी ढांचे को मजबूती मिल सकती है।'

चीन ने जर्मनी की कंपनी को भारत में सामान बेचने से रोका

चीन पहले भी सुरंग खोदने वाली मशीनों के सबसे बड़े निर्यातक के रूप में अपना दबदबा दिखा चुका है। 2024 में, चीन ने जर्मनी की कंपनी 'हेरेंक्नेक्ट एजी' (Herrenknecht AG) के प्रयासों में रुकावट डाली।

यह कंपनी अपनी कुछ बोरिंग मशीनें चीन में ही बनाती है और उन्हें भारत को बेचना चाहती थी, जिनका इस्तेमाल अहमदाबाद-मुंबई बुलेट ट्रेन और दिल्ली मेट्रो जैसी परियोजनाओं में होना था।

कौन-कौन है मशीनों के खरीददार?

चीन के भारी भरकम टनलिंग मशीनों का खरीदार केवल भारत ही नहीं है। बीजिंग के सरकारी मीडिया के अनुसार, इस उद्योग में चीन की वैश्विक हिस्सेदारी लगभग 70% है। सबसे बड़ी निर्माता कंपनी, 'चाइना रेलवे इंजीनियरिंग इक्विपमेंट ग्रुप कंपनी लिमिटेड' का कहना है कि उसके उपकरण डेनमार्क और फ्रांस सहित 36 देशों में इस्तेमाल किए जाते हैं।

चीन के अलावा सबसे बेस्ट विकल्प कौन?

हेरेनक्नेक्ट (Herrenknecht) के अलावा, अमेरिका और जापान में भी कुछ ऐसी कंपनियां हैं जो इनके विकल्प बना सकती हैं। लंबे समय में, चीन की ये पाबंदियां इनमें से कुछ कंपनियों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती हैं। लेकिन ज्यादातर ग्राहकों के लिए, अचानक चीनी सप्लायर को छोड़कर किसी और के पास जाना मुश्किल है।

ऐसे में घरेलू क्षमता विकसित करना एक अच्छा विकल्प हो सकता है खासकर भारत जैसे बड़े देश के लिए, जहां बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) को लेकर बड़ी योजनाएं हैं। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि भारत का लक्ष्य अगले पांच वर्षों में टनलिंग (सुरंग निर्माण) पर 9.6 अरब डॉलर तक का निवेश करना है।

उन्होंने स्थानीय उद्योगों से बोरिंग मशीनें बनाने का आग्रह किया है। खबरों के अनुसार, सरकार निर्माण उपकरण बनाने वाली कंपनियों के लिए 1.2 अरब डॉलर की प्रोत्साहन योजना (इंसेंटिव प्लान) पर विचार कर रही है।

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