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US-ईरान शांति समझौता में बैकफुट पर अमेरिका! डील में कमजोर पक्ष बनकर उभरा वॉशिंगटन

Published: Tue, 16 Jun 2026 12:46 AM (IST)

2026 के अमेरिका-ईरान शांति समझौते में अमेरिका को कमजोर पक्ष माना जा रहा है, क्योंकि ईरान अपेक्षा से अधिक मजबूत स्थिति में उभरा।

इरान से समझौते में हारता दिख रहा अमेरिका(फाइल फोटो)

इरान से समझौते में हारता दिख रहा अमेरिका(फाइल फोटो)

HighLights

  1. अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम सीमित नहीं कर पाया।

  2. संघर्ष के बावजूद ईरान की राजनीतिक व्यवस्था कायम रही।

  3. इजरायल सहित अमेरिकी सहयोगी समझौते की आलोचना कर रहे हैं।

जागरण न्यूज नेटवर्क, नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच 2026 में हुए युद्धविराम और शांति-समझौते को लेकर दुनिया भर में बहस चल रही है। कई विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता अमेरिका की स्पष्ट जीत नहीं बल्कि एक ऐसा समझौता है जिसमें ईरान अपेक्षा से अधिक मजबूत स्थिति में उभरकर आया। यही कारण है रणनीतिक विशेषज्ञ और अमेरिका के सहयोगी देशों में अमेरिका को इस डील का कमजोर पक्ष बताया जा रहा है।

अमेरिका अपने मूल लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया

युद्ध और दबाव की नीति अपनाने के बाद अमेरिका का प्रमुख उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल क्षमता और क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करना था। लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार समझौते के बाद भी ईरान ने अपने कई रणनीतिक कार्यक्रम पूरी तरह समाप्त नहीं किए हैं। युद्धविराम तो हुआ, लेकिन परमाणु संवर्धन, प्रतिबंधों और मिसाइल कार्यक्रम जैसे बड़े मुद्दे अभी भी आगे की बातचीत के लिए छोड़े गए हैं।

ईरान की सरकार और व्यवस्था बनी रही

कई महीनों के संघर्ष, आर्थिक दबाव और सैन्य कार्रवाई के बावजूद ईरान की राजनीतिक व्यवस्था कायम रही। रायटर के अनुसार क्षेत्रीय विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और उसके सहयोगियों के कुछ बड़े रणनीतिक लक्ष्य पूरे नहीं हुए और ईरान पूरी तरह झुकने के बजाय राजनीतिक रूप से टिके रहने में सफल रहा। इससे यह धारणा बनी कि अमेरिका भारी लागत उठाने के बाद भी निर्णायक परिणाम नहीं ला पाया।

अमेरिका के सहयोगियों की नाराजगी

न्यूयार्क टाइम्स के अनुसार विशेष रूप से इजरायल में इस समझौते की आलोचना हुई है। आलोचकों का कहना है कि समझौता ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और उसके क्षेत्रीय सहयोगी समूहों की गतिविधियों पर पर्याप्त नियंत्रण नहीं लगाता।

कुछ इजरायली नेताओं ने इसे खराब समझौता तक कहा है। जब किसी देश के करीबी सहयोगी ही समझौते से असंतुष्ट हों, तो अमेरिका की वार्ता-स्थिति पर सवाल उठते हैं।

समझौते के लिए मजबूर दिखा अमेरिका

अलजजीरा के अनुसार दोनों पक्षों के बीच प्रतिबंधों में राहत, जमे हुए ईरानी धन और परमाणु गतिविधियों को लेकर लंबे समय तक मतभेद बने रहे। आलोचकों का कहना है कि अमेरिका अंततः पूर्ण दबाव बनाए रखने के बजाय समझौते की ओर बढ़ा, जिससे यह संदेश गया कि वह अपनी अधिकतम मांगें मनवाने में सफल नहीं हुआ।

क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव नहीं आया

विश्लेषकों के अनुसार युद्ध के बाद भी पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन पूरी तरह अमेरिका के पक्ष में नहीं बदला। कई खाड़ी देशों ने यह महसूस किया कि केवल अमेरिकी सुरक्षा गारंटी पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है और उन्होंने ईरान के साथ संवाद बढ़ाने की नीति अपनाई। इससे अमेरिका के प्रभाव को चुनौती मिलती दिखाई देती है।

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