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रेड लाइन, विश्वास की कमी और सख्त शर्तों... क्यों नहीं हुई अमेरिका-ईरान की डील, क्या है ट्रंप का आगे का प्लान?

Published: Sun, 12 Apr 2026 11:10 PM (IST)

अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता कई प्रमुख मुद्दों पर मतभेदों के कारण विफल रही। अमेरिका ...और पढ़ें

परमाणु मुद्दा और होर्मुज बना सबसे बड़ा रोड़ा (फाइल फोटो)

परमाणु मुद्दा और होर्मुज बना सबसे बड़ा रोड़ा (फाइल फोटो)

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में हुई बहुप्रतीक्षित शांति वार्ता कई अहम मुद्दों पर मतभेद के चलते बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गई। इस विफलता के पीछे पांच प्रमुख कारण उभरकर सामने आए हैं।

दोनों देशों के कड़े रुख और रेड लाइन सबसे बड़ी बाधा अमेरिका ने ईरान से यूरेनियम संवर्धन रोकने और परमाणु हथियार न बनाने की गारंटी मांगी, जिसे तेहरान ने सिरे से खारिज कर दिया। दोनों ही मुद्दे दोनों पक्षों के लिए रेड लाइन सरीखे रहे, जिस पर कोई भी पक्ष झुकने को तैयार नहीं था।

जेडी वेंस ने क्या कहा?

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि ईरान को हमारी शर्तें मंजूर नहीं थीं। वहीं ईराने के विदेश मंत्रालय ने दावा किया कि अमेरिकी अपेक्षाएं अत्यधिक और अतार्किक थीं। वार्ता का अनुकूल माहौल न होना, ट्रंप की लगातार धमकियां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लगातार सैन्य हमले की धमकियों ने तनाव बढ़ाया, जिससे विश्वास बनाने की बजाय दूरी और बढ़ गई।

ट्रंप ने युद्धविराम से पूर्व धमकी दी थी कि ईरान ने होर्मुज न खोला तो पूरी सभ्यता खत्म कर दी जाएगी और ईरान पाषाण युग में चला जाएगा। वार्ता से पहले भी ट्रंप के सुर नरम नहीं पड़े। तनातनी के माहौल में वार्ता शुरू हुई और ईरान ने इसे दबाव के रूप में लिया, न कि कूटनीति के तौर पर।

लेबनान पर इजरायली हमले, नेतन्याहू की भड़काऊ बयानबाजी ईरान ने इन हमलों को रोकने की शर्त रखी, लेकिन अमेरिका इस पर कोई ठोस आश्वासन नहीं दे सका। बातचीत के बीच भी लेबनान पर इजरायली हमले जारी थे।

इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने इसी दौरान दावा किया कि भले ही अमेरिका-ईरान के बीच युद्धविराम हो जाए, इजरायल का संघर्ष ईरान और उसके प्राक्सी सहयोगियों के साथ जारी रहेगा। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी इजरायल की निंदा की।

होर्मुज है सबसे अहम मुद्दा

होर्मुज जलडमरूमध्य का मुद्दा बड़ी अड़चन बना अमेरिका इसे तुरंत खोलने पर अड़ा रहा, जबकि ईरान ने इसे अपने रणनीतिक दबाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हुए प्रतिबंधों में राहत और सुरक्षा गारंटी की मांग की। अमेरिका होर्मुज पर साझा नियंत्रण चाहता था, जो तेहरान के लिए अस्वीकार्य थी।

ईरान होर्मुज खोलने के बदले विदेश में जब्त संपत्तियों को छुड़ाना चाहता था, लेकिन अमेरिका इसके लिए तैयार नहीं हुआ। ईरान ये भी चाहता था कि ओमान के साथ होर्मुज पर ईरान के नियंत्रण को औपचारिक स्वीकृति दी जाए। वह होर्मुज में आने-जानेवाले जहाजों पर टोल लगाने के अधिकार की भी स्वीकृति मांग रहा था, जो अमेरिका के लिए संभव नहीं थीं।

अमेरिका और ईरान के बीच गहरे अविश्वास का इतिहास वर्षों की दुश्मनी, हालिया सैन्य कार्रवाइयों और एक-दूसरे के इरादों पर शक ने किसी भी समझौते की संभावना खत्म कर दी। ईरान इससे पहले भी दो बार अमेरिका के साथ बातचीत के लिए तैयार हुआ था, लेकिन ईरान का आरोप है कि बार-बार अमेरिका ने भरोसा तोड़ा।

जिनोवा वार्ता के बाद ईरान पर हमला

जिनेवा में हुई वार्ता सफल मानी जा रही थी, लेकिन इसके तत्काल बाद ईरान पर हमला किया गया। उपराष्ट्रपति वेंस ने अपने प्रस्तावों को अंतिम और सर्वश्रेष्ठ बताया, जबकि ईरान ने इनको एकतरफा माना। इस्लामाबाद वार्ता से पहले ईरानी प्रतिनिधिमंडल के नेता एमबी गलीबाफ ने कहा था कि हम नेक नीयत से आए हैं, लेकिन हमें अमेरिका पर भरोसा नहीं है।

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