नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। अमेरिका के इतिहास में 7 दिसंबर का दिन बेहद खास और न भूलने वाला है। ऐसा इसलिए क्‍योंकि इसी दिन जापान ने अमेरिका के पर्ल हार्बर पर हमला कर उसको जबरदस्‍त झटका दिया था।जापान के लड़ाकू विमानों ने एक घंटे के दौरान ही अमेरिका के आसमान को काले धुंऐ से भर दिया था। अमेरिका अचानक हुए इस हमले के लिए न तो तैयार था और न ही वह इसकी कल्‍पना ही कर सकता था। यह हमला अमेरिका के लिए बेहद चौंकाने वाला इसलिए भी था क्योंकि हमले से ठीक एक दिन पहले ही वाशिंगटन में जापानी प्रतिनिधियों की अमेरिकी विदेश मंत्री कॉर्डेल हल के साथ जापान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को समाप्‍त करने को लेकर सुलह की बातचीत चल रही थी। अमेरिका के नेवल बेस पर हुए इस हमले ने अमेरिका को हिला कर रख दिया था।

जापान ने 7 दिसंबर 1941 की सुबह 7.48 बजे अमेरिका के पर्ल हार्बर नौसैनिक अड्डे पर हमला बोला था। जापान का निशाना अमेरिका के ईधन टैंक थे। इस हमले का अंदेशा होने के बाद भी वह हमलावर विमानों को पहचान नहीं सका। पर्ल हार्बर पर हमला इसलिए किया गया क्‍योंकि जापान को लगता था कि यहां बड़ी संख्या में अमेरिकी विमान वाहक जहाज होंगे। हालांकि ऐसा नहीं था। पर्ल हार्बर पर हुए इस हमले की बदौलत ही अमेरिका को द्वितीय विश्वयुद्ध में कूदना पड़ा था।

इस हमले से अमेरिका का संपूर्ण बेड़ा, फोर्ड द्वीप स्थित नौसैनिक वायुकेंद्र और एक बंदरगाह बुरी तरह नष्ट हो गया था। इस हमले में अमेरिका के बेड़े के नौ जहाज डूब गए और 21 जहाज बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गए। 21 में से तीन पूरी तरह से बेकार हो चुके थे। इस हमले में मरने वालों की कुल संख्या 2,350 थी, जिसमें 68 नागरिक शामिल थे और 1178 लोग घायल हुए थे। पर्ल हार्बर में मरने वाले सैन्य कर्मियों में, 1,177 एरिजोना से थे। इस हमले में जापान के 350 विमानों में से 29 नष्‍ट हो गए थे।

दरअसल, इस हमले के पीछे जापान की वह नाराजगी थी जिसमें अमेरिकी प्रतिबंध और चीन को दी गई मित्र सेनाओं की मदद शामिल थी। इनसे नाराज होकर ही जापान ने अमेरिका खिलाफ युद्ध की घोषणा की थी। पर्ल हार्बर के बाद तत्‍कालीन अमेरिकी राष्‍ट्रपति फ्रैंकलीन रूजवेल्ट ने भी जापान के खिलाफ लड़ाई की घोषणा कर दी थी। पर्ल हार्बर के इस हमले का अंत चार वर्ष बाद हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए परमाणु हमले के साथ हुआ था। पर्ल हार्बर पर किए गए हमले की जापान को बड़ी भारी कीमत चुकानी पड़ी थी, जिससे वह आजतक भी पार नहीं पा सका है। वहीं पर्ल हार्बर को अमेरिका ने हमले के एक वर्ष बाद ही फिर से तैयार कर लिया था। एक वर्ष बाद ही यह बंदरगाह अमेरिका के प्रशांत महासगरीय बेड़े का हैडक्‍वार्टर बन गया। लेकिन जापान को अपने दोनों शहर बसाने में वर्षों लग गए। 

अमेरिकियों ने पहले ही जापान के कोड को समझ लिया था, लेकिन पकड़े गए संदेश को समझने में कठिनाई के कारण अमेरिकी, जापान द्वारा टार्गेट स्‍थानों को पहचान पाने में विफल रहे थे। पर्ल हार्बर के हमले से दहले अमेरिका ने इसके बाद फिलीपींस, ब्रिटेन द्वारा अधिकार किए गए मलाया, सिंगापुर तथा हांग कांग पर ताबड़तोड़ हमले किए। यह हमले दरअसल जापान का ध्‍यान भटकाने के लिए ही किए गए थे। जिस वक्‍त अमेरिका ने इन देशों को निशाना बनाया था उस वक्‍त जापान दक्षिण पूर्वी एशिया में यूके, नीदरलैंड तथा यूएस के अधिकृत क्षेत्रों पर सैनिक कार्यवाही करने की योजना बना रहा था।

इस हमले के बाद द्वितीय विश्व युद्ध ने एक नया मोड़ ले लिया था। 1 सितंबर, 1939 से 2 सितंबर, 1945 तक चलने वाले इस युद्ध में जापान की एक गलती की बदौलत करीब लाखों लोगों की जान चली गई थी। इस युद्ध में 70 देशों की थल-जल-वायु सेनाएं शामिल हुई थीं। पूरा विश्‍व इस दौरान मित्र राष्ट्र और धुरी राष्ट्र के बीच बंटकर रह गया था। इस युद्ध में विभिन्न राष्ट्रों के लगभग 10 करोड़ सैनिकों ने हिस्सा लिया था। यह मानव इतिहास का सबसे ज्‍यादा घातक युद्ध साबित हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के अंत तक दुनिया का नक्‍शा भी काफी कुछ बदल चुका था। 

Posted By: Sanjay Pokhriyal