अनेक देशों का US से तेल खरीद समझौता, उन्हें सप्लाई के लिए वेनेजुएला के भंडार का इस्तेमाल कर सकता है अमेरिका
अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को गिरफ्तार कर लिया है, जिसका मुख्य उद्देश्य वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार पर ...और पढ़ें

US ट्रेड डील और वेनेजुएला पर हमले के बीच क्या है संबंध
HighLights
अमेरिका ने यूरोपियन यूनियन तथा कई देशों के साथ किया है समझौता।
वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार पर नियंत्रण है उसका मुख्य लक्ष्य।
चीन के निवेश के कारण अमेरिका-चीन तनाव बढ़ने की आशंका।
प्राइम टीम, नई दिल्ली।
उम्मीद की जा रही थी कि वर्ष 2026 की शुरुआत 2025 की तुलना में अपेक्षाकृत शांत होगी। पिछले साल 20 जनवरी को डोनाल्ड ट्रंप के शपथ ग्रहण के पहले से ही टैरिफ को लेकर व्यापक अनिश्चितताएं थीं। अमेरिका-चीन के बीच नए टैरिफ वॉर का भी डर था। लेकिन 2026 शुरुआत ने 2025 को भी पीछे छोड़ दिया है। ट्रंप के निर्देश पर अमेरिकी सैनिकों ने 3 जनवरी को वेनेजुएला में एक सैन्य अभियान को अंजाम दिया और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो तथा उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को गिरफ्तार कर लिया। मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप में दोनों पर अमेरिका में मुकदमा चलेगा।
सिर्फ मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप में किसी राष्ट्र प्रमुख को इस तरह उठा लेना किसी को हजम नहीं हो रहा है। माना जा रहा है कि इस अभियान का मुख्य लक्ष्य वेनेजुएला के कच्चे तेल पर नियंत्रण हासिल करना है। वेनेजुएला के पास दुनिया के कुल तेल भंडार का लगभग 18% हिस्सा है, जो सऊदी अरब (करीब 16%), रूस (लगभग 5-6%) और अमेरिका (करीब 4%) से अधिक है। अकेले वेनेजुएला के पास अमेरिका और रूस, दोनों के कुल भंडार से भी ज्यादा कच्चा तेल है।
थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के अनुसार, अमेरिका ने यूरोपीय यूनियन, जापान, दक्षिण कोरिया और इंग्लैंड जैसे साझीदारों के साथ व्यापार समझौते किए हैं। उन देशों ने अमेरिका से पेट्रोलियम उत्पाद और एलएनजी खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है। उस अनुपात में अमेरिका के पास पर्याप्त कच्चा तेल या रिफाइनिंग क्षमता उपलब्ध नहीं है। इस पृष्ठभूमि में देखा जाए तो दुनिया के सबसे बड़े प्रमाणित पेट्रोलियम भंडार वाला देश वेनेजुएला, अमेरिका के लिए अपस्ट्रीम कच्चे तेल का महत्वपूर्ण स्रोत बन सकता है।
ग्लोबल मार्केट रिसर्च फर्म नेटिक्सिस की चीफ इकोनॉमिस्ट (एशिया पैसिफिक) एलिसिया गार्सिया हेरेरो कहती हैं, “राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी प्रभाव में वेनेजुएला के तेल उद्योग को पुनर्जीवित करने के इरादे व्यक्त किए हैं, जिससे पश्चिमी कंपनियों को लाभ मिल सकता है और खासकर चीन के साथ स्थापित साझेदारियों में व्यवधान आ सकता है।”
वेनेजुएला पर हमले का असली कारण
वर्ष 2000 में ह्यूगो शावेज के राष्ट्रपति बनने से पहले वेनेजुएला रोजाना 32-33 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन करता था। शावेज के शासन के शुरुआती वर्षों में भी उत्पादन 30 लाख बैरल के ऊपर बना रहा। लेकिन 2007-08 के आसपास यह गिरने लगा और 30 लाख बैरल प्रतिदिन से नीचे आ गया। वर्ष 2015 के बाद उत्पादन में तेजी से गिरावट आई और अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद इसका दैनिक उत्पादन 10 लाख बैरल भी नहीं रह गया है। इसकी तुलना में अमेरिका हर दिन 2 करोड़ बैरल से ज्यादा और सऊदी अरब 1.1 करोड़ बैरल से थोड़ा कम उत्पादन करता है।
राष्ट्रपति ट्रंप साफ कह चुके हैं कि वे वेनेज़ुएला के बड़े तेल रिजर्व पर नियंत्रण चाहते हैं। खबरों के मुताबिक ट्रंप प्रशासन के अधिकारी इसी हफ्ते अमेरिकी तेल कंपनियों के प्रतिनिधियों से मिलेंगे और वेनेजुएला में तेल उत्पादन बढ़ाने पर चर्चा करेंगे। एक्सॉनमोबिल, शेवरॉन और कॉन्कोफिलिप्स जैसी अमेरिकी कंपनियां वेनेजुएला में रुचि ले सकती हैं।
दरअसल, वेनेज़ुएला में मिलने वाले तेल का प्रकार ही अमेरिका की दिलचस्पी का कारण है। कच्चे तेल के प्रकार को डिग्री API में मापा जाता है। इसके कम होने का मतलब है हेवी क्रूड, अधिक हुता तो लाइट क्रूड। अमेरिका की अधिकतर रिफाइनरी हेवी क्रूड ऑयल (30 डिग्री API से कम) को प्रोसेस करने के लिए बनाई गई हैं, ठीक वैसा ही क्रूड ऑयल जैसा वेनेज़ुएला में पाया जाता है। अमेरिका में उत्पादन होने वाला अधिकतर तेल लाइट क्रूड (40 डिग्री API से अधिक) होता है।
दूसरे शब्दों में अमेरिकी रिफाइनरियां देश में उत्पादित ज्यादातर तेल को प्रोसेस नहीं कर सकतीं। लाइट क्रूड के लिए इन रिफाइनरियों को अपग्रेड करने में अरबों डॉलर खर्च होंगे। वह करने के बजाय अमेरिका हेवी क्रूड का आयात करता है। पिछले चार दशकों में हेवी क्रूड पर अमेरिका की निर्भरता काफी बढ़ गई है। US एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन के मुताबिक 2024 में देश में आयात किए गए क्रूड ऑयल का लगभग 67 प्रतिशत हेवी ऑयल था, जो 1978 में सिर्फ 13 प्रतिशत था।
भारत पर क्या होगा असर
वेनेजुएला में इस अस्थिरता का भारत पर कोई खास आर्थिक प्रभाव पड़ने की आशंका नहीं है। हालांकि 2000 और 2010 के दशक में भारत वेनेजुएला के कच्चे तेल का बड़ा खरीदार था और ओएनजीसी विदेश जैसी भारतीय कंपनियों की ओरिनोको बेल्ट में अपस्ट्रीम हिस्सेदारी भी थी, लेकिन 2019 के बाद अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते द्विपक्षीय सहयोग में तेज गिरावट आई। इन प्रतिबंधों के कारण भारत को सेकंडरी प्रतिबंधों से बचने के लिए तेल आयात में कटौती करनी पड़ी और व्यावसायिक गतिविधियों को सीमित करना पड़ा।
श्रीवास्तव के अनुसार, वेनेज़ुएला के साथ भारत के व्यापार में लगातार गिरावट आ रही है। वित्त वर्ष 2024-25 में वेनेज़ुएला से भारत का कुल आयात केवल 36.45 करोड़ डॉलर रहा, जिसमें कच्चे तेल का हिस्सा 25.53 करोड़ डॉलर था। वित्त वर्ष 2023-24 के 1.4 अरब डॉलर के कच्चे तेल आयात की तुलना में इसमें 81.3% की गिरावट आई। वेनेज़ुएला को भारत का निर्यात भी सिर्फ 9.53 करोड़ डॉलर तक रहा, जिसमें 4.14 करोड़ डॉलर की दवाइयों का प्रमुख योगदान था। कम व्यापार, मौजूदा प्रतिबंध और भौगोलिक दूरी को देखते हुए, वेनेज़ुएला में मौजूदा घटनाक्रमों का भारत की अर्थव्यवस्था या ऊर्जा सुरक्षा पर किसी भी प्रकार का प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है।
वेनेजुएला में चीन के हित
वेनेजुएला के साथ चीन के संबंध वित्तीय और ऊर्जा के साथ खनिजों के क्षेत्र में भी हैं। अमेरिकी कार्रवाई से चीन के निवेश के लिए खतरा हो सकता है। इस कारण चीन और अमेरिका के बीच भी तनाव बढ़ने की आशंका है। दरअसल, वर्ष 2007-08 के आर्थिक संकट के बाद बीजिंग, वेनेजुएला का प्रमुख कर्जदाता बन गया है। उस समय कच्चे तेल की गिरती कीमतों ने मादुरो के पहले के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज के शासन को खतरे में डाल दिया था। एलिसिया के अनुसार एक समय वेनेजुएला पर चीन का कर्ज लगभग 60 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। इस कर्ज के बड़े हिस्से की कच्चे तेल के बदले स्वैपिंग की गई है।
वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो ने सितंबर 2023 में बीजिंग यात्रा की थी। तब दोनों देशों के संबंधों को “ऑल-वेदर स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप” के स्तर का घोषित किया गया और कई वाणिज्यिक समझौतों पर हस्ताक्षर भी किए गए। उसके बाद वेनेजुएला में चीनी निवेश में वृद्धि हुई। यह निवेश खासतौर पर अपस्ट्रीम तेल क्षेत्र, कीमती धातुओं और रेयर अर्थ खनिजों के क्षेत्र में हुआ।
ये समझौते मादुरो के लिए सामयिक साबित हुए, क्योंकि जुलाई 2024 के राष्ट्रीय चुनावों में उन्हें विपक्ष से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा था। चुनावों में मादुरो ने स्वयं को विजेता घोषित किया। हालांकि उन पर व्यापक धोखाधड़ी के आरोप लगे और अमेरिका, यूरोपीय यूनियन तथा कई लैटिन अमेरिकी देशों ने चुनाव नतीजों को मान्यता देने से इनकार कर दिया। लेकिन चीन और रूस ने मादुरो का समर्थन किया।
तेल के लिए बहुत कुछ दांव पर
चीन 2000 के दशक के मध्य से वेनेजुएला के तेल क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। आर्थिक प्रतिबंध, अत्यधिक मुद्रास्फीति और अमेरिकी प्रतिबंधों से निपटने में चीन, वेनेजुएला का प्रमुख सहयोगी बनकर उभरा है। ‘तेल के बदले ऋण’ व्यवस्था से चीन ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूत किया है। वेनेजुएला, चीन के लिए कच्चे तेल का एक भरोसेमंद सप्लायर बना हुआ है। चीन कुल तेल आयात का लगभग 4% उससे लेता है। अपस्ट्रीम परियोजनाओं में इक्विटी हिस्सेदारी चीन को रणनीतिक बढ़त भी प्रदान करती है। इनमें ओरिनोको बेल्ट की सिनोवेंसा संयुक्त उद्यम परियोजना शामिल है, जिसमें चीन की CNPC की 40% हिस्सेदारी है।
वेनेजुएला को नकदी के अलावा कच्चे तेल के दोहन से जुड़ी तकनीक के हस्तांतरण का भी लाभ मिला है। यह उसके दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार (300 अरब बैरल से अधिक) को देखते हुए महत्वपूर्ण है। हाल में चाइना कॉनकॉर्ड पेट्रोलियम जैसी निजी चीनी कंपनियों ने अरबों डॉलर का निवेश किया है। यह दर्शाता है कि बीजिंग ने वेनेजुएला के उत्पादन और निर्यात के बड़े हिस्से (80% चीन को) पर अपना प्रभाव स्थापित किया है। हालांकि 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद चीन ने वेनेजुएला पर निर्भरता कुछ हद तक कम की है। इस युद्ध के चलते चीन को रूस से सस्ता तेल मिलने लगा।
सोना और महत्वपूर्ण खनिजों में चीनी हित
वेनेजुएला के पास कीमती धातुओं और महत्वपूर्ण खनिजों के बड़े भंडार हैं। ये मुख्य रूप से ओरिनोको माइनिंग आर्क और बोलिवार व अमेजोनास जैसे क्षेत्रों में केंद्रित हैं। कीमती धातुओं में वेनेजुएला के पास लैटिन अमेरिका का सबसे बड़ा स्वर्ण भंडार है। साथ ही रोडियम और हीरे भी पाए जाते हैं। वेनेजुएला रेयर अर्थ खनिजों कोल्टन (इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए अहम), जस्ता, बॉक्साइट (एल्यूमिनियम उत्पादन के लिए) और लौह अयस्क से भी समृद्ध है। हालांकि कुप्रबंधन और अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण इनका सीमित दोहन ही हो सका है।
बीजिंग ने ओरिनोको माइनिंग आर्क में सोना, कोल्टन और अन्य खनिजों तक पहुंच के लिए कई अरब डॉलर के सौदे किए हैं। चीनी कंपनियों ने लौह अयस्क, बॉक्साइट, सोना और रेयर अर्थ तत्वों से जुड़े कॉरपोरेसियोन वेनेजोलाना दे गुआयाना (CVG) परियोजनाओं में निवेश किया है, जो 2023 के बाद तेजी से बढ़ा है।
नेटिक्सिस की एलिसिया के मुताबिक, वेनेजुएला के गुरिल्ला-नियंत्रित क्षेत्रों से अवैध रूप से खनन किया गया कोल्टन, टिन, टंगस्टन और रेयर अर्थ का बड़ा हिस्सा कोलंबिया के रास्ते तस्करी के माध्यम से बाहर भेजा जाता है और अंततः चीनी खरीदारों तक पहुंचता है। इनके प्रसंस्करण पर चीनी कंपनियों का ही प्रभुत्व है। वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप इस व्यवस्था को बाधित कर सकता है।
एलिसिया के अनुसार, यह स्थिति ईरान में जारी अशांति से और जटिल हो जाती है, क्योंकि ईरान के पास भी तेल का बड़ा भंडार है। इसके चलते एशिया में ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका है। हालांकि ये व्यवधान अल्पकालिक भी साबित हो सकते हैं। चीन के जमे-जमाए प्रभाव को पूरी तरह खत्म करना और मौजूदा अनुबंधों को रद्द करना कठिन हो सकता है।
वेनेजुएला की अंतरिम सरकार की प्रमुख मादुरो की करीबी डेल्सी रोड्रिगेज हैं। डेल्सी के भाई जॉर्ज रोड्रिगेज नेशनल असेंबली के चेयरमैन हैं। एलिसिया का आकलन है कि यदि सत्ता रोड्रिगेज भाई-बहनों के हाथ में बनी रहती है, तो लोकतंत्र की तत्काल वापसी के बिना भी मौजूदा समझौते बने रह सकते हैं।
मुनरो डॉक्ट्रिन की वापसी
एलिसिया इसे अमेरिका के मुनरो डॉक्ट्रिन (Monroe Doctrine) से जोड़कर देखती हैं। वे कहती हैं, संदेश साफ है। मुनरो डॉक्ट्रिन लौट आया है और लैटिन अमेरिका में नियंत्रण की कोशिश करने वाली बाहरी ताकतों को अमेरिका बर्दाश्त नहीं करेगा।
मुनरो डॉक्ट्रिन पश्चिमी गोलार्ध (Western Hemisphere) के लिए अमेरिका की नीति है। दिसंबर 1823 में राष्ट्रपति जेम्स मुनरो इसे लेकर आए थे। इसका मकसद यूरोपियन देशों को चेतावनी देना था कि अमेरिका आगे कॉलोनाइजेशन या कठपुतली नेतृत्व को बर्दाश्त नहीं करेगा।
इसी डॉक्ट्रिन के तहत यूएस मरीन को 1904 में सैंटो डोमिंगो, 1911 में निकारागुआ और 1915 में हैती भेजा गया था, ताकि यूरोप को बाहर रखा जाए। वर्ष 1962 में जब सोवियत संघ ने क्यूबा में मिसाइल लॉन्च करने की जगहें बनाना शुरू किया, तब भी मुनरो डॉक्ट्रिन का इस्तेमाल किया गया। तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन एफ़. केनेडी ने क्यूबा के चारों ओर नौसेना और वायु सेना की घेराबंदी कर दी। कई दिनों के तनाव के बाद आखिर सोवियत संघ वहां से हटने पर राजी हो गया। उसके बाद अमेरिका ने भी तुर्की में अपने कई पुराने एयर और मिसाइल बेस हटा लिए।
चीन-ताइवान संबंधों पर प्रभाव, एशिया के लिए जोखिम
वेनेजुएला में अमेरिकी दखल से चीन को फायदा भी हो सकता है। अमेरिका की कार्रवाई यह संकेत हो सकती है कि वह पश्चिमी गोलार्ध पर फोकस करेगा। इससे चीन के लिए पैसिफिक में और रूस के लिए यूरोप में जगह बन सकती है।
एलिसिया का मानना है कि अमेरिकी कार्रवाई को चीन अपने लिए तर्क के तौर पर इस्तेमाल कर सकता है। अगर अमेरिका किसी देश के लीडर को किडनैप कर सकता है और यह तय कर सकता है कि सत्ता में कौन रहेगा, तो चीन ताइवान में ऐसा क्यों नहीं कर सकता? हालांकि एलिसिया का मानना है कि वह सीधी सैन्य कार्रवाई के बजाय साइबर अटैक, आर्थिक दबाव और प्रचार जैसे तरीकों को तरजीह दे सकता है, ताकि युद्ध भड़काए बिना ताइवान की स्थिति को कमजोर किया जा सके।
हालांकि यह लॉजिक यूरोप के लिए डरावना है। ट्रंप का यह दिखाना कि ताकतवर लोग जो चाहें हासिल कर सकते हैं, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के नजरिए को सही ठहराता है। अंतरराष्ट्रीय नियमों की वॉशिंगटन की अनदेखी से रूस पर यूरोपियन टारगेट पर बड़े साइबर ऑपरेशन से लेकर हाइब्रिड वॉरफेयर तक शुरू कर सकता है।
अमेरिका की कार्रवाई पर यूरोपियन देशों की प्रतिक्रिया ऐसी है कि किसी को बुरा न लगे। एक तरफ तो इनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून अब भी मायने रखता है, दूसरी तरफ वे यह भी कह रहे हैं कि मादुरो ने जुलाई 2024 में वेनेजुएला का चुनाव नहीं जीता था। अमेरिका अब भी यूरोप के लिए सुरक्षा की गारंटी है। इसलिए ये देश अमेरिका की बुराई नहीं कर सकते।
एलिसिया कहती हैं, वेनेजुएला की घटना ‘जंगल के कानून’ जैसी व्यवस्था का संकेत देती हैं, जहां नियमों पर ताकत हावी हो जाती है। वेनेजुएला की तरह दूसरे देशों में भी संसाधनों पर कब्जा करने की कोशिशें हो सकती हैं। म्यांमार में संघर्ष के बीच चीन समर्थित सैन्य शासन का तांबा, जेड (जेडाइट) और रेयर अर्थ भंडारों पर शिकंजा बना हुआ है। इसी तरह, ईरान में अस्थिरता बढ़ने पर तेल, गैस और खनिजों पर नियंत्रण के लिए महाशक्तियों के बीच होड़ तेज हो सकती हैं। इससे एशिया की आपूर्ति बाधित होने का खतरा है।
श्रीवास्तव कहते हैं कि ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’ वाली वैश्विक व्यवस्था में अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की आवाज कमजोर पड़ गई है और चीन व रूस को छोड़कर अधिकांश प्रमुख देशों ने अमेरिका की कार्रवाई पर चुप्पी साध रखी है। कच्चे माल और ऊर्जा संसाधनों के लिए संघर्ष आने वाले वर्षों में और तेज होने की आशंका है। ऐसे में भारत को अत्यंत सावधानी से कदम उठाने होंगे, अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा करनी होगी, संप्रभुता या दीर्घकालिक हितों को कमजोर करने वाले सौदों से बचना होगा और भू-राजनीतिक दबाव से मुक्त रहते हुए महत्वपूर्ण कच्चे माल और ऊर्जा संसाधनों तक पहुंच सुनिश्चित करनी होगी।
