द न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन। अमेरिका के फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन ने गंभीर किस्म की बीमारी स्पाइनल मस्क्युलर अट्रॉफी (एसएमए) के इलाज के लिए जीन-थेरेपी को मंजूरी दे दी है। जोलेगेंस्मा नामक इस नई थेरेपी के जरिये एक ही बार में इस बीमारी का इलाज हो जाएगा जिसकी कीमत 21 लाख डॉलर (करीब 14 करोड़ रुपये) है। एक खुराक के लिहाज से इसे अब तक का सबसे महंगा इलाज बताया जा रहा है। एसएमए के इलाज के लिए पहले भी कई ड्रग्स विकसित की गई थी, लेकिन उनकी एक खुराक की कीमत दस डॉलर से ऊपर नहीं थी।

एसएमए एक तरह का न्यूरोमस्क्युलर डिसऑर्डर है जिससे मरीज की शारीरिक क्षमता घट जाती है और वह चल-फिर भी नहीं पाते। दुनियाभर में पैदा होने वाले 11 हजार बच्चों में से एक एसएमए से पीड़ित होता है। कई बार इस बीमारी के कारण दो साल की उम्र में ही उनकी मौत हो जाती है। इसके इलाज के लिए अब तक स्पिनरजा नामक दवा का इस्तेमाल हो रहा था। इसका उपचार करीब दस सालों तक चलता है जिसका खर्च 40 लाख डॉलर (करीब 27 करोड़ रुपये) पड़ जाता है। जोलेगेंस्मा को विकसित करने वाली कंपनी नोवार्टिस का कहना है उन्होंने भी थेरेपी की कीमत आधी घटाकर बताई है। कंपनी के सीईओ ने कहा, ‘हम सही रास्ते पर हैं और एक दिन इस बीमारी को पूरी तरह खत्म कर पाएंगे।’

इलाज महंगा होने पर उठ रहे सवाल

एसएमए का इलाज उपलब्ध होने पर कई लोग खुश हैं लेकिन इसकी कीमत को लेकर उन्हें चिंता है। कई परिवार इतने महंगे इलाज का खर्च नहीं उठा सकते। कई जानकारों ने कंपनी पर जानबूझकर इलाज मंहगा करने का आरोप भी लगाया है।

कई बीमारियों के इलाज में आता है लाखों का खर्चा

ऐसी कई बीमारियों हैं जिनके इलाज में लाखों-करोड़ों रुपये का खर्चा होता है, लेकिन फिर भी पूरी तरह से इलाज नहीं हो पाता। गंभीर तरह की दृष्टिहीनता के इलाज के लिए जीन थेरेपी का खर्च साढ़े आठ लाख डॉलर (करीब पांच करोड़ रुपये) से भी अधिक है। वहीं ल्यूकेमिया (ब्लड कैंसर) के इलाज में 4.75 लाख डॉलर (करीब तीन करोड़ रुपये) का खर्च आता है।

चार महीने के बच्चे पर सफल रहा था ट्रायल

ओहायो की रहने वाली टीना व टोरंस एंडरसन के बेटे मलाची एसएमए से पीड़ित थे। 2015 में उन्हें इसका पता लगा था तब मलाची केवल चार महीने का था। डॉक्टर ने एंडरसन दंपती को जवाब दे दिया था। बाद में मलाची को जोलेंगस्मा के क्लीनिकल ट्रायल के लिए चुना गया। अब वह चार साल का है और स्वस्थ है। वह खुद अपनी व्हीलचेयर भी चला पाता है। भविष्य में यह तकनीक स्पाइनल मस्क्युलर अट्रॉफी के मरीजों के लिए बेहद कारगर साबित हो सकती है।

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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